स्‍टडी: पब्‍लि‍क प्‍लेस पर 78.4% महिलाओं ने झेली हिंसा, 38.5% चुपचाप सह गईं क्‍योंकि...

38.5 फीसदी उत्तरदाताओं ने माना कि उन्होंने हिंसा को रोकने में इसलिए हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि उन्हें करना क्या है. जानें- क्‍या कहती है पूरी स्‍टडी.

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प्रतीकात्‍मक फोटो (Getty) प्रतीकात्‍मक फोटो (Getty)

aajtak.in

  • नई द‍िल्‍ली,
  • 05 मार्च 2021,
  • अपडेटेड 5:36 PM IST

दो दिन बाद आठ मार्च को हम एक बार फिर अंतरराष्‍ट्रीय महिला द‍िवस मनाएंगे. इस दिन लोग नारी शक्‍त‍ि पर लंबे चौड़े व्‍याख्‍यान देंगे. लेकिन जमीनी स्‍तर पर आज भी महिलाएं हिंसा का श‍िकार हो रही हैं. वो घरों में ही नहीं पब्‍ल‍िक प्‍लेसेज पर भी इसका सामना कर रही हैं. महिलाओं के खिलाफ हिंसा को अस्वीकार्य बनाने के लिए काम करने वाली संस्था ब्रेकथ्रू इंडिया ने आज बायस्टेंडर बिहेवियर पर अपनी पहली स्टडी जारी की. इस स्‍टडी में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं.

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721 लोगों के बीच हुए ऑनलाइन सर्वे और 91 लोगों से सीधे इंटरव्यू के माध्यम से की गई इस स्टडी में बिहार, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तेलंगाना राज्यों के लोग शामिल थे. अधिकांश प्रतिभागियों, विशेष रूप से महिलाओं ने हिंसा को एक व्यापक शब्द के रूप में पहचाना, जिसमें शारीरिक, मानसिक, मौखिक और यौन शोषण शामिल थे. यह सर्वे इस बात पर भी रोशनी डालता है कि कैसे पितृसत्तात्मक प्रथाएं हमारे समाज में घर कर चुकी हैं और हमारे दिन-प्रतिदिन खराब होते मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबध पितृसत्तात्मक प्रथाओं से है.

2020 में उबर ने ग्लोबल ड्राइविंग चेंज कार्यक्रम के अन्तर्गत सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाने के लिए ब्रेकथ्रू के साथ मिलकर यह सर्वे क‍िया गया. इसी के तहत ब्रेकथ्रू ने उबर के साथ मिल कर सार्वजनिक जगहों से लिंग आधारित हिंसा को समाप्त करने और बायस्टेंडर को हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित करने के लिए इग्नोर नो मोर कैंपेन शुरू किया था. 

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सर्वे के निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए, सोहिनी भट्टाचार्य, अध्यक्ष और सीईओ, ब्रेकथ्रू ने कहा ऐसे अभियानों को शुरू करने में ब्रेकथ्रू का उद्देश्य यह है कि लोग महिला हिंसा को निजी मामला न मानते हुए समुदाय का मुद्दा मानें और एक साझा जिम्मेदारी लें और सामुदायिक कार्रवाई करें.

बता दें क‍ि लोगों द्वारा मदद की सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि वे परवाह नहीं करते हैं. बल्‍क‍ि हिंसा के लिए दोषी ठहराए जाने का डर, पुलिस और कानूनी प्रक्रियाओं में फंसना कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जो लोगों को दख़ल देने से रोकती हैं. ऐसी स्थितियों में क्या करना है, यह न जानना भी लोगों को हिंसा को रोकने में दख़ल देने से रोकती है. ऊबर के हेड ऑफ ड्राइवर, सप्लाई व सिटी आपरेशन्स ( भारत व दक्षिण एशिया) पवन वैश ने कहा कि ब्रेकथ्रू के साथ साझेदारी की वजह से बायस्टेंडर पर यह विस्तृत रिपोर्ट बन सकी है, हम आशा करते हैं कि इस रिपोर्ट के माध्यम से हमारे साझा कैंपेन #IgnoreNoMore को और ताकत मिलेगी. 

जानें सर्वे में क्‍या आया सामने 
54.6% उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने सार्वजनिक स्थान पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटना को रोकने में हस्तक्षेप किया है.
55.3% उत्तरदाताओं ने हिंसा का सामना करने वाली महिला/लड़की की परेशानी को देखा.
67.7% उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके हस्तक्षेप से हिंसा रुक गई.
78.4% महिलाओं ने कहा कि उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर हिंसा का अनुभव किया है (सार्वजनिक परिवहन शामिल नहीं है)
68% महिलाओं ने कहा कि उन्होंने सार्वजनिक परिवहन लेते समय हिंसा का अनुभव किया है.
70% उत्तरदाताओं ने कहा कि वे आदर्श रूप से हस्तक्षेप / बोलने से लिंग आधारित हिंसा के परिदृश्य में मदद करना चाहेंगे.
45.4% उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटना में हस्तक्षेप नहीं किया है.
38.5% उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि क्या करना है.
31% ने कहा कि वे अपनी सुरक्षा के बारे में चिंतित थे.
11.5% को लगता है कि उन्हें पुलिस / कानूनी मामलों में घसीटा जाएगा.

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