अब बम गिरेगा नहीं, हवा में 'तैरकर' करेगा दुश्मन का काम तमाम, DRDO का टेस्ट सफल

DRDO और IAF ने ओडिशा तट पर स्वदेशी ग्लाइड वेपन 'TARA' का सफल परीक्षण किया. यह 450 किलो बमों को 100 किमी दूर तक सटीक हमला करने वाला ग्लाइड वेपन बनाता है.

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भारतीय वायु सेना के Su-30MKI फाइटर जेट से गिराया जाता तारा ग्लाइड वेपन. (Photo: DRDO/IAF) भारतीय वायु सेना के Su-30MKI फाइटर जेट से गिराया जाता तारा ग्लाइड वेपन. (Photo: DRDO/IAF)

मंजीत नेगी

  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:35 AM IST

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (DRDO) और भारतीय वायुसेना (IAF) ने ओडिशा तट के पास अपना पहला स्वदेशी ग्लाइड वेपन 'TARA' का सफल परीक्षण किया है. यह परीक्षण बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि TARA भारत को उन चुनिंदा देशों में शामिल करेगा जो अपनी पुराने बमों को सटीक और दूर मार करने वाले हथियार में बदल सकते हैं. इस सफलता से भारतीय वायुसेना की ताकत काफी बढ़ने वाली है.

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TARA का पूरा नाम Tactical Advanced Range Augmentation है. यह भारत का पहला स्वदेशी मॉड्यूलर रेंज एक्सटेंशन किट है. आसान भाषा में समझें तो TARA एक ऐसा सिस्टम है जो सामान्य अनगाइडेड बमों को स्मार्ट ग्लाइड वेपन में बदल देता है.

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इसमें विंग्स (पंखे), कंट्रोल सर्फेस और एक बेहतरीन गाइडेंस पैकेज लगाया जाता है. इससे पुराने बम हवा में लंबी दूरी तक ग्लाइड करके जा सकता है. बहुत सटीक निशाना लगा सकता है. TARA मुख्य रूप से भारतीय वायुसेना के पास मौजूद 450 किलोग्राम वाले बमों के साथ इस्तेमाल किया जाएगा.

नीचे दिया गया वीडियो प्रतीकात्मक हैं, इसी तरह से तारा भी हवा में तैरकर दुश्मन के लक्ष्य का खत्म करेगा. 

परीक्षण कैसे हुआ?

परीक्षण Su-30MKI फाइटर जेट से किया गया. विमान से तय ऊंचाई पर TARA को रिलीज किया गया. इसके बाद यह बिना किसी इंजन के हवा में ग्लाइड करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ा और सही जगह पर जाकर लगा.

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DRDO के वैज्ञानिकों ने पूरे रास्ते को रडार और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम से ट्रैक किया. परीक्षण में TARA की एयरोडायनामिक्स , नेविगेशन सिस्टम और आखिरी समय में सटीकता की पूरी जांच की गई. सब पूरे हुए.

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TARA की खासियतें

TARA की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर तक हमला कर सकता है. मतलब विमान दुश्मन की एयर डिफेंस की रेंज से काफी दूर रहकर भी लक्ष्य को निशाना बना सकता है.

यह हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम का इस्तेमाल करता है जिसमें इनर्शियल नेविगेशन और सैटेलाइट गाइडेंस दोनों शामिल हैं. इससे सटीकता बहुत ज्यादा रहती है. TARA मॉड्यूलर डिजाइन का है यानी इसे आसानी से अलग-अलग बमों पर लगाया जा सकता है.

यह विदेशी सिस्टम की तुलना में बहुत सस्ता भी है. इससे वायुसेना के पास पड़े लाखों पुराने बमों को आधुनिक हथियार में बदला जा सकेगा.

भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है TARA?

TARA भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल का एक बड़ा उदाहरण है. इससे पहले भारत को ऐसी क्षमता के लिए विदेशी हथियार खरीदने पड़ते थे, लेकिन अब हम खुद बना रहे हैं. यह सिस्टम वायुसेना को हार्ड टारगेट (मजबूत बंकर) और हाई वैल्यू टारगेट पर सटीक हमला करने की क्षमता देगा.

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विमान और पायलट दुश्मन के खतरे से दूर रहेंगे, जिससे उनकी सुरक्षा बढ़ेगी और मिशन की सफलता की संभावना भी ज्यादा हो जाएगी. TARA के बाद भारत उन कुछ देशों में शामिल हो गया है जिनके पास अपना खुद का ग्लाइड वेपन किट है. यह ब्रह्मोस और अन्य स्टैंड-ऑफ वेपन्स के साथ मिलकर भारतीय वायु सेना की मारक क्षमता को और मजबूत बनाएगा. DRDO अब और ज्यादा विकास परीक्षण और यूजर ट्रायल करेगा. 

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