बिहार का नाम देश को सबसे ज्यादा IAS ऑफिसर देने के लिए जाना जाता है. लेकिन समय के साथ इसमें भी बदलाव देखा जा रहा है. जब आयशा वत्स ने कंटेंट बनाना शुरू किया, तो उन्हें वही बात सुनाई गई, जो बिहार के घरों में युवा वर्षों से सुनता आ रहा है और वे ये है कि बोरिया-बिस्तर बांधो और बाहर निकलो. विचार सीधा-सादा था कि अगर आप एक अच्छा करियर चाहते थे, तो घर छोड़ना पड़ेगा. कई सालों से बिहार के युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने, पेशेवर डिग्री हासिल करने या करियर बनाने के लिए दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों में चले गए. यूपीएससी की तैयारी राज्य की पहचान का अभिन्न अंग बन गई थी और पटना तथा अन्य शहर ऐसे स्थान माने जाते थे जहां से युवा विभिन्न महानगरों में अध्ययन करने, संघर्ष करने और स्थिरता प्राप्त करने के लिए जाते थे. सिविल सेवा, इंजीनियरिंग और सरकारी नौकरियां सफलता से जुड़ी चर्चाओं में प्रमुखता से शामिल थीं.
लेकिन आज एक नया रास्ता उभर रहा है.
पहले लोगों का मानना था कि मौके पाने के लिए उन्हें दिल्ली या मुंबई जाना पड़ता था. आज बिहार के क्रिएटर यह दिखा रहे हैं कि जगह से ज्यादा स्किल जरूरी है. लगभग 18,000 इंस्टाग्राम फॉलोअर्स वाली आयशा का कहना है कि वह अब कंटेंट क्रिएशन के जरिए हर महीने लगभग 80,000 रुपये कमाती हैं. उनकी कहानी बिहार में हो रहे एक बड़े बदलाव को दर्शाती है, जहां स्मार्टफोन, सस्ता इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे अवसर पैदा कर रहे हैं, जो पहले मौजूद नहीं थे. उनका कहना है कि बिहार अब केवल भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं बल्कि सबसे तेजी से बढ़ते वाला केंद्र भी बन गया है.
पहले क्या थी बिहार की पहचान?
बता दें कि बिहार की पहचान लंबे समय से शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी रही है. परिवारों ने कोचिंग में बड़े-बड़े इन्वेस्टमेंट करती थी ताकि उनके बच्चे सरकारी नौकरी की तैयारी कर सके. छात्रों ने सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए सालों बिताए. सफलता का मापदंड, चयन और तैनाती के आधार पर तय किया जाता था.
हालांकि, बिहार के युवा अभी भी पढ़ाई और नौकरी के लिए बड़े शहरों की ओर जा रहे हैं, लेकिन अब एक नया अवसर भी उभर रहा है. क्रिएटर इकोनॉमी की वजह से युवा अपने शहर में रहकर ही वीडियो,कहानी, खाना, फैशन, शिक्षा, कॉमेडी और स्थानीय संस्कृति से जुड़ा कंटेंट बनाकर करियर बना सकते हैं. कोफ्लुएंस की 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, टियर-3 और टियर-4 शहरों के क्रिएटर्स अब इन्फ्लुएंसर कैंपेन का लगभग 43-48% हिस्सा हैं.
इन छोटे शहरों के क्रिएटर्स की एंगेजमेंट दर (4.5-5.5%) जो मेट्रो शहरों (3-4%) से अधिक है. एलएचआर ग्रुप के संस्थापक और सीईओ अंकुर अग्रवाल का कहना है कि बिहार से क्रिएटर्स का उभरना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. उनके अनुसार, बिहार में प्रतिभाशाली और समझदार लोगों की कमी कभी नहीं रही. अब स्मार्टफोन,सस्ता इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उन्हें कम लागत में दुनिया तक पहुंचने का मौका दे दिया है.
फॉलोअर्स की संख्या कम लेकिन प्रभाव ज्यादा
हालांकि, लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया से कमाई करने के लिए लाखों में फॉलोअर्स होने चाहिए जो गलत है. जैसे मान लेते हैं कि अनुष्का राज के इंस्टाग्राम पर केवल लगभग 7,000 फॉलोअर्स हैं, लेकिन फिर भी वे हर महीने करीब 28,000 रुपये कमाती हैं. उनका कहना है कि बिहार में अब क्रिएटर्स के लिए अवसर बढ़ रहे हैं और ब्रांड्स भी उनके साथ काम करने में रुचि दिखा रहे हैं.
इसी तरह नितिका कुमारी ने बिहार के पारंपरिक खाने और संस्कृति पर कंटेंट बनाना शुरू किया. उनके फॉलोअर्स 11,000 से अधिक हो गए और अब वे कंटेंट क्रिएशन से हर महीने लगभग 50,000 रुपये कमाती हैं. देखा जाए तो, यह दोनों में से कोई भी बड़ी सेलिब्रिटी नहीं है और न ही इनके लाखों फॉलोअर्स हैं फिर भी उन्होंने बिहार की स्थानीय संस्कृति, भोजन और कहानियों को लोगों तक पहुंचाकर अच्छी कमाई का रास्ता बना लिया है.
बिहार का सबसे बड़ा फायदा?
जहां मेंट्रो सिटी में क्रिएटर्स के पास अच्छी टेक्नोलॉजी, बड़े नेटवर्क और ज्यादा फॉलोअर्स होते हैं, वहीं बिहार के पास कुछ ऐसा है जिसे खरीदा नहीं जा सकता है और वह है प्रामाणिकता.
कोफ्लुएंस की रिपोर्ट बताती है कि लोग अब बहुत ज्यादा चमक-दमक और महंगे प्रोडक्शन वाले वीडियो से ज्यादा असली और ऑथेंटिक कंटेंट पसंद करते हैं. लगभग 49.2% क्रिएटर्स का मानना है कि दर्शक ऐसे कंटेंट से बेहतर जुड़ाव महसूस करते हैं. रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि 62 फीसदी से अधिक क्रिएटर्स को ब्रांड्स की ओर से स्थानीय भाषाओं में कंटेंट बनाने के प्रस्ताव मिल रहे हैं. इसका मतलब है कि अब हिंदी, भोजपुरी, मैथिली जैसी क्षेत्रीय भाषाएं केवल एक अतिरिक्त विकल्प नहीं रह गई हैं बल्कि दर्शकों तक पहुंचने और विकास करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी हैं.
क्या कहती है रिपोर्ट?
रिपोर्ट में बिहार की एक क्रिएटर अमित परिमल का कहना है कि दर्शक उसे इसलिए जुड़ पाते हैं क्योंकि उनकी आवाज उनकी जैसी है. उनका यह भी कहना है कि बिहार में लोग जिस तरह से हिंदी बोलते हैं, उसी तरह से हिंदी बोलने से किसी भी बड़े बजट के विज्ञापन की तुलना में कहीं अधिक तेजी से विश्वास पैदा होता है. वे यह भी कहते हैं कि अब वह समय बीत चुका है जब क्रिएटरों को मुंबई या दिल्ली जाना पड़ता था. यह भरोसा इसलिए मायने रखता है क्योंकि क्रिएटर इकोनॉमी अब सिर्फ पहुंच तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट कहती है कि अगर कोई पटना का क्रिएटर 50,000 सक्रिय और भरोसेमंद फॉलोअर्स रखता है, तो वह कई मामलों में 50 लाख सामान्य फॉलोअर्स वाले किसी बड़े सेलिब्रिटी से भी बेहतर परिणाम दे सकता है.
तेजी से बढ़ी इकोनॉमी लेकिन सफलता की गारंटी नहीं
क्रिएटर इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है लेकिन यह सफलता की गारंटी नहीं है. कोफ्लुएंस की रिपोर्ट में बताया गया है कि दस में से नौ क्रिएटर्स अभी भी अपनी आय के लिए पूरी तरह से सोशल मीडिया पर निर्भर नहीं रह सकते. कई लोग अभी भी आय के अतिरिक्त स्रोतों पर निर्भर हैं.
ऐसे में एक्सपर्ट्स कंटेंट क्रिएशन को एक करियर के रूप में देखने के लिए चेतावनी भी देते हैं. इस क्षेत्र में अच्छी कमाई की संभावना जरूर है, लेकिन इसके साथ काफी अनिश्चितता भी जुड़ी हुई है. सफल होने के लिए नियमित रूप से कंटेंट बनाना, धैर्य रखना और सोशल मीडिया के बदलते एल्गोरिदम के सात दर्शकों की पसंद के अनुसार खुद को ढालना जरूरी होता है या जैसे अंकुर अग्रवाल कहते हैं कि सिर्फ शीर्ष 5% क्रिएटर्स ही बहुत अच्छी कमाई कर पाते हैं. अगले 20% लोग ठीक-ठाक जीवन यापन कर लेते हैं, जबकि अधिकांश लोगों के लिए यह केवल अतिरिक्त आय का स्रोत बनकर रह जाता है.
कितनी होती है कमाई?
यह वह सवाल है जिसका जवाब ज्यादातर युवा और उनके माता-पिता जानना चाहते हैं. क्या कंटेंट क्रिएशन सच में एक करियर बन सकता है? विशेषज्ञों के अनुसार, इसका उत्तर हां है. लेकिन इसके लिए एक बेहद अहम शर्त है. अग्रवाल कहते हैं कि कंटेंट क्रिएशन एक व्यवहार्य क्षेत्र है, लेकिन यह सैलरी वाली नौकरी नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि यह लागत, जोखिम और अनियमित जैसा है. वह बताते हैं कि स्थायी आय करने वाले क्रिएटर केवल एक ही प्लेटफॉर्म पर निर्भर नहीं रहते. वे कमाई के लिए कई तरीके अपनाते हैं, जैसे कंपनियों के साथ काम करना, प्रोडक्ट का प्रचार करके कमीशन कमाना, अपने दर्शकों के लिए विशेष प्रोडक्ट या सेवाएं बेचना और लाइव करना. इससे उनकी आय के कई स्रोत बन जाते हैं और किसी एक प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम हो जाती है.
बिहार के क्रिएटरों की कमाई इस तरह हो सकती है-
आयशा वत्स: लगभग 80,000 रुपये प्रति माह
नितिका कुमारी: लगभग 50,000 रुपये प्रति माह
अनुष्का राज: लगभग 28,000 रुपये प्रति माह
बिहार के कई युवाओं के लिए ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं. जैसा कि अग्रवाल बताते हैं कि पटना में एक क्रिएटर जो कंटेंट से महीने में 50,000 रुपये कमाता है, उसने वास्तव में अपना जीवन बदल लिया है.
बिहार की नई कहानी
कई सालों से बिहार की पहचान उन छात्रों की सफलता से जुड़ी रही जो यूपीएससी, आईआईटी-जेईई और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होते थे. ये उपलब्धियां आज भी अहम हैं लेकिन अब सफलता के नए रास्ते भी उभर रहे हैं. आज की युवा पीढ़ी पारंपरिक नौकरियों के बजाय कंटेंट क्रिएशन को करियर के रूप में अपना रही है. वे कैमरे और सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पहचान बना रहे हैं और दर्शकों तक अपनी प्रतिभा पहुंचा रहे हैं. जो बिहार कभी अपनी प्रतिभाओं को दूसरे राज्यों में भेजने के लिए जाना जाता था, वही अब बड़ी संख्या में क्रिएटर्स तैयार कर रहा हैय. पटना, मुजफ्फरपुर, गया और भागलपुर जैसे शहरों के हजारों युवाओं के लिए यह एक नया और महत्वपूर्ण करियर अवसर बनकर उभरा है.
प्रिंसी शुक्ला / चैतन्य धवन