फ्यूल पर 'FULL' कन्फ्यूजन! पेट्रोल, डीजल, CNG या इलेक्ट्रिक, क्या चुनें कार खरीदार?

गाड़ियों में दिलचस्पी रखने वाले जहां चार लोग इकट्ठा हो रहे हैं वहीं E20... इथेनॉल और फ्लेक्स फ्यूल की चर्चा शुरू हो जा रही है. हालिया सर्वे में भी ये बात सामने आई है कि, पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा और अनिश्चितता के चलते तकरीबन 43% लोगों ने नई कार खरीदने से मना किया है. तो आइये समझते हैं कि, आखिर लोगों की इस दुविधा का क्या कारण है, आखिर फ्यूल पर यूं 'फुल' कन्फ्यूजन क्यों है?

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सरकार ने हाल ही में E100 फ्यूल को कानूनी मंजूरी दे दी है. Photo: ITG सरकार ने हाल ही में E100 फ्यूल को कानूनी मंजूरी दे दी है. Photo: ITG

अश्विन सत्यदेव

  • नई दिल्ली,
  • 18 जून 2026,
  • अपडेटेड 10:38 AM IST

पहले कार खरीदना आसान था. बजट देखिए, मॉडल चुनिए और जरूरी फाइेनेंशियल प्रोसेस पूरा कर चाबी लेकर कार घर ले आ जाइए. लेकिन अब कहानी बदल गई है. कार खरीदने निकलिए और किसी शोरूम में जाकर पूछ लीजिए कि कौन-सी गाड़ी लें. जवाब में सेल्समैन शायद कार से ज्यादा फ्यूल का ज्ञान देने लगे.

पेट्रोल महंगा है, डीजल का भविष्य अधर में है, CNG की कीमतें चढ़ रही हैं, EV में रेंज की चिंता है और हाइब्रिड को नीति निर्माताओं ने मानो साइड सीट पर बैठा रखा है. ऐसा लगता है जैसे ग्राहक कार खरीदने नहीं, बल्कि फ्यूल का गणित समझने निकला है. लेकिन मजे की बात ये है कि इस सवाल का जवाब सरकार, कंपनियों और विशेषज्ञों के पास भी एक जैसा नहीं है.

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अब तक कार खरीदने का मतलब सिर्फ यह तय करना होता था कि बजट कितना है और कार किस तरह की लेनी है, हैचबैक, सेडान या एसयूवी. लेकिन 2026 का भारतीय ऑटो बाजार पूरी तरह बदल चुका है. अब सबसे बड़ा सवाल कार का रंग या फीचर्स नहीं, बल्कि उसका फ्यूल है. पेट्रोल, डीजल, CNG, हाइब्रिड, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड, EV या फिर फ्लेक्स-फ्यूल. विकल्प इतने ज्यादा हैं कि आम खरीदार कन्फ्यूजन में है.

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दिलचस्प बात यह है कि इन सभी के अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग फायदे और नुकसान भी बताए जा रहे हैं. लेकिन ग्राहक के सामने आज भी कोई एक साफ रास्ता नहीं है. यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग नई कार खरीदने का फैसला टाल रहे हैं. लोकल सर्किल की हालिया सर्वे में भी ये बात सामने आई है कि, पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा और अनिश्चितता के चलते तकरीबन 43% लोगों ने नई कार खरीदने से मना किया है. तो आइये समझते हैं कि, आखिर लोगों की इस दुविधा का क्या कारण है, आखिर फ्यूल पर यूं 'फुल' कन्फ्यूजन क्यों है?

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पेट्रोल : आसान विकल्प, लेकिन जेब पर भारी

आज भी भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाली कारें पेट्रोल इंजन वाली हैं. इनकी कीमत अपेक्षाकृत कम होती है और मेंटनेंस भी आसान और किफायती माना जाता है. लेकिन पेट्रोल की बढ़ती कीमतें ग्राहकों को परेशान कर रही हैं. दूसरी ओर E20 और भविष्य में E30 जैसे इथेनॉल ब्लेंडिंग फ्यूल को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं. लोग यह समझ नहीं पा रहे कि आज खरीदी गई कार आने वाले सालों में नए फ्यूल मानकों के लिए कितनी तैयार होगी. ऑटो कंपनियां भरोसा दिला रही हैं, लेकिन ग्राहकों के मन में शंकाएं बनी हुई हैं.

हाल ही में सरकार ने देश में E85 फ्यूल को लॉन्च किया है. इसके अलावा केंद्रीय सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्री ने ऐलान किया है कि, देश में E100 यानी शत प्रतिशत इथेनॉल फ्यूल को मंजूरी दे दी गई है. इसके लिए जरूरी फाइलों पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिया है. यानी आने वाले समय में E100 फ्यूल का भी रास्ता साफ हो गया है. केंद्रीय मंत्री ने अगले डेढ़ से दो महीनों में देश में कुछ नई फ्लेक्स-फ्यूल कारों के आने का भी जिक्र किया है. एक आम खरीदार इस उधेड़बुन में फंसा है कि, मोटी EMI के लिए वो तैयारी कर भी ले तो क्या उसकी कार को कितने सालों तक सही फ्यूल मिलता रहेगा.

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घटता माइलेज, बढ़ता मेंटनेंस

सरकार का कहना है कि, भारत ने तय समय से पहले ही E20 फ्यूल का टार्गेट पूरा कर लिया है. लेकिन आम लोगों की समस्या समय के साथ और भी बढ़ती गई है. गाड़ियों में दिलचस्पी रखने वाले जहां चार लोग इकट्ठा हो रहे हैं वहीं E20... इथेनॉल और फ्लेक्स फ्यूल की चर्चा शुरू हो जा रही है. इन चर्चाओं में एक बात सबसे कॉमन है और वो E20 फ्यूल से वाहनों के होने वाले नुकसान. सोशल मीडिया ऐसे शिकायती वीडियो, पोस्ट और तस्वीरों से पटा पड़ा है, जहां लोग कह रहे हैं कि, पिछले कुछ सालों या महीनों में उनके वाहनों का माइलेज गिरा है और मेंटनेंस कॉस्ट बढ़ा है.

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सरकार भी इससे पूरी तरह इंकार नहीं कर रही है. आपको याद दिला दें कि, पिछले साल पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने सोशल नेटवर्किंग साइट 'X' पर अपने एक बयान में कहा था कि, "रेगुलर पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होने के कारण, माइलेज में मामूली कमी आती है. जो E10 के लिए डिज़ाइन किए गए और E20 के लिए कैलिब्रेट किए गए चार पहिया वाहनों के लिए अनुमानित 1-2%, और अन्य वाहनों के लिए लगभग 3-6% है."

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समस्या नहीं तो उपाय क्यों ढूढ़ रही कंपनियां

सरकार लगातार इस बात को कहती रही है कि, E20 फ्यूल से पुराने वाहनों के कंपोनेंट को कोई समस्या नहीं है. यदि ऐसा है तो वाहन निर्माता कंपनियां इसके उपाय ढूंढ़ने में क्यों व्यस्त हैं. देश की सबसे बड़ी परफॉर्मेंस बाइक निर्माता कंपनी रॉयल एनफील्ड ने इसी साल फरवरी में E20 कन्वर्जन किट बाजार में उतारा है. जो पुराने BS3 और BS4 बाइक्स में प्रयोग किया जाता है. इससे पुराने वाहनों में नए E20 फ्यूल के इस्तेमाल से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है. इस कन्वर्जन किट की कीमत तकरीबन 1,700 रुपये है.

डीजल: माइलेज अच्छा, लेकिन अधर में भविष्य

कुछ साल पहले तक लंबी दूरी तय करने वालों की पहली पसंद डीजल कारें थीं. शानदार माइलेज और मजबूत टॉर्क के कारण इनकी मांग काफी थी. लेकिन BS6 नियमों, बढ़ते इमिशन नॉर्म्स और कई शहरों में डीजल वाहनों को लेकर सख्त रवैये ने ग्राहकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. नई डीजल कारें पहले से ज्यादा महंगी हो चुकी हैं और उनके मेंटनेंस खर्च भी बढ़ गए हैं.

आलम ये है कि, देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने अप्रैल 2020 से डीजल कारें ही बनानी बंद कर दी. ऐसे में देश का एक बड़ा तबगा जो मारुति की किफायती कारें खरीदना चाहता है उसके लिए डीजल का विकल्प ही नहीं है. मौजूदा समय में डीजल वाहन न होने के बावजूद केवल पेट्रोल, CNG, हाइब्रिड और हालिया लॉन्च EV के बूते मारुति सुजुकी तकरीबन 42% पैसेंजर व्हीकल मार्केट पर कब्जा किए हुए है. 

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आइसोब्यूटोनॉल की आहट

अभी आम आदमी पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर उहापोह में फंसा ही है कि, अब डीजल में भी आइसोब्यूटोनॉल मिलाने की चर्चा जोरों पर है. बीते दिनों देश की पहली फ्लेक्स फ्यूल कार (Wagon R Flex Fuel) के लॉन्च के मौके पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि, "हम डीजल में इथेनॉल तो डाल नहीं सकते, इसलिए इथेनॉल से आइसोब्यूटेनॉल भी बन रहा है. और आइसोब्यूटेनॉल डीजल का विकल्प बन सकता है."

गडकरी ने कहा कि, "मैंने किर्लोस्कर के दो जेनरेटर सेट लॉन्च किए हैं. जिसमें से एक 100 प्रतिशत इथेनॉल पर और दूसरा आइसोब्यूटेनॉल पर सफलतापूर्वक चल रहा है. तो इंजन बन सकता है. और डीजल में भी 15 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की तैयारी चल रही है." यानी अब अगला प्रयोग डीजल पर देखने को मिलेगा. जिसका सीधा असर न केवल कार खरीदारों पर बल्कि, एग्रीकल्चर, मशीनरी, कंस्ट्रक्शन इक्यूपमेंट और कमर्शियल ट्रांसपोर्टेशन पर भी पड़ेगा. क्योंकि ये वो सेक्टर हैं जहां डीजल का इस्तेमाल सबसे ज्यादा होता है.

CNG: पेट्रोल की कुर्सी पर बैठा गैस

पिछले कुछ वर्षों में CNG कारों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है. लो रनिंग कॉस्ट और बेहतर माइलेज के कारण मध्यम वर्ग ने इसे हाथोंहाथ लिया. लेकिन अब CNG की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं. कई शहरों में गैस की कीमतें तकरीबन पेट्रोल के आसपास पहुंच चुकी हैं. दूसरी ओर पेट्रोल कारों की तुलना में सीएनजी कारें तकरीबन 1 लाख रुपये तक महंगी होती हैं. खैर, माइलेज के लालच में सीएनजी चुन भी लिया जाए तो विकल्प बहुत सीमित हैं, मतलब जरूरी नहीं कि, आपके पसंद और जरूरत की हर कार सीएनजी में आती हो.

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वहीं अगर आपने ऑफ्टर मार्केट CNG किट का रास्ता चुना तो खतरा और भी बढ़ जाता है. आए दिन सड़कों पर सीएनजी कारों में लगने वाली आग लोगों को चिंता में डाल देती हैं. इसके अलावा सीएनजी गैस की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती है. देश के ज्यादातर ग्रामीण और रिमोट एरिया में अभी सीएनजी पंपों की उपलब्धता उतनी नहीं है, जितनी की पेट्रोल और डीजल की है. ऊपर से बूट स्पेस की कमी और परफॉर्मेंस में हल्की गिरावट जैसे मुद्दे भी लोगों को हलकान करते हैं. हालांकि, टाटा मोटर्स जैसे ब्रांड्स ने डुअल-सिलिंडर टेक्नोलॉजी से बूट स्पेस जैसी समस्या का कुछ हद तक निदान ढूढ़ने की कोशिश जरूर की है. लेकि CNG अब उतना आकर्षक विकल्प नहीं रह गया है, जितना कुछ साल पहले था.

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EV: फ्यूचर, लेकिन चुनौतियां बेसुमार

इलेक्ट्रिक वाहनों को भारत का भविष्य बताया जा रहा है. सरकार से लेकर ऑटो कंपनियां तक EV को बढ़ावा दे रही हैं. लो रनिंग कॉस्ट और जीरो पॉल्यूशन के साथ-साथ सरकार की तरफ से मिलने वाली छूट (सब्सिडी, जो अब कारों पर नहीं मिलती) ने ईवी का बूम तो बनाया, लेकिन पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट में ग्रोथ उस लेवल की नहीं हुई है.

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वास्तविकता यह है कि EV खरीदने से पहले ग्राहक के मन में कई सवाल हैं. चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी हर जगह उपलब्ध नहीं है. लंबी दूरी की यात्रा के दौरान रेंज एंजॉइटी बनी रहती है. बैटरी बदलने की लागत और रीसेल वैल्यू को लेकर भी स्पष्ट तस्वीर नहीं है. सेंकड हैंड कार बाजार में भी ईवी की वैल्यू को लेकर अभी कोई क्लीयर इमेज नहीं है. मामला दो लोगों के बीच आपसी समझ, जरूरत और मुनाफे पर टिक हुआ है.

सबसे बड़ी बात यह है कि इलेक्ट्रिक कारें अभी भी पेट्रोल और CNG मॉडल्स की तुलना में महंगी हैं. इसलिए बड़ी आबादी अभी भी EV को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखती. हालांकि, बड़े शहरों में ईवी की डिमांड जरूर बढ़ी है, लेकिन आए दिन उन्हें भी समस्याओं से दो चार होना पड़ रहा है. कुछ बड़ी सोसायटी में रहने वाले लोगों को इलेक्ट्रिक कार के लिए चार्जिंग प्वाइंट्स लगाने की अनुमति नहीं मिल रही है.

इसके अलावा मेंटनेंस, छोटी-मोटी मरम्मत या अचानक से वाहन के ब्रेक-डाउन होने पर आपको कंपनी के रोड-साइड असिस्टेंस (RSA) के ही भरोसे बैठना होगा. जब तक कि, असिस्टेंस टीम आप तक नहीं पहुंचती है और आपको दूसरा वाहन मुहैया नहीं कराया जाता है, तब तक आप लाखों रुपये खर्च करने के बाद सड़क किनारे बस खड़े रह सकते हैं. हाल ही में सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हुए हैं, जिनमें लोगों ने इस तरह की तकलीफों को शेयर किया है.

इसकी सबसे बड़ी वजह है, EV तकनीक का बिल्कुल नया होना. आलम यह है कि, कई डीलरशिप पर कर्मचारी भी इलेक्ट्रिक वाहनों की नई तकनीक से उतने रूबरू नहीं हैं, कि वो फटाफट वाहन की समस्या पकड़ लें या उसे दूर कर दें. उन्हें भी किसी, मॉडर्न डॉक्टर की तरह रिपोर्टों का इंतजार करना पड़ता है. पहले गाड़ी को वर्कशॉप के ख़ास डिवाइस से कनेक्ट किया जाएगा, सॉफ्टवेयर से कमी का पता लगाया जाएगा, उसके बाद मरम्मत या पार्ट रिप्लेसमेंट (जो भी हो) कर वाहन को ठीक किया जाएगा. लेकिन रेगुलर ICE (पेट्रोल-डीजल) वाहनों के साथ ऐसा नहीं है. पुराने वाहनों को आप किसी छोटे इलाके में मैकेनिक को दिखाकर ब्रेक-डाउन से निजात पा सकते हैं.

हाइब्रिड: बैलेंस्ड, लेकिन सपोर्ट की कमी

दिलचस्प बात यह है कि हाइब्रिड तकनीक कई एक्सपर्ट को भारत की मौजूदा जरूरतों के हिसाब से सबसे व्यावहारिक समाधान लगती है. इसमें पेट्रोल इंजन और इलेक्ट्रिक मोटर दोनों का फायदा मिलता है. माइलेज बेहतर होता है और चार्जिंग स्टेशन की चिंता भी नहीं रहती. जरूरत पड़ने पर गाड़ी पेट्रोल पर दौड़ती है और शहरी, भीड़-भाड़ वाले इलाके, यानी लो-स्पीड में कार EV मोड में चलती है. इसका सबसे बड़ा फायदा, फ्यूल एफिशिएंसी (माइलेज) के तौर पर देखने को मिलता है.

इसके बावजूद हाइब्रिड वाहनों को वह सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला जो EV को मिला है. हालांकि, शुरुआती दौर में कुछ राज्यों ने अपने यहां हाइब्रिड वाहनों की खरीद पर 100 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन मॉफ करने जैसी स्कीमों को लॉन्च किया था. लेकिन उस वक्त बड़ी EV पोर्टफोलियो वाली कंपनियों ने सरकार को पत्र लिखकर आपत्ती जताई थी कि, इससे इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री पर असर पड़ेगा. नतीजा यह है कि इनकी कीमतें ऊंची बनी हुई हैं. अगर टैक्स और अन्य रियायतें मिलें तो हाइब्रिड कई ग्राहकों के लिए बेहतर विकल्प बन सकता है.

क्या है असली समस्या

भारतीय ग्राहक नई तकनीक अपनाने से नहीं डरता. उसने CNG अपनाई, ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन अपनाया और अब EV की तरफ भी बढ़ रहा है. लेकिन मौजूदा समय में सबसे बड़ी समस्या अनिश्चितता है. ग्राहक जानना चाहता है कि अगले 8 से 10 वर्षों में कौन सी तकनीक टिकेगी. कौन सा फ्यूल सबसे किफायती रहेगा. किस वाहन की रीसेल वैल्यू बेहतर होगी. और सबसे महत्वपूर्ण, सरकार की नीतियां किस दिशा में जाएंगी. जब इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब खरीदार अपने फैसले टाल देता है. 

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