अकबरपुर और रनिया उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले में एक-दूसरे से करीब से जुड़े शहरी क्षेत्र हैं. अकबरपुर तहसील और जिले का मुख्यालय है, जिसे आधिकारिक तौर पर माती-अकबरपुर के नाम से जाना जाता है और यह कालपी रोड पर स्थित है. इससे कुछ किलोमीटर दूर रनिया एक दूसरे प्रमुख कस्बे के रूप में विकसित हुआ है. ऐतिहासिक रूप से अकबरपुर का संबंध मुगल काल के
अकबरपुर या शाहपुर परगना से रहा है. यह क्षेत्र जिले का मुख्य प्रशासनिक, शैक्षणिक और बाजार केंद्र है, जबकि कभी एक बड़ा गांव रहा रनिया अब 16 वार्ड वाली नगर पंचायत के रूप में विकसित हो चुका है. इसके विकास से जिला मुख्यालय क्षेत्र में अर्ध-शहरी आवासीय और व्यावसायिक केंद्र जुड़ा है.
अकबरपुर-रनिया विधानसभा क्षेत्र का गठन 2008 के परिसीमन के बाद हुआ था. यह सामान्य यानी अनारक्षित विधानसभा सीट है और अकबरपुर लोकसभा सीट के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से एक है. इसमें अकबरपुर, रनिया, रूरा और शिवली के कानूनगो सर्किल के साथ अकबरपुर, शिवली और रूरा के नगर क्षेत्र शामिल हैं. तीन कस्बों की मौजूदगी के बावजूद यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है.
नई विधानसभा सीट होने के कारण अकबरपुर-रनिया का चुनावी इतिहास सीमित है और अब तक यहां केवल तीन विधानसभा चुनाव हुए हैं. 2012 में समाजवादी पार्टी के राम स्वरूप सिंह ने बहुजन समाज पार्टी की प्रत्याशी प्रतिभा शुक्ला को 1,243 वोटों के मामूली अंतर से हराकर सीट जीती थी. उस चुनाव में भाजपा काफी पीछे चौथे स्थान पर रही थी और उसकी जमानत जब्त हो गई थी. 2017 में भाजपा ने प्रतिभा शुक्ला को पार्टी में शामिल करने के बाद उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया और पार्टी ने यहां शानदार वापसी की. उन्होंने समाजवादी पार्टी के नीरज सिंह को 28,729 वोटों से हराया. भाजपा ने 2022 में भी यह सीट बरकरार रखी. प्रतिभा शुक्ला को 92,827 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राम प्रकाश कुशवाहा को 79,410 वोट मिले. इस तरह प्रतिभा शुक्ला ने 13,417 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
अकबरपुर-रनिया विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले का असर यहां हुए चार लोकसभा चुनावों में भी दिखाई दिया है. 2009 में समाजवादी पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी पर 687 वोटों की बढ़त बनाई थी. 2014 में भाजपा चौथे स्थान से आगे बढ़कर पहले स्थान पर पहुंची और उसने बसपा पर 16,641 वोटों की बढ़त हासिल की. 2019 में भाजपा ने अपनी बढ़त और मजबूत की और बसपा के मुकाबले उसका अंतर 18,805 वोट रहा. 2024 में समाजवादी पार्टी ने अकबरपुर-रनिया विधानसभा क्षेत्र में फिर बढ़त हासिल की. समाजवादी पार्टी के अकबरपुर लोकसभा उम्मीदवार राजाराम पाल को 108,489 वोट मिले, जबकि भाजपा के उम्मीदवार देवेंद्र सिंह को 79,046 वोट मिले. इस तरह इस विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को 29,443 वोटों की बढ़त मिली. हालांकि अकबरपुर-रनिया में यह बदलाव होने के बावजूद देवेंद्र सिंह ने पूरे अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की.
2026 के विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण यानी एसआईआर से पहले अकबरपुर-रनिया में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी. 2012 में यह संख्या 287,578 थी, जो 2017 में बढ़कर 308,135 हो गई. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यह संख्या 312,870 थी. 2022 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 328,589 हो गई और 2024 में यह आंकड़ा 334,956 तक पहुंच गया. अंतिम एसआईआर मतदाता सूची में करीब 2.93 लाख मतदाता रह गए. एसआईआर के बाद मतदाताओं की शुद्ध संख्या में 35,767 की कमी दर्ज की गई, जो पुनरीक्षण से पहले की सूची के मुकाबले 10.89 प्रतिशत है. 2024 के मतदाता आंकड़े की तुलना में अंतिम सूची में करीब 42,000 मतदाता कम हैं.
अकबरपुर-रनिया में मतदाता मतदान का प्रतिशत अब तक हुए सभी संबंधित चुनावों में 60 प्रतिशत से अधिक रहा है. 2012 में मतदान प्रतिशत 64.99 रहा, जबकि 2017 में यह 65.97 प्रतिशत था. 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान 63.13 प्रतिशत रहा. 2022 के विधानसभा चुनाव में यह बढ़कर 64.93 प्रतिशत हो गया, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में इसमें कमी आई और मतदान प्रतिशत 62.31 रहा.
अकबरपुर-रनिया एक हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्र है, जहां सामाजिक संरचना मिश्रित है. अनुसूचित जाति की आबादी 25.96 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम आबादी करीब 8.50 प्रतिशत मानी जाती है. उपलब्ध जातीय अनुमानों के अनुसार ब्राह्मणों की हिस्सेदारी करीब 19.64 प्रतिशत, जाटवों की 16.07 प्रतिशत, यादवों की 14.28 प्रतिशत और कुशवाहाओं की 8.92 प्रतिशत है. अन्य प्रमुख समुदायों में ठाकुर, लोधी, पाल, कठेरिया, कुर्मी और अन्य ओबीसी समूह शामिल हैं.
2011 में विधानसभा क्षेत्र की करीब 87.49 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी, जबकि 12.51 प्रतिशत आबादी अकबरपुर, शिवली और रूरा के नगर क्षेत्रों में रहती थी. इससे इस विधानसभा क्षेत्र का ग्रामीण स्वरूप स्पष्ट होता है.
अकबरपुर इस विधानसभा क्षेत्र का प्रमुख कस्बा है. इसका इतिहास एक पुराने बसावट क्षेत्र से जुड़ा है, जिसे अलग-अलग समय में लक्ष्मीपुरवा, गुड़ईखेड़ा और शाहपुर के नाम से जाना जाता था. स्थानीय विवरणों के अनुसार मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में रिसालदार कुंवर सिंह के समय इसका नाम अकबरपुर रखा गया. कुंवर सिंह एक क्षत्रिय अधिकारी थे और उन्हें इस बस्ती के पुनर्निर्माण का श्रेय दिया जाता है. दो ऐतिहासिक तालाब, शुक्ल तालाब और कलारन तालाब, 16वीं शताब्दी के अंतिम दौर से जुड़े माने जाते हैं. इनका संबंध शीतल शुक्ल और छब्बा कलार से बताया जाता है. पास का रनिया कभी एक बड़ा गांव था, जो अब नगर पंचायत के रूप में विकसित हो चुका है और अकबरपुर के शहरी क्षेत्र के विस्तार का हिस्सा बन गया है.
अकबरपुर सड़क मार्ग से कानपुर, औरैया, कन्नौज, इटावा और मध्य उत्तर प्रदेश के अन्य प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है. दिल्ली-हावड़ा मुख्य रेल मार्ग पर स्थित रूरा रेलवे स्टेशन यहां का सबसे नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन है और यह अकबरपुर से करीब 14 किलोमीटर दूर है. कानपुर करीब 45 किलोमीटर, औरैया करीब 50 किलोमीटर, कन्नौज करीब 85 किलोमीटर और इटावा करीब 90 किलोमीटर दूर है. लखनऊ की दूरी करीब 120 किलोमीटर, आगरा की करीब 150 किलोमीटर और ग्वालियर की करीब 190 किलोमीटर है. अयोध्या और प्रयागराज की दूरी करीब 300 किलोमीटर, जबकि वाराणसी करीब 380 किलोमीटर दूर है.
अकबरपुर-रनिया में भाजपा का विधानसभा चुनावों में मजबूत रिकॉर्ड रहा है. 2012 में हार के बाद पार्टी ने लगातार दो विधानसभा चुनावों में यह सीट जीती है. हालांकि समाजवादी पार्टी ने यह भी दिखाया है कि लोकसभा चुनाव में यहां का राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल सकता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को भाजपा के मुकाबले 14.11 प्रतिशत अंक की बढ़त मिली, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की बढ़त 6.33 प्रतिशत अंक थी. लोकसभा चुनाव में यह बदलाव महत्वपूर्ण है, हालांकि विधानसभा क्षेत्र का अपना चुनावी इतिहास बताता है कि लगातार दो चुनावों के बीच बड़े बदलाव पहले भी होते रहे हैं. उदाहरण के लिए 2009 से 2014 के बीच भाजपा के वोट शेयर में 19.74 प्रतिशत अंक की तेज बढ़ोतरी हुई थी. इसी तरह 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों के बीच भाजपा के वोट शेयर में 32.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इससे पता चलता है कि व्यापक राजनीतिक समीकरण बदलने पर यहां चुनावी संतुलन तेजी से बदल सकता है. समाजवादी पार्टी के सामने अपनी लोकसभा बढ़त को विधानसभा स्तर के सामाजिक गठबंधन में बदलने की चुनौती होगी, जबकि भाजपा को लगातार दो विधानसभा चुनावों में मिली जीत से समर्थन मिलेगा.
2027 का चुनाव 2024 के लोकसभा चुनाव से काफी अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि में होगा. समाजवादी पार्टी को पिछले लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र में मिली बढ़त का लाभ है. भाजपा अब भी विधानसभा सीट पर काबिज है और 2012 में हार के बाद उसने समर्थन को मजबूत करते हुए लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की है. बहुजन समाज पार्टी की मौजूदगी, भले ही पहले की तुलना में कम हुई हो, लेकिन तीन प्रमुख सामाजिक समूहों के बीच मुकाबले में इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. खासकर तब, जब प्रमुख समुदायों के समर्थन में छोटे बदलाव भी अंतिम चुनावी संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं. एसआईआर ने एक और बदलाव जोड़ा है, हालांकि अभी ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि किसी खास जाति या समुदाय पर इसका अनुपातहीन प्रभाव पड़ा है. संक्षेप में, अकबरपुर-रनिया 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विधानसभा चुनावों के रिकॉर्ड और समाजवादी पार्टी के 2024 के लोकसभा प्रदर्शन से मिली बढ़त, दोनों के साथ आगे बढ़ रहा है. ऐसे में इस विधानसभा क्षेत्र का चुनाव राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुकाबला होगा.
(अजय झा)