एक दौर था जब राजधानी एक्सप्रेस में सफर करना भारतीय रेलवे के सबसे प्रीमियम अनुभवों में गिना जाता था. तेज रफ्तार, एयर कंडीशन कोच, लंबी दूरी का सफर और रास्ते में मिलने वाली सुविधाओं ने राजधानी को दशकों तक खास पहचान दी. फिर आई वंदे भारत, जिसने तेज इंटरसिटी सफर के साथ ट्रेन के कंफर्ट और सुविधाओं की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी. अब वंदे भारत स्लीपर भी ट्रैक पर आ चुकी है. आइए जानते हैं राजधानी और वंदे भारत में आखिर कितना फर्क रह गया है और किस सफर के लिए कौन सी ट्रेन बेहतर है?
राजधानी से शुरू हुआ रेल का प्रीमियम सफर
राजधानी एक्सप्रेस की शुरुआत 1969 में नई दिल्ली और हावड़ा के बीच हुई थी. इस ट्रेन ने करीब 1,450 किलोमीटर की दूरी लगभग 17 घंटे 20 मिनट में पूरी की थी. ये ट्रेनें देश की राजधानी नई दिल्ली को विभिन्न राज्यों की राजधानियों या प्रमुख शहरों से जोड़ती हैं. इसीलिए इन ट्रेनों के नाम में 'राजधानी' जुड़ा होता है. लंबी दूरी के सफर में तेज रफ्तार और AC यात्रा की वजह से राजधानी जल्द ही भारतीय रेलवे की सबसे खास ट्रेनों में शामिल हो गई.
इसके मुकाबले वंदे भारत का सफर काफी नया है. इसकी पहली कमर्शियल सेवा फरवरी 2019 में नई दिल्ली-वाराणसी रूट पर शुरू हुई. करीब 759 किलोमीटर की दूरी यह ट्रेन लगभग 8 घंटे में तय करती थी. शुरुआत में इसे 'Train 18' नाम दिया गया था. लेकिन यह नाम भारतीय न लगकर विदेशी ज्यादा लगता था. यही वजह थी कि आधुनिक भारत की इन मॉडर्न ट्रेनों को 'वंदे भारत' नाम दिया गया, जिसमें 'आत्मनिर्भर भारत' और भारतीय इंजीनियरों के टैलेंट दोनों की झलक मिलती हो.
राजधानी और वंदे भारत में कौन ज्यादा तेज
स्पीड की बात करें तो वंदे भारत राजधानी से आगे है. वंदे भारत ट्रेनसेट 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार के लिए डिजाइन किए गए हैं. ट्रायल के दौरान इसके ट्रेनसेट 183 किलोमीटर प्रति घंटे तक की स्पीड पर भी पहुंचे हैं. हालांकि किसी ट्रेन की एफिशिएंसी सिर्फ उसकी अधिकतम स्पीड से तय नहीं होती. रूट, ट्रैक की स्थिति, स्पीड लिमिट, ट्रैफिक, स्टेशन और स्टॉपेज के कारण सफर का कुल समय बदल सकता है. राजधानी एक्सप्रेस की अधिकतम ऑपरेशनल स्पीड आमतौर पर करीब 130 किलोमीटर प्रति घंटे रहती है.
किस तरह के सफर के लिए कौन सी ट्रेन?
दोनों ट्रेनों के लिए कोई एक तय दूरी की सीमा नहीं है, लेकिन इनके इस्तेमाल का पैटर्न अलग है. वंदे भारत को मुख्य रूप से तेज इंटरसिटी सफर (एक शहर से दूसरे शहर को जोड़ने वाली ट्रेन) के लिए डिजाइन किया गया है. इसके कई रूट ऐसे हैं जहां यात्री सुबह निकलकर उसी दिन अपने गंतव्य तक पहुंच सकते हैं. राजधानी की पहचान लंबी दूरी के सफर से रही है. खासकर रातभर की यात्रा में इसका इस्तेमाल ज्यादा होता है, क्योंकि इसमें यात्रियों को सोने के लिए बर्थ मिलती है. यही वजह है कि सफर की दूरी और यात्रा के समय के हिसाब से दोनों में से किसी एक को चुनना ज्यादा आसान हो जाता है.
स्टैंडर्ड वंदे भारत में चेयर कार और एग्जीक्यूटिव चेयर कार होती है. इनमें आरामदायक रिक्लाइनिंग सीटें मिलती हैं. एग्जीक्यूटिव चेयर कार में यात्रियों को ज्यादा जगह मिलती है और कुछ ट्रेनसेट में सीट को 180 और 360 डिग्री तक रोटेट करने की सुविधा भी होती है. लेकिन स्टैंडर्ड वंदे भारत में सोने के लिए पारंपरिक स्लीपिंग बर्थ नहीं होती. राजधानी एक्सप्रेस में फर्स्ट AC, सेकंड AC और थर्ड AC क्लास मिलती हैं. फर्स्ट AC में केबिन और कूपे जैसी ज्यादा प्राइवेसी मिलती है. वहीं सेकंड AC में 2-टियर और थर्ड AC में 3-टियर बर्थ होती हैं.
अब यही अंतर वंदे भारत स्लीपर की वजह से काफी कम हो रहा है. वंदे भारत स्लीपर ट्रेनसेट में 16 AC स्लीपर कोच हैं. यानी यात्रियों को वंदे भारत की नई तकनीक और सुविधाओं के साथ रात में सोकर सफर करने का विकल्प भी मिल रहा है. हालांकि, वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें अभी बहुत ज्यादा नहीं हैं. आने वाले कुछ सालों में हमें और ज्यादा वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें देखने को मिलेंगी. माना जा रहा है कि वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें भविष्य में राजधानी ट्रेनों को रिप्लेस कर देंगी. हालांकि, रेलवे ने इसे लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है.
दोनों ट्रेनों में खाने-पीने में क्या है अंतर?
दोनों ट्रेनों में लंबी यात्रा के दौरान खानपान की सुविधा मिलती है, हालांकि मेन्यू और सर्विस ट्रेन के रूट के हिसाब से अलग हो सकती है. वंदे भारत में IRCTC की ओर से यात्रा के समय के हिसाब से चाय, नाश्ता, लंच, शाम के स्नैक्स और डिनर जैसी चीजें दी जाती हैं. मेन्यू में पोहा, उपमा, पराठा, सैंडविच, कटलेट, दाल, सब्जी, पनीर, चिकन, रोटी, चावल, मिठाई और पेय जैसी चीजें शामिल होती हैं. कुछ वंदे भारत ट्रेनों में फूड चॉइस ऑप्शनल होती है.
यानी यात्री को अगर ट्रेन में नाश्ता-खाना-स्नैक्स चाहिए तो उसे टिकट बुक करते समय ही इसे चूज करना होता है. अगर नहीं चाहिए तो फूड ऑप्शन को चूज नहीं करना होता है. इसी हिसाब से टिकट की प्राइस भी तय होती है. राजधानी में सफर लंबा होने के कारण खानपान का शेड्यूल भी आमतौर पर बड़ा होता है. सुबह की चाय से लेकर नाश्ता, लंच, शाम के स्नैक्स और डिनर तक की व्यवस्था हो सकती है. फर्स्ट AC में कुछ अतिरिक्त आइटम भी मिल सकते हैं.
वंदे भारत तकनीक में राजधानी से आगे
अगर सिर्फ एक्सीलरेशन (रफ्तार पकड़ने की क्षमता) की बात करें, तो वंदे भारत ट्रेनें, राजधानी एक्सप्रेस से साफ तौर पर आगे हैं. इसकी वजह दोनों ट्रेनों का मूल डिजाइन है. वंदे भारत एक सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रेनसेट है. यानी इसमें अलग से एक लोकोमोटिव लगाकर पूरी ट्रेन को खींचने की व्यवस्था नहीं है. इसके कोच में ही मोटर लगे होते हैं, जो ट्रेन को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी ताकत जनरेट करते हैं. इसे डिस्ट्रीब्यूटेड या डिसेंट्रलाइज्ड ट्रैक्शन टेक्निक कहा जाता है. यानी वंदे भारत ट्रेनों का हर कोच अपने आप में इंजन का काम करता है. इसी वजह से ट्रेन कुछ ही सेकंड में हाई स्पीड पकड़ लेती है.
वंदे भारत ट्रेनें सिर्फ 52 सेकंड में 0 से 100 किमी/घंटे की रफ्तार पकड़ सकती हैं. वंदे भारत के स्लीपर वर्जन में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग टेक्निक का उपयोग हुआ है. यानी ट्रेन का ब्रेक लगने पर बिजली जनरेट होती है. इससे ऊर्जा बचाने में मदद मिलती है. दूसरी ओर ज्यादातर राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनें लोकोमोटिव-हॉल्ड डिजाइन वाली पुरानी व्यवस्था से चलती हैं. एक लोकोमोटिव पूरी ट्रेन को खींचता है. यानी पावर एक जगह से आती है. इसका मतलब यह नहीं कि राजधानी धीमी ट्रेन है. आधुनिक राजधानी रेक और लोकोमोटिव भी अच्छी रफ्तार पकड़ सकते हैं.
कंफर्ट और सुविधाओं में कौन है आगे?
वंदे भारत को शुरू से ही नए जनरेशन की ट्रेन के तौर पर तैयार किया गया है. इसमें ऑटोमैटिक दरवाजे, बेहतर सीटिंग, पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम, CCTV कैमरे, चार्जिंग पॉइंट और बायो-वैक्यूम टॉयलेट जैसी सुविधाएं मिलती हैं. राजधानी पुरानी ट्रेन सर्विस जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसके सभी कोच पुराने हैं. खासकर तेजस राजधानी जैसे अपग्रेडेड रेक में ऑटोमैटिक दरवाजे, CCTV, फायर और स्मोक डिटेक्शन सिस्टम, बेहतर इंटीरियर और बायो-वैक्यूम टॉयलेट जैसी आधुनिक सुविधाएं दी गई हैं. हालांकि, लुकवाइज वंदे भारत ट्रेने ज्यादा मॉडर्न नजर आती हैं.
रात के सफर में अब मुकाबला दिलचस्प
अगर आपका सफर लंबी दूरी का है और आपको रात में ट्रेन में सोकर जाना है, तो राजधानी अब भी एक मजबूत विकल्प है. वहीं अगर सफर कुछ घंटों में पूरा हो सकता है और आप दिन में आरामदायक यात्रा करना चाहते हैं, तो वंदे भारत ज्यादा सुविधाजनक विकल्प हो सकती है. लेकिन वंदे भारत स्लीपर ने समीकरण जरूर बदल दिया है. अब यात्री नई जनरेशन की ट्रेन में स्लीपर यात्रा का विकल्प भी चुन सकते हैं.
पांच दशक से ज्यादा समय तक राजधानी एक्सप्रेस भारतीय रेलवे की प्रीमियम लॉन्ग डिस्टेंस जर्नी की पहचान रही है. वंदे भारत ट्रेनों ने इसमें तेज रफ्तार, आधुनिक सुविधाओं और नए डिजाइन के साथ बदलाव किया. अब स्लीपर वंदे भारत के आने से दोनों ट्रेनों के बीच का अंतर और कम हो रहा है. आने वाले समय में असली मुकाबला सिर्फ स्पीड का नहीं, बल्कि कंफर्ट, यात्रा समय, बर्थ, सुविधाओं और किराए का भी होगा.
आजतक बिजनेस डेस्क