भोगनीपुर उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले का एक कस्बा और भोगनीपुर तहसील का मुख्यालय है. यह कानपुर-झांसी मार्ग पर राष्ट्रीय राजमार्ग 27 और 519 के जंक्शन पर स्थित है और कानपुर से करीब 65 किलोमीटर पश्चिम में है. यह आसपास के कृषि प्रधान ग्रामीण क्षेत्र के शहरी केंद्र और प्रशासनिक केंद्र के रूप में काम करता है.
भोगनीपुर एक स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र बना. 1952 में यह क्षेत्र भोगनीपुर वेस्ट-कम-डेरापुर साउथ नाम की विधानसभा सीट के अंतर्गत आता था. यह सामान्य यानी अनारक्षित विधानसभा सीट है और जालौन लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें पूरी भोगनीपुर तहसील के साथ अकबरपुर तहसील का गजनेर कानूनगो सर्किल शामिल है, जिससे इसका स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
1957 में पहली बार स्वतंत्र विधानसभा क्षेत्र के रूप में चुनाव लड़ने के बाद से भोगनीपुर में अब तक 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. इसका चुनावी इतिहास बदलते राजनीतिक रुझानों को दिखाता है और किसी एक पार्टी का इस सीट पर लंबे समय तक कब्जा नहीं रहा है. कांग्रेस ने यहां चार बार जीत दर्ज की, जिसमें उसकी आखिरी जीत 1985 में हुई थी. बहुजन समाज पार्टी ने तीन बार, जबकि जनता दल, भाजपा और समाजवादी पार्टी ने दो-दो बार इस सीट पर जीत हासिल की है. एक निर्दलीय उम्मीदवार, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल और जनता पार्टी ने भी एक-एक बार जीत दर्ज की है.
2012 में समाजवादी पार्टी ने बसपा से यह सीट छीन ली थी. समाजवादी पार्टी के योगेंद्र पाल सिंह ने धर्मपाल सिंह भदौरिया को 4,653 वोटों से हराया था. इसके बाद 2017 में बड़ा बदलाव देखने को मिला और भाजपा ने पांचवें स्थान से सीधे जीत दर्ज की. भाजपा के उम्मीदवार विनोद कुमार कटियार ने बसपा के धर्मपाल सिंह भदौरिया को 19,005 वोटों से हराया. उस चुनाव में समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक योगेंद्र पाल सिंह तीसरे स्थान पर रहे. 2022 में भाजपा ने इस सीट को बरकरार रखा. भाजपा के राकेश सचान को 87,809 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र पाल सिंह को 75,916 वोट मिले. राकेश सचान ने 11,893 वोटों से जीत दर्ज की.
भोगनीपुर के मतदाताओं का बदलता रुझान लोकसभा चुनावों में भी दिखाई देता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों में इस विधानसभा क्षेत्र में तीन अलग-अलग पार्टियां सबसे आगे रही हैं. 2009 में समाजवादी पार्टी ने बसपा पर 5,417 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा पिछले चुनाव में तीसरे स्थान से आगे बढ़कर पहले स्थान पर पहुंची और बसपा पर 38,902 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही बसपा ने भाजपा पर 2,127 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 में जालौन लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी फिर चुनाव मैदान में उतरी. उसके उम्मीदवार नारायण दास अहिरवार को इस विधानसभा क्षेत्र में 1,06,873 वोट मिले, जबकि भाजपा के उम्मीदवार भानु प्रताप सिंह वर्मा को 75,848 वोट मिले. इस तरह समाजवादी पार्टी ने 31,025 वोटों की बढ़त हासिल की.
2026 के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से पहले भोगनीपुर में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी थी. 2012 में मतदाताओं की संख्या 3,05,598 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,33,056 हो गई. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह संख्या 3,37,824 थी. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 3,52,012 और 2024 में 3,52,953 हो गई. अंतिम एसआईआर मतदाता सूची में 3,05,483 मतदाता हैं. यह एसआईआर से पहले की सूची के मुकाबले 40,086 मतदाताओं यानी 11.60 प्रतिशत की शुद्ध कमी है. अंतिम एसआईआर सूची का प्रकाशन 10 अप्रैल 2026 को किया गया था.
भोगनीपुर में मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. आम तौर पर यहां विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत लोकसभा चुनावों की तुलना में अधिक रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 64.28 रहा, जबकि 2017 में यह 63.87 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभा चुनाव में यह घटकर 59.24 प्रतिशत हो गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.34 हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह फिर घटकर 58.33 प्रतिशत रह गया.
भोगनीपुर एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है और यहां सामाजिक संरचना मिश्रित है. अनुसूचित जाति की आबादी 25.51 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम आबादी का अनुमान करीब 12.60 प्रतिशत है. उपलब्ध अनुमानों के अनुसार अनुसूचित जातियों में जाटवों की संख्या अच्छी-खासी है. इसके अलावा यादव, ब्राह्मण, कुशवाहा और लोध यहां की प्रमुख सामाजिक समूहों में शामिल हैं. पासी, पाल, कठेरिया, ठाकुर, कुर्मी, निषाद और अन्य ओबीसी समुदाय भी विधानसभा क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद हैं. 2011 में विधानसभा क्षेत्र की करीब 89.26 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी, जबकि बाकी 10.74 प्रतिशत आबादी भोगनीपुर कस्बे में रहती थी. इससे इस क्षेत्र का मुख्य रूप से ग्रामीण स्वरूप स्पष्ट होता है.
भोगनीपुर उपजाऊ गंगा-यमुना दोआब का हिस्सा है और लंबे समय से कृषि प्रधान क्षेत्र रहा है. स्थानीय परंपरा के अनुसार भोगनीपुर की स्थापना भोग चंद नाम के एक कायस्थ बसने वाले व्यक्ति ने की थी. कहा जाता है कि उन्होंने भोगसागर नाम का एक तालाब खुदवाया था, जिसके नाम से इस स्थान का नाम भोगनीपुर पड़ा. मुगल काल में वर्तमान कानपुर देहात का दक्षिणी हिस्सा एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और व्यापारिक क्षेत्र था और पुरानी मुगल रोड भोगनीपुर से होकर गुजरती थी. यह सड़क इस क्षेत्र को दोआब की दूसरी बस्तियों से जोड़ती थी और लोगों तथा कृषि उपज की आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण थी.
बाद के मुगल और अवध काल में इस क्षेत्र का प्रशासन परगना व्यवस्था के तहत किया जाता था. 1801 में अवध द्वारा अपना क्षेत्र अंग्रेजों को सौंपे जाने के बाद यह इलाका काउनपुर जिले का हिस्सा बन गया. भोगनीपुर और आसपास का ग्रामीण क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि प्रधान बना रहा. सड़क और बाद में रेलवे संपर्क मजबूत होने से पुखरायां-भोगनीपुर क्षेत्र का महत्व बढ़ा. व्यापक कानपुर देहात जिले को 1981 में कानपुर जिले से अलग करके बनाया गया था.
भोगनीपुर सड़क मार्ग से कानपुर, पुखरायां, घाटमपुर, कालपी और मध्य उत्तर प्रदेश के अन्य कस्बों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है. दिल्ली-हावड़ा मार्ग पर स्थित पुखरायां रेलवे स्टेशन यहां का सबसे नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन है और भोगनीपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर है. पुखरायां कस्बा करीब 15 किलोमीटर, कानपुर करीब 65 किलोमीटर, औरैया करीब 70 किलोमीटर, अकबरपुर करीब 55 किलोमीटर और इटावा करीब 105 किलोमीटर दूर है. जालौन करीब 65 किलोमीटर, उरई करीब 80 किलोमीटर, कन्नौज करीब 130 किलोमीटर और लखनऊ करीब 180 किलोमीटर दूर है. वहीं आगरा करीब 190 किलोमीटर और ग्वालियर करीब 170 किलोमीटर दूर है.
भोगनीपुर का चुनावी रिकॉर्ड शायद ही कभी एक सीधी दिशा में रहा है. पिछले सात प्रमुख चुनावों के विधानसभा और लोकसभा परिणामों को मिलाकर देखें तो भाजपा और समाजवादी पार्टी में से प्रत्येक पार्टी तीन बार सबसे आगे रही है, लेकिन दोनों पार्टियों का यहां तक पहुंचने का रास्ता अलग रहा है. भाजपा की लगातार दो विधानसभा जीतों ने 2014 के बाद उसे बढ़त दिलाई. 2014 में पार्टी ने लोकसभा चुनाव में भी बड़ी बढ़त बनाई थी. हालांकि 2024 में समाजवादी पार्टी की वापसी ने राजनीतिक समीकरण को काफी बदल दिया. नवीनतम लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी की बढ़त 15.07 प्रतिशत अंक रही, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 5.45 प्रतिशत अंक की बढ़त मिली थी. यह अंतर महत्वपूर्ण है, हालांकि भोगनीपुर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां बड़े बदलाव असामान्य नहीं हैं. 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों के बीच भाजपा के वोट शेयर में 28.86 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई थी. इसी तरह 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों के बीच पार्टी के वोट शेयर में 27.60 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई थी. यह रिकॉर्ड दिखाता है कि भाजपा के लिए बड़े अंतर को पाटने की संभावना का आधार उसके पिछले चुनावी प्रदर्शन में रहा है, जबकि समाजवादी पार्टी अपने ताजा लोकसभा प्रदर्शन को विधानसभा स्तर की राजनीति में बनाए रखने की कोशिश करेगी.
2027 का चुनाव इस बात पर अधिक निर्भर करेगा कि लोकसभा चुनाव में आया बदलाव विधानसभा चुनाव में भी बना रहता है या नहीं. भाजपा के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड है और अलग-अलग चुनावों के बीच बड़े वोट शेयर लाभ हासिल करने का इतिहास भी है. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के पास 2024 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में मिले समर्थन का ताजा रिकॉर्ड है. बसपा की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है, क्योंकि उसका वोट शेयर अभी भी काफी है और वह पहले भी भोगनीपुर को त्रिकोणीय मुकाबले वाली सीट बनाने में सफल रही है. एसआईआर ने एक नया पहलू जरूर जोड़ा है, हालांकि अभी ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि किसी विशेष जाति या समुदाय पर इसका असमान प्रभाव पड़ा है. भाजपा जहां अपनी विधानसभा बढ़त को बचाने की कोशिश करेगी, वहीं समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव में मिली वापसी को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी. ऐसे में 2027 में भोगनीपुर का चुनाव एक बार फिर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुकाबला बन सकता है.
(अजय झा)