ग्रेजुएट-पोस्ट ग्रेजुएट यूथ के लिए नौकरी पाना हुआ मुश्किल! सरकारी रिपोर्ट में चौंकाने वाली तस्वीर

पीएलएफएस के 2022–23, 2023–24 और 2025 के आंकड़ों में ऊंची शिक्षा पाने वालों के बीच बेरोजगारी ज्यादा दिखी. अलग सर्वे तरीकों के कारण तुलना में सावधानी जरूरी है, लेकिन आंकड़े शिक्षा, हुनर और रोजगार के बीच कमजोर जुड़ाव पर सवाल उठाते हैं. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह...

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जितनी ऊंची डिग्री, उतना बड़ा बेरोजगारी का संकट? PLFS के आंकड़ों ने बढ़ाई देश के युवाओं की चिंता जितनी ऊंची डिग्री, उतना बड़ा बेरोजगारी का संकट? PLFS के आंकड़ों ने बढ़ाई देश के युवाओं की चिंता

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई द‍िल्ली ,
  • 22 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:05 PM IST

भारत के लाखों युवाओं के लिए एक अच्छी डिग्री केवल एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और बेहतर भविष्य की उम्मीद होती है. लेकिन सरकार के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) की वार्षिक रिपोर्ट के आंकड़े एक बेहद कड़वा सवाल सामने खड़ा करते हैं: क्या हमारी शैक्षणिक योग्यताएं युवाओं को पर्याप्त रोजगार दिलाने में सक्षम हो पा रही हैं?

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2022-23, 2023-24 और 2025 की रिपोर्ट्स के आंकड़े बताते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में बेरोजगारी की दर काफी अधिक है. आंकड़े योग्य नौकरी तलाशने वालों के सामने खड़े बड़े संकट की ओर इशारा करते हैं, हालांकि सालों के बीच तुलना करते समय सर्वे के तरीकों और परिभाषाओं के अंतर को समझना भी बेहद जरूरी है. आइए जानते हैं इन अंकों का गणित क्या कहता है?

इन आंकड़ों के असली मायने क्या हैं?

आंकड़े साफ दिखाते हैं कि शिक्षा के स्तर के साथ बेरोजगारी का ग्राफ भी बदलता है. 2022-23 और 2023-24 में कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में ग्रेजुएट्स और डिप्लोमा धारकों में बेरोजगारी की दर काफी अधिक थी. 2025 के आंकड़े तो और भी गंभीर तस्वीर पेश करते हैं, जहां ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी दर 22.3% और पोस्ट ग्रेजुएट्स या उससे अधिक पढ़े-लिखे लोगों में यह 24.7% तक दर्ज की गई है.

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ये आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं कि क्या लेबर मार्केट योग्य उम्मीदवारों के लिए पर्याप्त मौके बना पा रहा है? हालांकि, इन्हें किसी अंतिम निष्कर्ष की तरह देखने से पहले सर्वे की आयु वर्ग और कार्यप्रणाली को समझना जरूरी है.

एक्सपर्ट की राय: केवल रोजगार नहीं, 'सही रोजगार' है चुनौती

ट्रिपल आईटी हैदराबाद के डायरेक्टर प्रोफेसर संदीप शुक्ला इस बात पर जोर देते हैं कि सर्वे में 'रोजगार' को कैसे डिफाइन किया गया है, इसे ध्यान से समझना होगा.

PLFS अपनी शर्तों के हिसाब से अनौपचारिक काम और स्वरोजगार करने वालों को भी रोजगार की श्रेणी में रखता है. इसका मतलब है कि जो लोग काम नहीं कर रहे और नौकरी की तलाश बंद कर चुके हैं, वे लेबर फोर्स से बाहर हो सकते हैं. वहीं जिन्हें 'रोजगार में' गिना गया है, जरूरी नहीं कि वे पर्याप्त कमाई या सुरक्षित नौकरी में हों.

प्रोफेसर शुक्ला का मानना है कि डिग्री और मिलने वाले अवसरों के बीच का यह अंतर ग्रेजुएट्स के लिए सबसे बड़ी चिंता है. 12वीं पास होना उस तरह के प्रोफेशनल काम की गारंटी नहीं देता जिसकी युवा उम्मीद करते हैं, जबकि डिग्री या पोस्ट ग्रेजुएशन भी किसी स्थिर और अच्छे वेतन वाली नौकरी का भरोसा नहीं दे पाती. नतीजे के तौर पर कई ग्रेजुएट्स कम वेतन वाली अस्थायी नौकरियां करने पर मजबूर हैं, तो कुछ अपनी योग्यता के हिसाब से सही मौके का इंतजार कर रहे हैं.

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डिग्री से आगे बढ़कर प्रैक्टिकल अप्रोच और एंटरप्रेन्योरशिप

सेक्टर के हिसाब से देखें तो आईटी क्षेत्र में एंट्री-लेवल पदों के लिए इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स के बीच भारी प्रतिस्पर्धा है. हालांकि, किसी एक क्षेत्र के ट्रेंड को पूरे देश का पैमाना नहीं माना जा सकता.

प्रोफेसर शुक्ला के मुताबिक, इस चुनौती से निपटने के लिए एंटरप्रेन्योरशिप और प्रैक्टिकल प्रॉब्लम सॉल्विंग पर जोर देना होगा. स्कूल और कॉलेजों को चाहिए कि वे छात्रों को स्थानीय जरूरतों जैसे कृषि, स्थानीय प्रशासन, सप्लाई चेन और बिजनेस डिजिटलाइजेशन (AI के इस्तेमाल सहित) के लिए टेक्नोलॉजी-बेस्ड समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित करें. छोटे स्तर पर शुरू किए गए ऐसे प्रयास मिलकर बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा कर सकते हैं.

असल मुद्दा यह नहीं है कि देश में कितनी डिग्रियां बांटी जा रही हैं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हमारी शिक्षा छात्रों को सही स्किल देकर उन्हें वास्तविक रोजगार से जोड़ पा रही है?

'नौकरी होना' और 'अच्छी नौकरी होना' में अंतर

जनवरी 2025 से MoSPI ने अपने सैंपल डिजाइन और सर्वे कार्यप्रणाली में कुछ बदलाव किए हैं, इसलिए आंकड़ों का सटीक विश्लेषण पिछले सालों की रिपोर्ट्स के मापदंडों को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए.

लेकिन सबसे बड़ा सच यही है कि 'सिर्फ एक नौकरी होना' और 'एक अच्छी नौकरी होना' दो अलग बातें हैं. अगर काम में सही कमाई, सुरक्षा या करियर ग्रोथ नहीं है, तो वह उच्च शिक्षा पर किए गए निवेश और समय को सही ठहरा नहीं पाता. अपनी पढ़ाई में साल लगाने वाले भारतीय युवाओं के लिए असली परीक्षा यही है कि क्या उनकी डिग्री उन्हें एक बेहतर और सम्मानजनक भविष्य दे पा रही है या नहीं.

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