उन्नाव रेप कांडः मोबाइल फोन से खुलेगा जानलेवा सड़क हादसे का राज

सड़क हादसे के वक्त हादसे की जगह से करीब पचास किलोमीटर के दायरे में कितने मोबाइल फोन एक्टिव थे? अगर यूपी पुलिस ने मोबाइल में छुपे इन राज़ को जान लिया तो समझ लीजिए कि हादसे का सच सामने आ जाएगा.

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अब इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले कर दी गई है अब इस मामले की जांच सीबीआई के हवाले कर दी गई है

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 31 जुलाई 2019,
  • अपडेटेड 1:07 PM IST

कानपुर-रायबरेली हाईवे पर जिस ट्रक ने उन्नाव रेप पीड़ित की कार को टक्कर मारी उसके डाइवर और क्लीनर दोनों के पास मोबाइल फोन थे. हादसे से पहले और हादसे के बाद उनके नंबरों पर बातचीत भी हुई. पर क्या सिर्फ रुटीन बातचीत थी? क्या उन्नाव से पीड़ित की कार का कोई पीछा कर रहा था? क्या पीछा करने वाले की ट्रक ड्राइवर या क्लीनर से मोबाइल पर बात हो रही थी? हादसे के वक्त हादसे की जगह से करीब पचास किलोमीटर के दायरे में कितने मोबाइल फोन एक्टिव थे? अगर यूपी पुलिस ने मोबाइल में छुपे इन राज़ को जान लिया तो समझ लीजिए कि हादसे का सच सामने आ जाएगा.

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कानपुर-रायबरेली हाईवे पर हुई मौत की इस टक्कर की साज़िश बेनक़ाब हो सकती है. ट्रक और कार में हुई टक्कर का सच सामने लाया जा सकता है. टक्कर जान बूझ कर मारी या अनजाने में हादसा हुआ ये पता चल सकता है. बस उस शख्स का पता चल जाए तो रेप पीड़ित की लड़की मारूति स्विफ्ट कार उन्नाव से रायबरेली की तरफ आ रही थी. जबकि ट्रक रायबरेली से फतेहाबाद की तरफ जा रहा था.

अगर ये हादसा साजिश है तो ज़ाहिर है बिना ट्रक ड्राइवर के मिलीभगत के ऐसा मुमकिन ही नहीं. पर ट्रक ड्राइवर को ये कैसे पता चलेगा कि जिस कार को टक्कर मारनी है, वो कार कब कितने बजे कहां से गुजरेगी? अगर ये साज़िश है तो फिर साज़िश रचने वालों ने रायबरेली-कानपुर हाईवेपर एक कास दायरे में वो जगह भी चुनी होगी, जहां टक्कर मारना आसान हो. जहां चश्मदीद कम हों. जहां पर गाड़ियां कम हों. जहां पर ट्रैफिक ना हो. क्योंकि धीमी रफ्तार में गाड़ियों के बीच टक्कर मारने का मतलब है सीधे पकड़े जाना.

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पर ट्रक और कार दो अलग-अलग दिशाओं से आ रहे थे. फिर ट्रक ड्राइवर को कैसे पता चला कि कार कब और कहां पहुंची और उसे कहां और किस वक्त टक्कर मारनी है? तो फिलहाल इस गुत्थी को सुलझाने के लिए पुलिस के पास एक ही रास्ता है. और वो है मोबाइल फोन और उस फोन का लोकेशन. मामले की जांच से जुड़े एक पुलिस अफसर की मानें तो अगर ये हादसा साजिश का हिस्सा है तो फिर ट्रक ड्राइवर, ट्रक क्लीनर और ट्रक के मालिक के अलावा कोई चौथा शख्स भी होगा जो लगातार फोन पर रहा होगा.

पुलिस हादसे की जगह और उस जगह से करीब पचास किलोमीटर पहले के सभी मोबाइल टावर को खंगाल रही है. ये पता लगाने के लिए जिस वक्त ये हादसा हुआ उससे पहले उस इलाके में कितने मोबाइल एक्टिव थे. खास कर ट्रक ड्राइवर और क्लीनर के मोबाइल पर हादसे से पहले किन-किन नंबरों से क़ल आए थे. और क्या कोई ऐसी कॉल भी थी, जिसकी लोकेशन वही था, जहां पर ये हादसा हुआ?

अगर ये पता चल जाए कि हादसे से पहले ट्राइवर या क्लीनर लगातार फोन पर था और दूसरी तरफ से जिसका फोन था उसका लोकेशन भी कतानपुर-रायबरेली हाईवे ही था तो इससे एक बात साफ हो जाएगी. और वो ये कि कोई था जो लगातार पीड़ित लड़की की कार के पीछे चल रहा था और उस कार के लोकेशन की जानकारी ट्रक ड्राइवर या क्लीनर को दे रहा था.

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शुरूआती जांच के मुताबिक ट्रक बांदा से रविवार रात लगभग एक बजे मोरंग लेकर रायबरेली के लिए निकला था. सुबह लगभग दस बजे ट्रक ड्राइवर ने रायबरेली में मोरंग पलटी. फिर पेमेंट लेने के बाद ट्रक वापस फतेहपुर के लिए रवाना हो गया. हादसे के वक्त यानी रविवार दोपहर करीब एक बजे तेज बारिश हो रही थी. जिस जगह पर ये हादसा हुआ उस जगह सड़क पर कोई डिवाइडर नहीं था. इसीलिए ट्रक और कार के बीच आमने-सामने से टक्कर हुई.

जांच में ये भी पता चला है कि ट्रक फतेहपुर के सपा नेता व पूर्व जिला सचिव नंदू पाल के भाई देवेंद्र पाल के नाम रजिस्टर्ड है. देवेंद्र के भाई ने आजतक से कहा कि उनका कुलदीप सिंह सेंगर से कोई लेना-देना नहीं है. साथ ही उनका ये बी कहना था कि नंबर ब्लेट पर ग्रीस फाइनेंसर से बचने के लिए पोती थी.

वहीं दूसरी तरफ हादसे के वक्त जो ड्राइवर ट्रक चला रहा था उसका नाम आशीष है. आशीष के पिता सूरज ने आजतक से कहा कि आशीष एक हफ्ता पहले घर से गया ड्यूटी पर. हालांकि उन्होंने कहा कि उसे गाड़ी एहतियात से चलानी चाहिए. पर इस बात से उन्होंने साफ इंकार किया कि वो या आशीष विधायक कुलदीप सेंगर को जानते हैं.

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फिलहाल ट्रक ड्राइवर, क्लीनर और ट्रक मालिक तीनों यूपी पुलिस की हिरासत में हैं. और पुलिस इनसे पूछताछ कर हादसे का सच जानने की कोशिश कर रही है. हालांकि एक शक ये भी है कि अगर ये हादसा साजिश का हिस्सा है तो हो सकता है कि ट्रक ड्राइवर, क्लीनर या मालिक को ये काम किसी तीसरे शख्स ने सौंपा हो. ताकि विधायक कुलदीप सेंगर का नाम सामने ना आ सके.

हालांकि पुलिस इनके अलावा विधायक और उसके करीबी लोगों के भी कॉल डिटेल खंगाल रही है. खबर तो यहां तक है कि विधायक जेल से भी मोबाइल पर बात करता है. हालांकि यूपी जेलों में ये आम बात है. पर देखना ये है कि जेल में बंद विधायक के कॉल डिटेल आम कर क्या यूपी पुलिस अपने ही महमके को बेनकाब करने की हिम्मत दिखा पाती है या नहीं?

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