चीन से डर गए ट्रंप? रेयर अर्थ मिनरल समेत वो 5 कारण जिससे बीजिंग पर टैरिफ लगाने से हिचक रहा अमेरिका

ट्रंप आखिर चीन पर टैरिफ लगाने से क्यों हिचक रहे हैं? चीन वैसे तो अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक प्रतिद्वंदी है और दोनों देशों के बीच लंबे वक्त से ट्रेड वॉर चल रहा है. लेकिन चीन पर टैरिफ लगाने के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति अब तक नरम नजर आए हैं. 

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टैरिफ को लेकर चीन पर नरम क्यों हैं ट्रंप (Photo: ITG) टैरिफ को लेकर चीन पर नरम क्यों हैं ट्रंप (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 अगस्त 2025,
  • अपडेटेड 11:31 AM IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लागू कर दिया है और आने वाले दिनों में इसे बढ़ाकर 50 फीसदी करने जा रहे हैं. लेकिन दूसरी तरफ वह भारत के पड़ोसी देश चीन पर मेहरबान नजर आ रहे हैं. ट्रंप ने चीन को नए टैरिफ रेट लागू करने के लिए 90 दिन की मोहलत दे रखी है और वह बातचीत के जरिए बीच का रास्ता खोजना चाहते हैं. आखिर चीन के लिए ट्रंप की इस दरियादिली की वजह क्या है?

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रेयर अर्थ मिनरल का पेच

क्या ट्रंप चीन पर टैरिफ लगाने से डर रहे हैं? चीन वैसे तो अमेरिका का सबसे बड़ा व्यापारिक प्रतिद्वंदी है और दोनों देशों के बीच लंबे वक्त से ट्रेड वॉर चल रहा है. लेकिन चीन पर टैरिफ लगाने के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति अब तक नरम नजर आए हैं. इसकी अहम वजह दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (Rare Earth Minerals) को माना जा रहा है, जिनके लिए लिए अमेरिका बहुत हद तक चीन पर निर्भर करता है. 

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इस साल की शुरुआत में बीजिंग ने इस सेक्टर में अपने प्रभुत्व का फायदा उठाते हुए ट्रंप के टैरिफ का जवाब भी दिया था और सात दुर्लभ रेयर अर्थ प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा दी थी. इन प्रतिबंधों ने वैश्विक निर्माताओं, विशेषकर वाहन निर्माताओं के लिए मुश्किलें पैदा कर दीं, जो रेयर अर्थ मैटेरियल पर निर्भर हैं.

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चीन का प्रभाव, अमेरिका की निर्भरता

जिनेवा में मई में हुई बातचीत के बाद अमेरिका और चीन ने अपने बढ़ते टैरिफ पर 90 दिन की रोक का ऐलान किया था. इस दौरान अमेरिकी टैरिफ 145 फीसदी से घटाकर 30 प्रतिशत और चीनी टैरिफ 125 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी कर दिए गए. लेकिन हाल के दिन में यह सीजफायर खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा था, जब वॉशिंगटन ने बीजिंग पर दुर्लभ मृदा के निर्यात पर प्रतिबंधों को कम करने के लिए तेजी से कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया था.

दरअसल, चीन इन खनिजों का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर और एक्सपोर्टर है. इन खनिजों का इस्तेमाल हाईटेक इंडस्ट्री और रक्षा उपकरणों के लिए किया जाता है. अमेरिका इस निर्भरता को कम करने के लिए अन्य देशों के साथ साझेदारी की कोशिश कर रहा है, जिनमें म्यांमार सबसे प्रमुख है. 

सस्ते सामान की तलाश

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन पर टैरिफ लगाने के लिए कई बार बयान दिए, लेकिन इन योजनाओं को पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका. चीन ने इन दुर्लभ खनिजों पर प्रतिबंध को एक आर्थिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है और इस मामले में अब तक बीजिंग की रणनीति कारगर भी रही है. अमेरिका को अपने फाइटर जेट्स और अन्य हथियारों के लिए इन खनिजों की जरूरत होती है और चीन के दबाव ने ट्रंप को झुकने के लिए मजबूर कर दिया है. 

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भारत पर उच्च दर का टैरिफ लगाकर अमेरिका को अब किसी अन्य देश से सस्ते सामान की तलाश है. भारत का माल अब भारी-भरकम टैरिफ देकर अमेरिका जाएगा तो पहले से महंगा बिकेगा. ऐसे में सस्ते सामान तक अमेरिकियों की पहुंच के लिए ट्रंप चीन की तरफ देख रहे हैं. टैरिफ लगाने से चीन के सामानों की कीमत अमेरिकी बाजार में बढ़ जाएगी और इसका असर अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. अगर बीजिंग रेसिप्रोकल टैरिफ लगाता है तो अमेरिकी सामान भी चीन में महंगे होंगे. इससे अमेरिकी निर्यातकों को नुकसान होगा. ऐसे में अपनी अर्थव्यवस्था और कारोबारियों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए ट्रंप प्रशासन के हाथ बंधे हुए हैं. 

ग्लोबल सप्लाई चेन और घरेलू दबाव

अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर का असर सिर्फ इन दो देशों पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर पड़ेगा. इससे ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित होगी और कई देशों की इकोनॉमी पर इसकी मार पड़ सकती है. चीन के खिलाफ सख्त रुख दिखाना एक तरह से ट्रंप की मजबूरी भी है. राष्ट्रपति के चुनाव में यह एक प्रमुख मुद्दा रहा है. लेकिन दूसरी ओर चीन पर भारी टैरिफ लगाने से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का दबाव बढ़ सकता है.  ऐसे में घरेलू अर्थव्यवस्था को संतुलित रखते हुए चीन पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत ट्रंप अभी चीन को मोहलत दे रहे हैं. 

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आर्थिक टकराव की आशंका

चीन दुनिया की बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति है. अमेरिका के साथ उसके रिश्ते सिर्फ कारोबारी नहीं बल्कि जियो-पॉलिटिकल नजरिए से भी काफी अहम हैं. दोनों देशों के बीच कोई भी आर्थिक टकराव दुनियाभर के बाजारों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. यही वजह है कि ट्रंप अभी बातचीत के लिए इसका हल निकालने में लगे हैं. दूसरी ओर अमेरिका की नजर चीन और रूस के बीच होने वाली एनर्जी डील पर भी है. इसी वजह से ट्रंप चीन के खिलाफ भारत जैसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते, क्योंकि इससे अमेरिकी की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ सकता है.

तकनीकी क्षेत्र में निर्भरता

दुर्लभ खनिजों के अलावा अमेरिका बाकी कई सेक्टर्स में चीन पर निर्भर करता है. सेमीकंडक्टर से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी के मामले में अमेरिकी कंपनियां चीन पर निर्भर करती हैं. ऐसे में अमेरिका किसी भी कीमत पर चीन के साथ रिश्ते बिगाड़कर अपने कारोबारियों को नाराज नहीं करना चाहता है. इन सेक्टर्स में अमेरिका को आत्मनिर्भर होने में अभी वक्त लगेगा. 

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