मिग-29K के लिए स्वदेशी 80mm एयरो रॉकेट बनाने की बड़ी तैयारी, घरेलू कंपनियों को न्योता

भारतीय नौसेना ने मिग-29K लड़ाकू विमानों के 80mm एयरो रॉकेट बनाने के लिए घरेलू कंपनियों को बुलाया है. साल 2047 तक पूर्ण आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के तहत यह 'मेक इन इंडिया' का बड़ा कदम है.

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मिग-29के फाइटर जेट के लिए स्वदेशी कंपनियों को रॉकेट बनाने का न्योता दिया गया है. (Photo: ITG) मिग-29के फाइटर जेट के लिए स्वदेशी कंपनियों को रॉकेट बनाने का न्योता दिया गया है. (Photo: ITG)

शिवानी शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 05 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:04 PM IST

भारतीय नौसेना ने अपने फ्रंटलाइन लड़ाकू विमान बेड़े की मारक क्षमता को पूरी तरह से स्वदेशी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और बड़ा कदम उठाया है. नौसेना ने अपने विमानवाहक पोतों- आईएनएस विक्रमादित्य और आईएनएस विक्रांत पर तैनात मिग-29K लड़ाकू विमानों के लिए 80mm के अत्याधुनिक एयरो रॉकेट का निर्माण भारत में ही करने का फैसला किया है.  

इसके लिए भारतीय नौसेना ने देश की रक्षा निर्माता कंपनियों को डिजाइन और निर्माण के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया है. वर्तमान में यह 80-एमएम का एयरो रॉकेट एक 'अनगाइडेड एयर-टू-ग्राउंड' (हवा से जमीन पर मार करने वाला) हथियार है, जिसे पूरी तरह से विदेशों से आयात किया जाता है. 

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नौसेना द्वारा पिछले सप्ताह जारी किए गए Expression of Intent - EoI के जरिए भारतीय कंपनियों को इस फ्रंटलाइन गोला-बारूद के निर्माण के लिए आगे आने को कहा गया है. यह कदम भारतीय नौसेना के साल 2047 तक 'शत-प्रतिशत आत्मनिर्भर' बनने और गोला-बारूद के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अपनी निर्भरता को पूरी तरह से खत्म करने के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है.

यह 80-एमएम का शक्तिशाली एयरो रॉकेट रूसी मूल के जुड़वां इंजन वाले मिग-29K/KUB लड़ाकू विमानों का मुख्य हथियार माना जाता है, जो भारतीय नौसेना की हवाई मारक क्षमता की रीढ़ हैं. इन रॉकेटों को विमानों में लगे B8M-1 पॉड लॉन्चर से दागा जाता है. यह हथियार दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों को भेदने में सक्षम है. इसके फटने पर निकलने वाले जानलेवा घातक टुकड़े दुश्मन के रडार स्टेशनों, रनवे पर खड़े विमानों और जमीनी ठिकानों को पल भर में नेस्तनाबूद कर सकते हैं. 

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वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास लगभग 42 मिग-29K लड़ाकू विमान वर्किंग हैं, जो दोनों विमानवाहक पोतों पर तैनात हैं. नौसेना की योजना है कि जैसे ही स्वदेशी कंपनियों द्वारा बनाया गया प्रोटोटाइप कड़े विकास और परीक्षण चरणों को सफलतापूर्वक पार कर लेगा, वैसे ही तुरंत 273 लाइव रॉकेट और 2,400 प्रैक्टिस राउंड खरीदे जाएंगे. इस स्वदेशी रॉकेट को सेना में शामिल करने की संभावित समयसीमा साल 2026-27 तय की गई है.

स्वदेशी रॉकेट की बेजोड़ तकनीकी क्षमताएं

भारतीय नौसेना द्वारा जारी कड़े तकनीकी नियमों और मानदंडों के अनुसार, इन स्वदेशी रॉकेटों की शेल्फ-लाइफ कम से कम 15 वर्ष होनी चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रॉकेट -60°C की अत्यधिक कड़ाके की ठंड से लेकर +60°C की झुलसाने वाली गर्मी वाले तापमान में भी सटीकता से काम करने के लिए सक्षम होना चाहिए. 

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यह कठोर तापमान सीमा इसलिए तय की गई है ताकि भारतीय लड़ाकू विमान आर्कटिक जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले बर्फीले क्षेत्रों से लेकर हिंद महासागर की उमस भरी उष्णकटिबंधीय नौसैनिक परिस्थितियों में भी बिना किसी तकनीकी खराबी के दुश्मन पर हमला कर सकें. वजन और आकार की बात करें, तो इस एयरो रॉकेट का कुल वजन 11.3 किलोग्राम और इसकी लंबाई लगभग 1.54 मीटर होनी चाहिए, जबकि इसकी रफ्तार 600 मीटर प्रति सेकंड सुनिश्चित की गई है.

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हथियार की मारक क्षमता को अचूक बनाने के लिए इसकी प्रभावी फायरिंग रेंज 1.3 से 4.0 किलोमीटर के बीच रखी गई है. इस रॉकेट में 0.9 किलोग्राम का बेहद शक्तिशाली विस्फोटक वॉरहेड लगाया जाएगा, जो सीधे कोण पर टकराने पर दुश्मन के 400-mm मोटे स्टील के बख्तरबंद को भी आसानी से चीर सकता है. 

धमाके के साथ ही यह रॉकेट कम से कम 400 धातु के नुकीले टुकड़े पैदा करेगा, जिनमें से प्रत्येक का वजन लगभग 3 ग्राम होगा, जो आसपास के बड़े इलाके में तबाही मचाने के लिए काफी है. इसके अलावा, रॉकेट को पूरी तरह से सीलबंद होना चाहिए ताकि यह 20,000 मीटर तक की अत्यधिक ऊंचाई पर भी सुरक्षित रहे.

इसे 17,500 मीटर की ऊंचाई पर उड़ने वाले लड़ाकू विमानों से आसानी से दागा जा सके. पायलटों के प्रशिक्षण के लिए एक प्रैक्टिस वेरिएंट भी मांगा गया है, जो उड़ने और व्यवहार में बिल्कुल असली रॉकेट जैसा होगा, लेकिन उसमें विस्फोटक नहीं होगा.

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घरेलू कंपनियों के लिए कड़ी शर्तें

वर्तमान में भारतीय नौसेना के पास मौजूद 80-एमएम रॉकेटों का पूरा स्टॉक विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं से आयात किया गया है. भारत के भीतर इसका कोई भी स्वदेशी विकल्प या स्रोत उपलब्ध नहीं है. नौसेना ने अपने EoI में साफ कर दिया है कि जो कंपनियां इन महत्वपूर्ण रॉकेटों के निर्माण की दौड़ में शामिल होना चाहती हैं, उनके पास मजबूत तकनीकी अनुसंधान और विकास क्षमता, एडवांस टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और मजबूत वित्तीय क्षमता होनी चाहिए. कंपनियों को सैन्य-ग्रेड एयरो रॉकेट और ग्राउंड-बेस्ड रॉकेट प्रणालियों के डिजाइन और विकास में विशेषज्ञता साबित करनी होगी.

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भारतीय नौसेना ने इस सौदे के साथ आत्मनिर्भर भारत की अपनी नीति को सबसे ऊपर रखा है. नौसेना ने सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि रॉकेट के सभी भागों को पूरी तरह से स्वदेशी रूप से विकसित करना होगा. इसके उत्पादन के किसी भी चरण में किसी भी विदेशी मूल उपकरण निर्माता पर रत्ती भर भी निर्भरता नहीं होनी चाहिए.

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