सावन महीने की पूर्णिमा को रक्षा बंधन मनाए जाने की परंपरा है. अभी की प्रचलित मान्यता में राखी या रक्षाबंधन सनातनी पहचान का ही हिस्सा है. फिर भी जब आप इस त्योहार का इतिहास और संदर्भ खोजने निकलेंगे तो इसकी कहानियां किवदंतियों से अधिक कुछ नहीं हैं.
फिर भी यह सवाल तो रह ही जाता है कि आखिर राखी बांधने की शुरुआत कैसे हुई और रक्षाबंधन मनाया क्यों जाता है? इस साधारण से सवाल को ही रास्ता बनाकर आगे बढ़ते हैं तो हमें रक्षाबंधन के ही जैसा शब्द मिलता है रक्षासूत्र. यानी रक्षा का धागा. इस धागे से हम सभी का अच्छा-खासा परिचय है.
घर में कोई भी पूजा हुई, या हम किसी भी मंदिर गए, देवता के दर्शन किए, पुजारी जी के सामने हाथ बढ़ाया और उन्होंने कलाई में एक कच्चे लाल धागे को तीन- पांच या सात बार लपेट कर, एक मंत्र पढ़कर बांध दिया. यही रक्षासूत्र है. जिसे मौली या कलावा भी कहते हैं.
असल में सनातन परंपरा में इसी धागे का असली मतलब है. इसकी जड़ें वैदिक और पौराणिक परंपराओं तक जाती हैं. हालांकि इसकी शुरुआत भी प्रतीक के रूप में ही हुई है.
मंत्रों को उच्चारण के साथ बांधा गया ये धागा, इस मान्यता के साथ कलाई पर बांधा जाता है कि यह हमारी रक्षा करेगा. रक्षा किससे? उन संकटों से जो दिखाई देते हैं और उनसे भी जो दिखाई नहीं देते. इसी रक्षासूत्र के जरिये ये कामना की जाती है कि यह उम्र और बल भी बढ़ाएगा.
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अथर्ववेद में शतानीक नाम के राजा का जिक्र होता है. ऋषियों ने उसके लिए सोना बांधकर उसकी आयु बढ़ाने की कामना की थी. इसी कहानी के जरिये रक्षा के लिए बांधे जाने वाले सूत्र का कॉन्सेप्ट सामने आता है. अथर्ववेद के सूक्त 35 में दीर्घायु की कामना से हिरण्य यानी स्वर्ण बांधने की बात कही गई है.
यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः।
तत्ते बध्नाम्यायुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय॥ (अथर्ववेद)
(यानी जिस तरह प्रसन्न मन वाले दाक्षायणों ने शतानीक के लिए हिरण्य बांधा था, उसी तरह मैं इसे तुम्हारे लिए आयु, तेज, बल, दीर्घ जीवन और सौ शरद ऋतुओं तक जीवन की कामना से यह सूत्र बांधता हूं.)
इसी सूक्त के अगले मंत्र में इस बंधन को राक्षस और पिशाच से रक्षा से भी जोड़ा गया है. दिलचस्प है कि रक्षासूत्र की सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कहानी भी एक दैत्य से जुड़ी है. यानी दैत्यराज बलि से. अहंकारी दैत्य बलि से भगवान विष्णु ने वामन बनकर तीन पग धरती मांगी और सारा ब्रह्मांड जीत लिया. बलि को उन्होंने पाताल भेज तो खुद उसके पहरेदार बन गए.
तब नारदमुनि के सुझाव पर देवी लक्ष्मी रक्षासूत्र लेकर बलि के पास जाती हैं और बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं. तब बलि से भगवान विष्णु मुक्त हो जाते हैं और यहीं से रक्षा के मंत्र में बलि का नाम जुड़ जाता है.
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥ (भविष्य पुराण, उत्तर पर्व)
(यानी जिस रक्षा के जरिये महाबली दानवेंद्र राजा बलि बांधे गए थे, उसी से मैं तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षे! तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना.)
ये कहानी बताती है कि रक्षा का वचन लिया जाता है तो निभाना भी पड़ता है और यह वचन निभता रहे इसलिए रक्षकों को इस वचन की याद भी दिलानी पड़ती है. रक्षासूत्र एक रिकॉल थ्रेड है. एक अलार्म है. सचेतक है. इसीलिए इसे कलाई में बांधने की परंपरा है. यानी ऐसी जगह, जहां आपकी नजर आसानी से पड़े. दूसरी बात ये कि 'बांधना' केवल शारीरिक बंधन नहीं है. इसका एक गहरा अर्थ है कि किसी भी मनुष्य को शुभ संकल्प, धर्म और मर्यादा से बांध देना.
इसलिए पौराणिक कहानियों में रक्षाबंधन कहीं भी सिर्फ भाई-बहनों के त्योहार के तौर पर दर्ज नहीं मिलता है, बल्कि गुरु अपने शिष्य को, कुलगुरु और ऋषि राजा को रक्षासूत्र बांधते रहे हैं. संगीत की शिक्षा में गुरु जब किसी को शिष्य बनाते हैं तो शिष्य का गंडाबंधन करते हैं. यह गुरु और शिष्य के बीच की मर्यादा को तय करने का तरीका है.
इसी तरह युद्ध के लिए जाने वाले योद्धाओं को रक्षासूत्र बांधा जाता था कि ताकि उसे याद रहे कि वह सिर्फ एक योद्धा नहीं है बल्कि अपने समुदाय का प्रतिनिधि भी है और समुदाय की ही आवाज, तलवार, ढाल, तीर-कमान बनकर लड़ने आया है. इसलिए वह जान की बाजी लगाकर लड़े और अपना फर्ज याद रखे. रक्षासूत्र की धार्मिक अवधारणा में यही तीन चीजें एक साथ आती हैं, मंत्र, संकल्प और प्रतीक.
धागा संकल्प है. मंत्र उसकी अलौकिक शक्ति है और उसका बांधा जाना उस शक्ति को अपनाने का प्रतीक है. इस तरह यह तीनों अर्थ एक सूत्र में बंध जाते हैं और हर तरह के बिखराव के डर को खत्म कर देते हैं.
कलावा या रक्षासूत्र को कलाई में बांधने की अपनी कुछ और भी मान्यताएं हैं. रक्षासूत्र को कलाई में बांधना मणिबंधन भी कहलाता है. हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं. कर्म, भाग्य और जीवनरेखा भी इसी मणिबंध से ही निकलती है. इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक और भौतिक जैसे तीन तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति है.
ये तीनों रेखाएं शिव, विष्णु और ब्रह्मा की प्रतीक हैं और यही तीनों रेखाएं ज्ञान, धन और शक्ति भी हैं. जब मंत्र पढ़कर कलावा हाथ में बांधा जाता है तो इसके धागे त्रिदेवों और तीनों शक्तियों को एक साथ जोड़ लेते हैं.
आयुर्वेद की प्राचीन परंपरा में मान्यता है कि इसी मणिबंध से त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है. मानसिक शांति मिलती है और अगर कई मौकों पर इंसान निगेटिव होने की राह से बच जाता है.
आज भाई की कलाई पर बहन जो राखी बांधती है, वह संभव है कि एक बहुत पुरानी सनातनी सांस्कृतिक भाषा का नया सामाजिक रूप है. धागे में किसी संबंध, दायित्व और संकल्प को बांध देना, परंपरा को उसी कलेवर में लेकिन नए विचार के साथ अपना लेने का सुंदर उदाहरण है, लेकिन जरूरी है कि हम इसके पीछे छिपे गहरे मायनों को भी जानें समझें और अपनी जिंदगी में जगह दें, तभी इस पर्व परंपरा का असली लक्ष्य सार्थक होगा.
विकास पोरवाल