भारत के कंपनी कानून में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. संसद की एक समिति ने मैनेजिंग डायरेक्टर और व्होल-टाइम डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए मिनिमम एज लिमिट 21 से घटाकर 18 साल करने की सिफारिश की है. इस बदलाव के बाद भारत अमेरिका, सिंगापुर, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के क्लब में शामिल हो जाएगा, जहां 18 साल की उम्र में लड़के-लड़कियां किसी कंपनी के बॉस बन सकते हैं.
संसदीय समिति ने मैनेजिंग डायरेक्टर और व्होल-टाइम डायरेक्टर की मैक्सिमम एज 70 से बढ़ाकर 75 साल करने की भी सिफारिश की है. इसके लिए विशेष प्रस्ताव की जरूरत न हो, यह भी कहा गया है. हालांकि, किसी भी नियम में बदलाव से पहले इन सिफारिशों को कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा. संसद में पेश रिपोर्ट में मंदसौर के बीजेपी सांसद सुधीर गुप्ता की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने कहा कि विचार-विमर्श के दौरान न्यूनतम उम्र 21 से घटाकर 18 साल करने पर आम सहमति बनी.
कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि कंपनी बोर्ड में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एचएलसी-पॉलिसी कमीशन से भी इसी तरह के सुझाव मिले थे. संसदीय समिति ने प्रस्तावित विधेयक में शामिल कुछ प्रस्ताव हटाने की भी सिफारिश की. इनमें नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) से जुड़े एक प्रस्ताव को हटाकर उसकी जगह जुर्माने का प्रावधान करने की बात कही गई. समिति ने कुछ खास मामलों के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की विशेष पीठ बनाने का समर्थन भी किया.
संसदीय समिति के अन्य प्रमुख सुझाव
रिपोर्ट में कहा गया कि सिर्फ दिवाला मामलों (Insolvency Cases) पर ध्यान देने वाली अलग पीठें तय समयसीमा का सख्ती से पालन करा सकती हैं. इससे इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी मामलों में दबाव झेल रही संपत्तियों की कीमत घटने से बचाने में मदद मिलेगी. साथ ही, नियमित पीठों पर अचानक पड़ने वाला काम का बोझ कम होगा और वे सामान्य कॉरपोरेट रिस्ट्रक्चरिंग, मर्जर और बदलाव जैसे मामलों पर तय समय में ध्यान दे सकेंगी. संसदीय समिति 1,100 से ज्यादा पन्नों की अपनी रिपोर्ट में एक नया अध्याय जोड़ने का प्रस्ताव भी दिया है, ताकि विदेशी कंपनियां अपने मूल देश में बंद करने की प्रक्रिया के बिना इंडियन फाइनेंशियल सिस्टम कोड (IFSC) में सहज तरीके से री-डोमिसाइल हो सकें. समिति ने कहा कि विदेश में कामकाज रखने वाले काफी भारतीय प्रमोटर भारत लौटना चाहते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियों की विदेशी सहायक इकाइयों को फिर से भारत लाने और रिवर्स-फ्लिपिंग को आसान बनाने के लिए ऐसा कानूनी ढांचा जरूरी है, जिसमें टैक्स, कैपिटल गेन्स, स्टांप ड्यूटी, संपत्तियों और देनदारियों के ट्रांसफर और वेस्टिंग, फाइलिंग और कंप्लायंस, अधिकारों और दायित्वों की निरंतरता, और इससे जुड़े दूसरे जरूरी मामलों का प्रावधान हो. अगर यह सिफारिश लागू होती है तो सीनियर मैनेजमेंट की भूमिकाओं के लिए योग्य लोगों का दायरा बढ़ सकता है, खासकर परिवार आधारित कारोबार और प्रमोटर-नेतृत्व वाली कंपनियों में, जहां कम उम्र के उत्तराधिकारियों को पहले से नेतृत्व के लिए तैयार किया जाता है. इससे कॉरपोरेट लीडरशिप में नई पीढ़ी के लिए रास्ता खुल सकता है.
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