बछरावां एक छोटा कस्बा है, जिसे नगर पंचायत का दर्जा प्राप्त है और यह उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में एक सामुदायिक विकास खंड के मुख्यालय के रूप में कार्य करता है. यह रायबरेली-लखनऊ मुख्य मार्ग पर स्थित है और आसपास के कई गांवों के लिए प्रमुख प्रशासनिक तथा व्यावसायिक केंद्र है. इस कारण पूरे क्षेत्र का स्वरूप मुख्य रूप से ग्रामीण है.
के चुनाव से पहले बछरावां को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया था. यह रायबरेली लोकसभा क्षेत्र के पांच विधानसभा खंडों में से एक है. 2008 के परिसीमन के बाद इसमें रायबरेली जिले की पूरी महाराजगंज तहसील शामिल है, जिसमें बछरावां कस्बे के साथ रायबरेली तहसील के अमावां कानूनगो सर्किल की सात पंचायतें भी आती हैं.
1957 के विधानसभा चुनाव में यह क्षेत्र बछरावां (एससी) के नाम से दर्ज था और दो सदस्यीय विधानसभा क्षेत्र था. इसमें एक सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित और दूसरी सामान्य वर्ग के लिए थी. दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था समाप्त होने के बाद 1962 से यह एकल सदस्यीय अनुसूचित जाति आरक्षित सीट बन गया.
बछरावां में 1957 से अब तक 17 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. कांग्रेस यहां सबसे प्रभावशाली दल रही है और उसने 17 में से 10 चुनाव जीते हैं. 1957 के दो सदस्यीय चुनाव में कांग्रेस ने दोनों सीटों पर जीत दर्ज की थी. 1957 से 1991 के बीच हुए शुरुआती 10 चुनावों में कांग्रेस ने नौ बार जीत हासिल की. 1962 में सोशलिस्ट पार्टी की जीत से कांग्रेस का यह सिलसिला टूटा था. 1993 के बाद यह सीट काफी प्रतिस्पर्धी रही है और किसी भी दल ने लगातार दो चुनाव नहीं जीते हैं. कांग्रेस की 10 जीत के अलावा समाजवादी पार्टी ने तीन बार, भाजपा ने दो बार तथा सोशलिस्ट पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एक-एक बार यह सीट जीती है. व्यक्तिगत नेताओं में कांग्रेस के राम दुलारे और शिव दर्शन ने लगातार चार-चार कार्यकाल पूरे किए.
2012 में समाजवादी पार्टी के राम लाल अकेला ने बछरावां सीट जीती थी. उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के सुशील कुमार पासी को 27,948 मतों से हराया था. तत्कालीन कांग्रेस विधायक राजा राम त्यागी तीसरे स्थान पर रहे थे, जबकि भाजपा 2.89 प्रतिशत मतों के साथ छठे स्थान पर रही. 2017 में भाजपा ने यहां वापसी करते हुए राम नरेश रावत के माध्यम से जीत हासिल की. उन्होंने कांग्रेस के शाहब शरण को 22,309 मतों से हराया. 2012 की तुलना में भाजपा के मत प्रतिशत में 30.08 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई. तत्कालीन विधायक अकेला को समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे में कांग्रेस से टिकट नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय लोक दल के टिकट पर चुनाव लड़ा और पांचवें स्थान पर रहे.
2022 में एक बार फिर राजनीतिक समीकरण बदले और समाजवादी पार्टी ने बछरावां सीट जीत ली. वर्ष 1996 में बहुजन समाज पार्टी के लिए यह सीट जीत चुके श्याम सुंदर भारती ने इस बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. उन्होंने अपना दल (सोनेलाल) के लक्ष्मीकांत को केवल 2,812 मतों से हराया. 2012 में राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के टिकट पर दूसरे स्थान पर रहे सुशील कुमार पासी इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार थे और तीसरे स्थान पर रहे. भाजपा ने इस सीट पर चुनाव नहीं लड़ा और इसे अपने सहयोगी दल अपना दल (सोनेलाल) के लिए छोड़ दिया. भारती को 65,747 मत मिले, जबकि लक्ष्मीकांत को 62,935 और पासी को 56,835 मत मिले.
विधानसभा चुनावों में लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के विपरीत लोकसभा चुनाव में बछरावां का मतदान रुझान अलग रहा है. 2009 के बाद हुए चारों लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त बनाई है. इसका मुख्य कारण रायबरेली लोकसभा सीट पर गांधी परिवार की लगातार बनी राजनीतिक पकड़ को माना जाता है. 2009 में बछरावां क्षेत्र में कांग्रेस ने बसपा पर 65,091 मतों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा पर कांग्रेस की बढ़त 47,911 मतों की और 2019 में 24,055 मतों की रही. इन तीनों चुनावों में सोनिया गांधी कांग्रेस की उम्मीदवार थीं. 2024 में उनके बेटे राहुल गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ा. बछरावां क्षेत्र में उन्हें 1,35,288 मत मिले, जबकि भाजपा उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह को 62,638 मत मिले. इस तरह कांग्रेस की बढ़त 72,650 मतों की रही.
रायबरेली के साथ गांधी परिवार का संबंध लंबे समय से रहा है. फिरोज गांधी ने 1952 और 1957 में इस सीट से चुनाव जीता था. इसके बाद इंदिरा गांधी ने 1967, 1971 और 1980 में जीत दर्ज की. सोनिया गांधी ने 2004 से 2019 के बीच लगातार पांच कार्यकाल पूरे किए, जिसमें 2006 का उपचुनाव भी शामिल था. 2024 में राहुल गांधी ने रायबरेली सीट जीती. गांधी-नेहरू परिवार के दो अन्य सदस्य अरुण नेहरू और शीला कौल भी दो-दो कार्यकाल के लिए रायबरेली से सांसद रहे. परिवार के करीबी सहयोगी कैप्टन सतीश शर्मा ने 1999 में एक बार रायबरेली का प्रतिनिधित्व किया था.
बछरावां में एक दशक से अधिक समय तक मतदाताओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई. 2012 में यहां पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2,92,118 थी, जो 2017 में बढ़कर 3,12,697 और 2019 में 3,25,779 हो गई. 2022 में यह संख्या 3,37,260 और 2024 में 3,47,083 तक पहुंच गई. 10 अप्रैल 2026 को विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में 3,03,326 मतदाता थे. यह पूर्व एसआईआर मतदाता संख्या करीब 3,43,469 की तुलना में 40,143 की कमी थी. यह कमी पूर्व मतदाता संख्या का 11.69 प्रतिशत थी.
बछरावां में मतदान प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखा गया है, हालांकि हाल के वर्षों में मतदान अपेक्षाकृत अधिक रहा है. 2012 में मतदान 62.90 प्रतिशत था और 2017 में मामूली बढ़ोतरी के साथ यह 63.38 प्रतिशत रहा. 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान घटकर 58.40 प्रतिशत हो गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह बढ़कर 62.18 प्रतिशत रहा. 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान 60.17 प्रतिशत दर्ज किया गया.
बछरावां एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां मुस्लिम आबादी की भी मौजूदगी है. अनुमान के अनुसार यहां करीब 8.30 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम हैं, जबकि अनुसूचित जाति की आबादी करीब 37.82 प्रतिशत है. पासी समुदाय अनुसूचित जाति के प्रमुख समूहों में शामिल है. कोरी समुदाय की भी यहां महत्वपूर्ण संख्या है. अन्य प्रमुख समुदायों में कुर्मी, लोध, यादव, ब्राह्मण और ठाकुर शामिल हैं. हाल के जातीय आकलनों में भी पासी समुदाय को क्षेत्र के बड़े सामाजिक समूहों में रखा गया है. इसके बाद कुर्मी-लोध, ब्राह्मण, यादव और क्षत्रिय समुदायों की महत्वपूर्ण आबादी मानी जाती है.
क्षेत्र की करीब 96 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, जबकि लगभग 4 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्र में है. स्थानीय अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है. गेहूं और धान यहां की प्रमुख फसलों में शामिल हैं. आसपास के गांवों में पशुपालन, छोटे स्तर का व्यापार और कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियां भी होती हैं. बछरावां कस्बा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बाजार केंद्र के रूप में काम करता है. यहां अनाज, किराना और रोजमर्रा की जरूरत की अन्य वस्तुओं का कारोबार होता है. पारंपरिक गिरधरगंज बाजार का महत्व रेलवे के आने के बाद बढ़ा था और ऐतिहासिक रूप से यह कृषि उपज के बाजार तथा निकासी केंद्र के रूप में काम करता रहा है.
बछरावां के वर्तमान कस्बे की स्थापना करीब 1400 के आसपास तत्कालीन थुलेड़ी परगना के स्थानीय चौधरी बछराज पांडे ने की थी. उन्हीं के नाम पर इसका नाम बछरावां पड़ा. इससे पहले यह क्षेत्र भर समुदाय के नियंत्रण में था. बाद में इस क्षेत्र पर मुस्लिम और फिर अवध के नवाबी प्रशासन का प्रभाव रहा. 1400 के शुरुआती वर्षों से लेकर 18वीं सदी के अंतिम दौर तक थुलेड़ी परगना का मुख्यालय रहा. इसके बाद प्रशासनिक मुख्यालय बछरावां स्थानांतरित कर दिया गया. आगे चलकर यह क्षेत्र स्थानीय बाजार और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ.
बछरावां की भौगोलिक स्थिति इसे सड़क और रेल मार्ग से अच्छी कनेक्टिविटी देती है. यह लखनऊ से करीब 50 किलोमीटर और रायबरेली से करीब 32 किलोमीटर दूर है. तहसील मुख्यालय महाराजगंज की दूरी मार्ग के अनुसार करीब 20 से 27 किलोमीटर है. बछरावां रेलवे स्टेशन लखनऊ-रायबरेली रेल मार्ग पर स्थित है. यह रेल मार्ग मुख्य सड़क के लगभग समानांतर चलता है. सड़क मार्ग से बछरावां रायबरेली जिले के आसपास के क्षेत्रों और लखनऊ से जुड़ा हुआ है. कानपुर की दूरी करीब 85 से 90 किलोमीटर है, जबकि अयोध्या करीब 145 किलोमीटर और प्रयागराज करीब 125 से 130 किलोमीटर दूर है. वाराणसी की दूरी लगभग 230 से 250 किलोमीटर है.
यह स्पष्ट है कि बछरावां के मतदाता विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का मजबूत प्रदर्शन विधानसभा चुनावों में दिखाई नहीं देता. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली बड़ी बढ़त का 2027 के विधानसभा चुनाव पर कितना असर होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है. सत्तारूढ़ और विपक्षी गठबंधनों की ओर से किस दल को सीट मिलती है और उम्मीदवार कौन होते हैं, इसका चुनावी परिणाम पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है. आरक्षित सीट होने के कारण बहुजन समाज पार्टी की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि पार्टी की संभावित वापसी से दोनों प्रमुख गठबंधनों में से किसे अधिक नुकसान होगा. विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद मतदाता सूची में हुई बड़ी कमी ने चुनावी समीकरण में एक और बदलाव जोड़ा है. इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए बछरावां उन विधानसभा सीटों में शामिल है, जहां चुनावी परिणाम का अनुमान लगाना आसान नहीं है. इतना तय है कि यहां मुकाबला करीबी और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि फिलहाल किसी एक दल की स्पष्ट बढ़त दिखाई नहीं देती.
(अजय झा)