बालामऊ उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सई नदी के बाएं किनारे स्थित एक गांव है. पुराने समय में यह अपने आसपास के क्षेत्र की सबसे बड़ी बस्ती थी और बाद के मुगल काल में एक परगना मुख्यालय के रूप में कार्य करता था. आज यह एक सामान्य ग्रामीण बस्ती है, जो आसपास के विधानसभा क्षेत्र को अपना नाम देती है.
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र है और मिश्रिख लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. इसकी सीमाओं में हरदोई जिले की संडीला तहसील के अंतर्गत कल्याणमल, बेहंदर और बालामऊ कानूनगो सर्किल, बेनीगंज नगर पंचायत, कछौना नगर पंचायत और सोम जनगणना नगर शामिल हैं. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण स्वरूप वाला है.
वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद बने नए विधानसभा क्षेत्रों में बालामऊ का चुनावी इतिहास अपेक्षाकृत छोटा है. यहां पहली बार वर्ष 2012 में विधानसभा चुनाव हुआ था. पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की, जबकि इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने लगातार दो चुनाव जीते. वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी के अनिल वर्मा ने बहुजन समाज पार्टी के राम पाल वर्मा को केवल 173 वोटों के मामूली अंतर से हराया था.
वर्ष 2012 में बेहद कमजोर प्रदर्शन करने वाली भाजपा ने इसके बाद बड़ा राजनीतिक बदलाव दर्ज किया. वर्ष 2012 में भाजपा को केवल 1.54 प्रतिशत वोट मिले थे और उसकी जमानत जब्त हो गई थी. पार्टी पांचवें स्थान पर रही थी. वर्ष 2017 में राम पाल वर्मा भाजपा में शामिल हुए और उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की नीलू सत्यार्थी को 22,888 वोटों के बड़े अंतर से हराकर सीट भाजपा के खाते में डाल दी. वर्ष 2022 में राम पाल वर्मा ने भाजपा के टिकट पर फिर चुनाव जीता. उन्हें 81,994 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के प्रतिद्वंद्वी रामबली वर्मा को 55,750 वोट मिले. इस तरह भाजपा की जीत का अंतर बढ़कर 26,244 वोट हो गया.
बालामऊ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का उभार उस समय लगभग रुक गया था, जब इस क्षेत्र के अस्तित्व में आने के बाद पहला लोकसभा चुनाव हुआ. वर्ष 2009 में भाजपा केवल 1.54 प्रतिशत वोटों के साथ पांचवें स्थान पर रही, जबकि समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर 173 वोटों की मामूली बढ़त बनाई. वर्ष 2014 में भी इस विधानसभा क्षेत्र में बहुजन समाज पार्टी आगे रही और उसने भाजपा पर 19,504 वोटों की बढ़त बनाई. वर्ष 2019 में स्थिति बदल गई और भाजपा सबसे आगे निकल गई. उसने बहुजन समाज पार्टी पर 12,679 वोटों की बढ़त हासिल की. वर्ष 2024 में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी की जगह मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा पहले स्थान पर बनी रही और उसकी बढ़त कम हो गई. मिश्रिख लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार अशोक कुमार रावत को बालामऊ विधानसभा क्षेत्र में 86,408 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार संगीता राजवंशी को 79,429 वोट मिले. इस तरह बालामऊ विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की बढ़त 6,979 वोट रही.
बालामऊ में पिछले वर्षों के दौरान मतदाताओं की संख्या में कुछ उतार-चढ़ाव के साथ लगातार वृद्धि हुई है. वर्ष 2012 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 3,23,909 थी, जो वर्ष 2017 में बढ़कर 3,47,475 हो गई. वर्ष 2019 में यह संख्या 3,50,324 रही. वर्ष 2022 में मतदाताओं की संख्या घटकर 3,47,434 हो गई और वर्ष 2024 में फिर बढ़कर 3,59,214 हो गई. मतदान प्रतिशत में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. विधानसभा चुनावों में आमतौर पर लोकसभा चुनावों की तुलना में मतदान थोड़ा अधिक रहा है. वर्ष 2012 में मतदान प्रतिशत 54.74 रहा, जो वर्ष 2017 में घटकर 54.10 प्रतिशत हो गया. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में यह और घटकर 53.91 प्रतिशत रहा. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदान बढ़कर 55.21 प्रतिशत हो गया. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान फिर घटकर 53.02 प्रतिशत रहा.
बालामऊ एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है. अनुसूचित जाति के मतदाता यहां के कुल मतदाताओं का लगभग 47.36 प्रतिशत हैं. यही इस सीट के अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने का एक प्रमुख कारण है. मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 12.80 प्रतिशत है. अनुसूचित जाति के मतदाताओं में पासी, चमार और अन्य दलित समुदाय शामिल हैं. अन्य मतदाताओं में विभिन्न अन्य पिछड़ा वर्ग के समूह शामिल हैं, जिनमें कुर्मी, यादव और अन्य पिछड़े समुदाय आते हैं. इनके अलावा ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण हिंदू भी यहां के मतदाताओं का हिस्सा हैं. यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है. यहां के 94.79 प्रतिशत मतदाता ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, जबकि केवल 5.21 प्रतिशत मतदाता बालामऊ, बेनीगंज, कछौना और सोम के आसपास के शहरी क्षेत्रों में रहते हैं.
बालामऊ का भूभाग मुख्य रूप से समतल और कृषि प्रधान है. यह मध्य उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानी क्षेत्र का हिस्सा है. कृषि यहां की प्रमुख आर्थिक गतिविधि है. गेहूं, धान, गन्ना और अन्य फसलों की खेती से ग्रामीण आबादी की आजीविका चलती है. पशुपालन, छोटे स्तर का व्यापार और कृषि से जुड़े अन्य कार्य भी आय के स्रोत हैं. बेनीगंज और कछौना विधानसभा क्षेत्र के महत्वपूर्ण स्थानीय बाजारों के रूप में काम करते हैं. छोटी बस्तियों और गांवों के बाजार आसपास के ग्रामीण लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते हैं.
बालामऊ मुख्य रूप से सड़क मार्ग से संडीला, हरदोई और आसपास के अन्य कस्बों से जुड़ा हुआ है. यह संडीला से लगभग 25 किलोमीटर, हरदोई से लगभग 35 किलोमीटर और बिलग्राम से करीब 55 किलोमीटर दूर है. लखनऊ की दूरी लगभग 65 किलोमीटर है, जबकि सीतापुर बालामऊ से लगभग 80 किलोमीटर दूर है. संडीला की निकटता के कारण क्षेत्र को रेलवे नेटवर्क तक पहुंच मिलती है. हरदोई और लखनऊ से व्यापक रेल और सड़क संपर्क उपलब्ध होता है. विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण स्वरूप को देखते हुए बाजार कस्बों तक सड़क संपर्क कृषि व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी सुविधाओं के लिए महत्वपूर्ण है.
स्थानीय परंपरा के अनुसार बालामऊ की स्थापना अकबर के शासनकाल के अंतिम दौर में बलई नामक एक कुर्मी व्यक्ति ने की थी. बताया जाता है कि बलई चंदेलों के दबाव से बचने के लिए उन्नाव क्षेत्र से उत्तर की ओर चले गए थे. उन्होंने महरी के कछवाहा राजपूतों के यहां शरण ली और बाद में जंगल की भूमि को साफ कर एक बस्ती बसाई. इस क्षेत्र को बलई खेड़ा कहा गया, जो बाद में छोटा होकर बालामऊ कहलाने लगा. यह बस्ती आगे चलकर एक परगना मुख्यालय के रूप में विकसित हुई. इसमें शुरुआत में लगभग 42 गांव शामिल थे. नवाबी काल के दौरान इनमें से अधिकतर गांवों को पड़ोसी संडीला परगना में स्थानांतरित कर दिया गया. इसके बाद बालामऊ जिले के सबसे छोटे परगनों में शामिल रह गया. 20वीं सदी की शुरुआत तक यह एक समृद्ध कृषि गांव बना रहा और यहां रोजाना बाजार लगता था. हालांकि तब तक इसका प्रशासनिक महत्व काफी कम हो चुका था. आज भी यह आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के लिए एक स्थानीय केंद्र के रूप में कार्य करता है.
राजनीतिक स्थिति के लिहाज से भाजपा वर्तमान में अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे दिखाई देती है. वर्ष 2017 के बाद से वह लगातार चार चुनावी मुकाबलों में सबसे अधिक वोट हासिल कर चुकी है. इनमें दो विधानसभा चुनावों में जीत और पिछले दो लोकसभा चुनावों में बढ़त शामिल है. हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त में अचानक कमी आई. उस चुनाव में भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर केवल 3.70 प्रतिशत अंकों की बढ़त हासिल की. इससे भाजपा के लिए विधानसभा क्षेत्र को लेकर सतर्क रहने की स्थिति बनी है. वहीं कम हुआ अंतर समाजवादी पार्टी की उम्मीदों को भी बढ़ा सकता है.
समाजवादी पार्टी ने बालामऊ में जीत हासिल करने के लिए कई बार अपने उम्मीदवार बदले हैं, लेकिन अभी तक उसे सफलता नहीं मिली है. हालांकि वर्ष 2024 में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन से संकेत मिलता है कि भाजपा इस विधानसभा क्षेत्र को हल्के में नहीं ले सकती. अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग आधी होने और मतदान प्रतिशत के अपेक्षाकृत कम रहने के कारण मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाना चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में सीट बरकरार रखने के लिए भाजपा को हर वोट के लिए मेहनत करनी होगी. वहीं समाजवादी पार्टी को उम्मीद होगी कि लोकसभा चुनाव में उसके बेहतर प्रदर्शन को विधानसभा स्तर की चुनौती में बदला जा सके.
(अजय झा)