'मुझे लगता है कि मेरा सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग करियर खत्म हो चुका है.' नेताजी सुभाष चंद्र बोस यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (NSUT) के एक छात्र की यह एक लाइन इन दिनों सोशल मीडिया पर टेक इंडस्ट्री और हमारी एजुकेशन सिस्टम के खोखलेपन पर सबसे बड़ा तमाचा बनकर वायरल हो रही है. सालों की मेहनत, कोडिंग में महारत और कई प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स के अनुभव के बावजूद, यह छात्र आज बिना नौकरी और बिना डिग्री के खड़ा है.
NSUT के इस छात्र ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि उसने अपने कॉलेज के दिनों में सिर्फ किताबों में सिर खपाने के बजाय वास्तविक दुनिया के प्रोजेक्ट्स और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के प्रैक्टिकल स्किल्स पर ध्यान दिया. उसके पास काम का अच्छा-खासा अनुभव भी था. लेकिन जब बात 'डिग्री' और कॉर्पोरेट प्लेसमेंट की आई तो सिस्टम के ढर्रे ने उसे किनारे कर दिया. छात्र ने बताया कि कैसे बिना औपचारिक डिग्री के टेक कंपनियों ने उसके सालों के अनुभव और स्किल्स को दरकिनार कर दिया.
'डिग्री बनाम हुनर' की बहस फिर गर्म
यह खबर सिर्फ एक छात्र की नाकामी या निराशा की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के 'टेक ड्रीम' की उस हकीकत को उजागर करती है जहां आज भी प्रतिभा से ज्यादा कागज के पन्ने यानी डिग्री को तरजीह दी जाती है. ये कॉर्पोरेट की दोहरी मानसिकता ही है कि एक तरफ बड़ी टेक कंपनियां दावा करती हैं कि उन्हें 'स्किल्स' चाहिए, 'डिग्री' नहीं. लेकिन ग्राउंड रियल्टी यह है कि शॉर्टलिस्टिंग के पहले राउंड में ही बिना डिग्री वाले रिज्यूमे कचरे के डिब्बे में फेंक दिए जाते हैं.
NSUT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी अगर कोई छात्र प्रैक्टिकल नॉलेज में आगे है लेकिन कागजी क्रेडिट्स में पीछे छूट जाता है, तो सिस्टम उसे संभालने के बजाय बाहर का रास्ता दिखा देता है.
सोशल मीडिया पर फूटा छात्रों का गुस्सा
इस छात्र की पोस्ट सामने आने के बाद से ही इंजीनियरिंग के छात्रों और आईटी प्रोफेशनल्स के बीच तीखी बहस छिड़ गई है. कई यूज़र्स का कहना है कि भारत में इंजीनियरिंग अब सिर्फ 'डिग्री हासिल करने की दौड़' बनकर रह गई है, जहां वास्तविक कोडिंग और क्रिटिकल थिंकिंग सिखाने के बजाय सिर्फ क्रेडिट पूरे कराने पर जोर दिया जाता है. क्या 4 साल की मेहनत और लाखों की फीस के बाद एक छात्र का भविष्य सिर्फ इस बात से तय होगा कि उसके पास कागज का एक टुकड़ा है या नहीं?
NSUT के इस छात्र की आपबीती आज लाखों उन युवाओं की आवाज़ बन गई है जो हर दिन रात 2-2 बजे तक कोडिंग करने के बाद भी एक अनिश्चित भविष्य के मुहाने पर खड़े हैं.
आजतक एजुकेशन डेस्क