ऐसा था संजय गांधी का अंदाज, इमरजेंसी में निभाई भी अहम भूमिका

आज संजय गांधी की 72वीं जयंती है. कहा जाता है कि इमरजेंसी लागू करने के फैसले में संजय गांधी का बड़ा प्रभाव था.. जानिए उनके राजनीतिक सफर के बारे में...

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 संजय गांधी के इंदिरा गांधी साथ संजय गांधी के इंदिरा गांधी साथ

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 दिसंबर 2018,
  • अपडेटेड 11:08 AM IST

आज संजय गांधी की 72वीं जयंती है. उनका जन्म 14 दिसंबर, 1946 में हुआ. संजय गांधी को इंदिरा गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन उनके निधन से देश की सियासी हवा पूरी तरह बदल गई और इस घटना के चार बरस बाद जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो उनके बड़े पुत्र राजीव गांधी को उनकी विरासत संभालने के लिए सियासत में कदम रखना पड़ा.

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कुछ ऐसा था अंदाज

70 के दशक को संजय गांधी की वजह से यादगार माना जाता है. भारत में इमरजेंसी की भूमिका बहुत विवादास्पद थी. हालांकि, उनकी तेजतर्रार शैली और दृढ़ निश्चयी सोच की वजह से वो देश की युवा पसंद थे. संजय गांधी अपनी सादगी और भाषण के लिए जाने जाते थे. कहा जाता है कि वे प्लेन में भी कोल्हापुरी चप्पल पहनते थे, जिसके लिए राजीव गांधी उन्हें बार-बार चेतावनी देते थे कि संजय उड़ान से पहले चप्पल नहीं बल्कि पायलट वाले जूते पहने. हालांकि संजय उनकी सलाह पर कोई ध्यान नहीं देते थे.

इमरजेंसी में भी थी अहम भूमिका

महज 33 साल की उम्र में ही संजय गांधी सत्ता और सियासत की वो धुरी बन गए थे, जहां कहते हैं कि कैबिनेट भी बौना पड़ जाता था. संजय गांधी कभी इंदिरा गांधी के लिए ताकत बने तो कभी मजबूरी.  इंदिरा गांधी के निर्णायक फैसलों में संजय का दखल था और कहा जाता है कि देश पर इमरजेंसी थोपने में भी संजय की बड़ी भूमिका थी.

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देश में 35 साल तक इमरजेंसी लागू रखना चाहते थे संजय गांधी

25 जून 1975 की आधी रात को जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की तो चारों तरफ हड़कंप मच गया था. आपातकाल के फैसले को भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे काला दिन बताया गया, ये करीब 2 साल तक रहा. हालांकि, उस दौरान संजय गांधी की चलती तो करीब 35 साल तक देश में इमरजेंसी ही रहती. कहा जाता है कि इमरजेंसी लागू करने के फैसले में संजय गांधी का बड़ा प्रभाव था, उस दौरान भी जिस तरह से देश में फैसले लागू किए जा रहे थे वह पूरी तरह से संजय के ही नियंत्रण में थे.  बता दें, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर के मुताबिक, इमरजेंसी के बाद जब उनकी मुलाकात संजय गांधी से हुई तो उन्होंने इसपर उनसे बात की. तभी संजय गांधी ने उन्हें बताया था कि वह देश में कम से कम 35 साल तक आपातकाल को लागू रखना चाहते थे, लेकिन मां ने चुनाव करवा दिए.

कांग्रेस को फिर दिलाई जीत

इमरजेंसी के बाद 1977 की हार ने एक नए संजय गांधी को जन्म दिया. राजनीति को ठेंगे पर रखने वाले संजय गांधी ने राजनीति का गुणा-भाग सीख लिया. कहते हैं कि चरण सिंह जैसे महत्वाकांक्षी नेता को प्रधानमंत्री बनवाकर जनता पार्टी को तुड़वा दिया. इस बीच, जनता में इंदिरा गांधी की इमेज चमकाने के लिए हर हथकंडे आजमाए. साथ ही कांग्रेस में अपना यंग ब्रिगेड तैयार किया. उसके बाद नतीजा ये निकला कि 1980 के जनवरी में ना सिर्फ कांग्रेस ने केंद्र में सरकार बनाई, बल्कि 8 राज्यों में भी कांग्रेस की सरकार बनी. तब कांग्रेस के टिकट पर 100 ऐसे युवकों ने चुनाव जीता, जो संजय के ढर्रे पर राजनीति करते थे.

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मारुति की डाली नींव

पेड़ लगाने का आंदोलन और भारत में चीजों के बनने पर जोर उनके कार्यक्रम का प्रमुख हिस्सा था. उन्होंने वर्कशॉप में मारुति का डिजाइन बनाने की कोशिश की. भारत में मारुति 800 की नींव संजय गांधी ने ही डाली थी.

निधन

संजय गांधी का 23 जून, 1980 को विमान दुर्घटना में निधन हो गया था.

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