पंजाब में चन्नी का 'सिद्धू अवतार', कांग्रेस फिर 5 साल पुराने मुकाम पर खड़ी है

पंजाब में कांग्रेस की गुटबाजी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. 2022 के चुनाव से पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच सियासी अदावत का खामियाजा कांग्रेस ने हार से चुकाया था. अब सिद्धू के अवतार में चरणजीत सिंह चन्नी हैं और उन्होंने राजा वडिंग के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है.

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पंजाब में नवजोत सिद्दू की राह पर चरणजीत सिंह चन्नी (Photo-ITG) पंजाब में नवजोत सिद्दू की राह पर चरणजीत सिंह चन्नी (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 07 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 3:01 PM IST

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछाई जा रही है, लेकिन कांग्रेस 2022 के ही मुहाने पर खड़ी नजर रही है. सूबे की सियासत में कांग्रेस उसी तरह से गुटबाजी का शिकार बनी हुई है, जिससे पार्टी को निजात मिलती नहीं दिख रही है. पांच साल पहले जो भूमिका नवजोत सिंह सिद्धू ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ निभाई थी, ठीक वैसे ही रोल में अब पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी दिख रहे हैं. 

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कांग्रेस हाईकमान यानि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे विधानसभा चुनाव को देखते हुए अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखते पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया. चन्नी चाहते थे कि प्रदेश अध्यक्ष बदल दिया जाए, लेकिन जब उनके मन की मुराद पूरी नहीं हुई तो सिद्दू के नक्शेकदम पर चलते नजर आ रहे हैं. 

पंजाब में जिस तरह से जब नवजोत सिंह सिद्धू ने तत्कालीन सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था, उसी तरह से चरणजीत सिंह चन्नी भी अपने समर्थक विधायक, सांसदों और नेताओं के साथ बैठक कर कांग्रेस हाईकमान को सियासी संदेश दे रहे हैं. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को फिर से गुटबाजी को चौराहे पर ला खड़ा किया है. 

हाईकमान के फैसले को चन्नी की 'चुनौती'
कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब कांग्रेस में संतुलन बनाने के लिए अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया तो चरणजीत सिंह चन्नी को खुश करने के लिए उन्हें चुनाव प्रचार समिति का चेयरमैन नियुक्त किया गया. जालंधर सांसद और पूर्व सीएम चन्नी खुद प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते थे, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने मौके की नजाकत को देखते हुए राजा वडिंग को नहीं बदला. 

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कांग्रेस 2022 का चुनाव हारने के बाद राजा वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था, उन्होंने पार्टी को हार की हताश से उभारा ही नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बेहतर मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया. यही वजह है कि कांग्रेस ने प्रदेश संगठन में बदलाव करने के बजाय राजा वडिंग के साथ चरणजीत सिंह चन्नी को साधे रखने का प्लान बनाया, लेकिन यह बात अब पूर्व सीएम चन्नी को रास नहीं आ रहा है. 

पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थक लगातार संगठन में बदलाव और नेतृत्व को लेकर सवाल उठा रहे हैं. मोरिंडा स्थित चन्नी के आवास पर पूर्व विधायकों और वरिष्ठ नेताओं की बैठक ने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर एक मजबूत असंतुष्ट खेमा सक्रिय हो चुका है. दूसरी तरफ प्रदेश के अध्यक्ष राजा वड़िंग लगातार विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं.

चन्नी और उनके समर्थकों  मानना है कि निकाय चुनाव और पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री होने के नाते प्रदेश अध्यक्ष का पद या 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा उनको घोषित किया जाना चाहिए था. राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद पर बनाए रखने के चलते चन्नी ने खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिसे सीधे तौर पर कांग्रेस हाईकमान के फैसले को चुनौती माना जा रहा है. 

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सिद्दू बनते नजर आ रहे चरणजीत चन्नी

पंजाब कांग्रेस एक बार फिर उसी दौर से गुजरती दिखाई दे रही है, जिसने 2021 में पार्टी को गहरे राजनीतिक संकट में डाल दिया था. उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चली लंबी खींचतान ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया था और 2022 में कांग्रेस के करारी मात खानी पड़ी थी. अ फिर कुछ वैसे ही नजर आ रहे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के बीच दिखाई दे रही है.

साल 2021 में कांग्रेस इसी तरह से गुटबाजी का शिकार थी. उस समय भी पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर लंबी खींचतान चली थी. बेअदबी मामले, संगठनात्मक फैसलों और नेतृत्व की भूमिका को लेकर मतभेद लगातार बढ़ते गए थे. ऐसे में कांग्रेस हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा और कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा. बाद में उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी और इसका असर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन पर साफ दिखाई दिया.


सिद्दू औऱ कैप्टन की अदावत से डूबी कांग्रेस 
साल 2017 में जब पंजाब में कांग्रेस सत्ता में आई, तो सिद्धू को भी मंत्री बनाया गया था. हालांकि, कुछ समय बाद ही कैप्टन और सिद्धू के बीच तनातनी शुरू हो गई थी. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यह राजनीतिक उथल-पुथल और तेज हो गई थी. दोनों ही नेता खुलकर एक दूसरे के खिलाफ बयान देने लगे थे. तब सिद्धू ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इस्तीफा भेजा, लेकिन पत्र मुख्यमंत्री को नहीं दिया था.

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सिद्दू  और उनके समर्थकों ने कैप्टन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, जिसके कांग्रेस के बीच आंतरिक कलह और खुलकर सामने आ गई थी. तब हरकत में आए कांग्रेस आलाकमान ने 2021 में उन्हें सुनील जाखड़ की जगह पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया. उसके बाद भी मामला नहीं थमा तो अमरिंदर सिंह को हटाकर 19 सितंबर 2021 में चरणजीत सिहं चन्नी को सीएम बना दिया गया था. इसके बाद सिद्धू और चन्नी कैंप में भी तनाव की खबरें सामने आईं थीं, जिसका खामियाजा 2022 में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार से चुकाना पड़ा. 

चन्नी के तेवर के बिगड़ा कांग्रेस का गेम

नवजोत सिंह सिद्दू कांग्रेस से खुद को किनारे कर लिया, अब चन्नी ने उनके रोल में आ गए हैं. चन्नी 2027 विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना चाहते हैं. इसके लिए चन्नी दावेदार है, लेकिन कांग्रेस बिना किसी चेहरे के चुनाव मैदान में उतरना चाहती है. ये बात चन्नी को स्वीकार नहीं है, जिसके लिए राजा वड़िंग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. 

कांग्रेस हाईकमान ने  पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल को डैमेज कन्ट्रोल करने के लिए भेजा, लेकिन चन्नी अलग ही मोड में नजर आ रहे हैं. बघेल की बैठक में शामिल होने के बजाय पार्टी हाईकमान से मिलने की जिद पर अड़े हैं. न्नी ने पंजाब कांग्रेस के भीतर एक ऐसा गुट तैयार कर लिया है, जिसमें राजा वड़िंग के पुराने साथी भी शामिल हो रहे हैं. चन्नी समर्थकों की मांग है कि पार्टी को तुरंत 2027 के लिए 'सीएम फेस' का ऐलान करना चाहिए. यह सीधे तौर पर राजा वड़िंग के सांगठनिक अधिकार को कमजोर करने की कोशिश है.

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आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और अकाली दल की अंदरूनी कमजोरी के कारण पंजाब में कांग्रेस के पास 2027 में वापसी का एक शानदार मौका बन रहा है, लेकिन चन्नी का यह 'सिद्धू अवतार' और राजा वड़िंग के साथ उनकी वर्चस्व की जंग कांग्रेस की लुटिया एक बार फिर डुबो सकती है. अगर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने समय रहते कड़ा फैसला नहीं लिया, तो पंजाब कांग्रेस एक और चुनावी आत्महत्या की ओर बढ़ जाएगी. 

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