बिहार में विधान परिषद की 10 सीटों के लिए 10 उम्मीदवारों के नामांकन की प्रक्रिया 8 जून को पूरी हो गई. 11 जून को उम्मीदवारों के नाम वापसी की समय सीमा खत्म होने के बाद सभी 10 उम्मीदवारों का निर्विरोध निर्वाचन तय हो जाएगा. जिन चेहरों का विधान परिषद जाना लगभग तय माना जा रहा है, उनमें भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के चार-चार, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के एक-एक उम्मीदवार शामिल हैं.
सम्राट चौधरी की अगुवाई वाली कैबिनेट के 7 मई को हुए विस्तार में मंत्री पद की शपथ लेने वाले निशांत कुमार भी विधान परिषद के लिए निर्वाचित हो जाएंगे. पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत एमएलसी बन जाएंगे, लेकिन उन्हीं के साथ कैबिनेट मंत्री की शपथ लेने वाले उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश के भविष्य को लेकर संकट खड़ा हो गया है. निशांत कुमार और दीपक प्रकाश, दोनों को जब मंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी तो वे न विधानसभा के सदस्य थे, ना विधान परिषद के.
संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक मंत्री पद की शपथ लेने के बाद छह महीने के भीतर संबंधित व्यक्ति का किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है. निशांत और दीपक प्रकाश, दोनों को ही किसी न किसी सदन का सदस्य बनना था, ऐसे में नजरें विधान परिषद चुनाव पर थीं. बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार तो विधान परिषद पहुंच जाएंगे, लेकिन दीपक प्रकाश की पार्टी को कोई सीट एनडीए में नहीं मिली. ऐसे में उनके मंत्री बने रहने को लेकर भी अब सवाल खड़े होने लगे हैं.
गौरतलब है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार चुनाव में एनडीए की जीत के बाद नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार में अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवाया था. नवंबर 2025 में दीपक पहली दफे राज्य कैबिनेट में मंत्री बने, लेकिन वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. उस वक्त भी उनके सामने इस बात की बाध्यता थी कि वह छह महीने के अंदर किसी सदन के सदस्य निर्वाचित हों. उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा के विधायक होने के बावजूद बेटे के राजनीतिक भविष्य को ऊंचाई देने के लिए उन्हें मंत्री बनवाया.
दीपक प्रकाश तत्कालीन नीतीश कैबिनेट में पहली दफे शामिल हुए, तो उन्हें पंचायती राज विभाग की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन नीतीश कुमार ने जब इस साल राज्यसभा जाने का फैसला किया, तो बिहार में नए सिरे से सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हुई. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा के बाद बिहार में पहली दफे बीजेपी का मुख्यमंत्री बना. सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उसके बाद 7 में को हुए कैबिनेट विस्तार में एक बार फिर दीपक प्रकाश को आरएलएम कोटे से मंत्री बनाया गया.
ऐसा दूसरी दफे हुआ है कि किसी सदन का सदस्य नहीं होने के बावजूद दीपक प्रकाश राज्य कैबिनेट में शामिल हुए. तब उम्मीद जताई गई थी कि जून महीने में होने वाले विधान परिषद चुनाव में दीपक प्रकाश एनडीए की तरफ से उम्मीदवार हो सकते हैं. उपेंद्र कुशवाहा ने शायद इसी उम्मीद में दीपक प्रकाश को कैबिनेट में जगह दिलवा दी, लेकिन एनडीए के नौ उम्मीदवारों की लिस्ट में उनके बेटे का नाम शामिल नहीं रहा. 8 जून को नामांकन की समय सीमा खत्म होने के बाद कुशवाहा भी इस बात को समझ चुके थे कि उनके बेटे के लिए अब सदन का सदस्य बनना आसान नहीं होगा.
दीपक प्रकाश ने दूसरी बार 7 मई 2026 को मंत्री पद की शपथ ली थी. बिना किसी सदन का सदस्य बने वे 6 महीने तक, यानी 6 नवंबर 2026 तक मंत्री रह सकते हैं. लेकिन मौजूदा विधान परिषद चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनने के बाद अब आगे इस 6 महीने के दौरान एमएलसी होने की कोई गुंजाइश नहीं नजर आती. विधान परिषद की इस चुनावी प्रक्रिया के बाद बिहार के राज्यपाल की ओर से मार्च 2027 में परिषद के कुछ सदस्यों का मनोनयन होना है, लेकिन तब तक दीपक प्रकाश कैबिनेट में बने नहीं रह पाएंगे.
नीतीश कुमार की अगुवाई वाली सरकार में दीपक प्रकाश पांच महीने तक मंत्री रहे थे. इस बीच बिहार में विधानसभा का उपचुनाव केवल एक सीट पर होना है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद और राज्यसभा जाने के बाद नितिन नवीन के इस्तीफे से रिक्त हुई बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है, लेकिन इस बात की उम्मीद बिल्कुल नहीं है कि बीजेपी अपनी इस सेफ सीटिंग सीट से दीपक प्रकाश को मौका देगी. दीपक प्रकाश के मंत्रिमंडल में भविष्य को लेकर सवाल पर उपेंद्र कुशवाहा कुछ भी बोलने से बच रहे हैं.
एमएलसी चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामांकन के बाद इसे लेकर एक सवाल पर उपेंद्र कुशवाहा कन्नी काट गए. कुशवाहा ने इस बात को भी सिरे से खारिज कर दिया कि समय सीमा खत्म होने के पहले दीपक प्रकाश मंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे. पटना से दिल्ली रवाना होने के पहले उपेंद्र कुशवाहा को जब बीजेपी के अपने पुराने वादे की याद दिलाई गई, तो उन्होंने बीजेपी नेताओं से ही इस सवाल का जवाब मांगने के लिए कह दिया. संभव है कि कुशवाहा अपने बेटे के राजनीतिक भविष्य को लेकर दिल्ली दरबार में संवाद की कोशिश करें.
हालांकि, 7 जून को अपनी पार्टी की बैठक में उपेंद्र कुशवाहा ने कार्यकर्ताओं को एक मैसेज जरूर दे दिया कि वह किसी एक पद के लिए अपनी पार्टी के अस्तित्व से समझौता नहीं करेंगे शाहिद कुशवाहा को इस बात का अंदाजा हो गया था कि दीपक प्रकाश को बीजेपी विधान परिषद नहीं भेजेगी और इसीलिए वह अपने कार्यकर्ताओं को मैसेज दे रहे थे. जानकार मानते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा और बीजेपी के बीच अंदर खाने जरूर कोई डील हुई होगी. बीजेपी ने शायद इसी डील के तहत उपेंद्र कुशवाहा को इस साल एक बार फिर से राज्यसभा भेजा लेकिन अब उनके बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने से कन्नी काट गई.
संभव है कि दोनों दलों के बीच जो फार्मूला तय हुआ होगा, उसपर कुशवाहा भी टिके ना रहे हों. हालांकि, यह सब कयास है और इस पर अब तक न कुशवाहा और ना ही बीजेपी के नेताओं ने पत्ते खोले हैं. मौजूदा हालात में बड़ा सवाल यह है कि अगर दीपक प्रकाश 6 नवंबर के बाद मंत्री नहीं रहते हैं, तो उसके पहले या बाद में उपेंद्र कुशवाहा के पास क्या विकल्प बचता है? उपेंद्र कुशवाहा अपने बेटे की जगह अपनी विधायक पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को मंत्री बनवा सकते हैं. सियासी गलियारे में एक चर्चा यह भी है कि अपनी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा को विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दिला उपचुनाव में बेटे को उतार सकते हैं.
उपेंद्र कुशवाहा के पास यह विकल्प है कि दीपक प्रकाश को विधायक बनाएं. इससे वह दीपक प्रकाश सम्राट कैबिनेट में अपनी जगह बरकरार रख सकते हैं. यह उतना व्यावहारिक नहीं दिखता, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं और वह उपचुनाव का जोखिम लेने में दिलचस्पी शायद ही दिखाएं. उपेंद्र कुशवाहा के दिमाग में भी कई विकल्प घूम रहे होंगे और इन्हीं विकल्पों से दीपक प्रकाश का सरकार के अंदर बने रहने के राजनीतिक भविष्य पर फैसला होगा.
शशि भूषण कुमार