भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गणेश चतुर्थी कहलाती है. इस दौरान गणेशजी की विधि-विधान से पूजा की जाती है. महाराष्ट्र में बड़े पांडालों में गणपति प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और बीते दशकों में यह दक्षिणी और पश्चिमी घाट से होते हुए ये कल्चर उत्तर भारत में भी त्योहार की शक्ल ले चुका है. इसलिए गणेश चतुर्थी अब एक क्षेत्र का त्योहार नहीं रह गया है.
बल्कि त्योहार की सीमाएं और वर्जनाएं तोड़ने वाली यही खूबी त्योहार के असली रूप-स्वरूप को समझने में मदद करती हैं. अब गणेश चतुर्थी में ही देख लीजिए कि कैसे इस त्योहार से अलग-अलग क्षेत्रों की गणपति मान्यताएं सामने आती हैं और फिर एक हो जाती हैं.
गणेशजी कहीं सिद्धि-विनायक हैं, कहीं विघ्नहर्ता, कहीं बाल गणपति तो कहीं महागणपति. इसी तरह कहीं वह विवाहित हैं, कहीं ब्रह्मचारी, कहीं वह तांत्रिक परंपरा में महातंत्र गुरु हैं तो वहीं शाक्त परंपरा उन्हें शक्ति के एक सोर्स के तौर पर देखती है. जिसमें वह शक्ति के गण कहलाते हैं और गणेश बन जाते हैं.
गणपति उपासना जितनी प्राचीन और व्यापक हुई, उनके स्वरूपों को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में अलग मान्यताएं विकसित हुईं. गणेशजी की पत्नियों के तौर पर कहीं सिद्धि और बुद्धि का नाम मिलता है तो वहीं उत्तर भारत की लोकप्रिय परंपरा में रिद्धि-सिद्धि को उनकी दो पत्नियां माना जाता है. उधर, तांत्रिक उपासना में गणपति अपनी शक्ति के साथ बिल्कुल अलग स्वरूप में सामने आते हैं.
दक्षिण भारत में ब्रह्मचारी गणपति
दक्षिण भारत की कई परंपराओं में गणपति को अविवाहित और ब्रह्मचारी माना गया है. यहां गणपति का ब्रह्मचर्य उनके संयम, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है.
इससे जुड़ी एक लोककथा माता पार्वती से भी जुड़ती है. कथा के अनुसार गणेश अपनी माता पार्वती को आदर्श स्त्री मानते थे और उनके समान स्त्री मिलने पर ही विवाह करने की बात कहते थे. ऐसी स्त्री न मिलने के कारण वे अविवाहित रहे.
ऐसे ही एक एक दूसरी कथा में गणेशजी को यह ज्ञान हुआ कि संसार की सभी स्त्रियां आदिशक्ति और माता पार्वती का ही अंश है, इसलिए वह किसी भी स्त्री से विवाह नहीं करने का फैसला लेते हैं. इसी कथा को एक और लोककथा विस्तार देती है, जहां दर्ज है कि गणेशजी ने अपने भीतर भी आदिशक्ति के उसी अंश को महसूस किया और जब उसे प्रकट किया तो वह स्त्री गणेश यानी विनायकी देवी के रूप में सामने आई.
तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के सुचिंद्रम में स्थित श्रीसुचिंद्रम थानुमलयन स्वामी मंदिर में गणेशजी के दुर्लभ स्त्री रूप देवी विनायकी की प्राचीन प्रतिमा देखी जा सकती है. इन्हें देवी गणेशिन भी कहा जाता है.
हालांकि ये लोककथाएं सिर्फ स्थान विशेष की मान्यताओं से जुड़ी हैं. सीमाएं बदलते ही ये मान्यताएं भी छोटी पड़ जाती हैं. जरूरी बात यह है कि दक्षिण की अनेक धार्मिक परंपराओं में श्रद्धालु गणपति को पत्नी और संतान वाले गृहस्थ देवता के बजाय ब्रह्मचारी स्वरूप में पूजते आए हैं. बाल गणेश की अवधारणा भी कुछ-कुछ इससे ही मिलती-जुलती सी है.
उत्तर भारत में सिद्धि-बुद्धि या रिद्धि-सिद्धि के पति
उत्तर भारत आते-आते तस्वीर बदल जाती है. यहां घरों से लेकर मंदिरों तक 'रिद्धि-सिद्धि दाता गणेश' की धारणा लोकप्रिय है. कई चित्रों और प्रतिमाओं में गणपति के साथ दो स्त्री आकृतियां दिखाई देती हैं. पुराणों में इस परंपरा का एक अलग स्वरूप मिलता है. शिव पुराण की कथा में प्रजापति विश्वरूप की दो पुत्रियां सिद्धि और बुद्धि का विवाह गणेशजी से बताया गया है.
इसी कथा में सिद्धि से 'क्षेम' और बुद्धि से 'लाभ' नामक पुत्रों का उल्लेख मिलता है. बाद की उत्तर भारतीय लोकप्रिय मान्यताओं में यही परंपरा 'शुभ-लाभ' और 'रिद्धि-सिद्धि' के रूप में अधिक परिचित हो गई.
इसका प्रतीकात्मक अर्थ भी महत्वपूर्ण है. बुद्धि यानी विवेक और ज्ञान, सिद्धि यानी सफलता या आध्यात्मिक उपलब्धि, रिद्धि यानी समृद्धि. इस तरह गणेश की पत्नियों को केवल पारिवारिक पात्रों के रूप में देखने के बजाय गणपति के गुणों और शक्तियों का मानवीकरण भी माना गया है. संदेश ये है कि जहां विवेक रूपी गणेश हैं, वहां सिद्धि और समृद्धि भी आती है.
महाराष्ट्र में गणपति का अलग रंग
महाराष्ट्र गणेश उपासना का सबसे प्रमुख केंद्र माना जाता है. यहां अष्टविनायक की परंपरा से लेकर सार्वजनिक गणेशोत्सव तक गणपति लोकजीवन के केंद्र में हैं. अष्टविनायक में मोरगांव के मयूरेश्वर मंदिर का विशेष महत्व है. यहां गणपति के साथ सिद्धि और बुद्धि की उपस्थिति वाली परंपरा भी मिलती है.
इसलिए गणपति को केवल 'विवाहित' या 'अविवाहित' के दो खांचों में बांटना आसान नहीं है. अलग मंदिरों, आख्यानों और उपासना परंपराओं में उनका स्वरूप बदलता दिखाई देता है.
बंगाल में गणेशजी और 'कोला बऊ' की परंपरा
बंगाल की दुर्गा पूजा में गणेश प्रतिमाओं के पास साड़ी में लिपटा केले का पौधा दिखाई देता है, जिसे 'कोला बऊ' या 'कला बऊ' कहा जाता है. इसे देखकर एक लोकप्रिय धारणा बन गई कि कोला बऊ गणेश की पत्नी हैं. बऊ शब्द बहू का अपभ्रंश भी लगता है.
लेकिन धार्मिक परंपरा इससे कहीं अधिक बड़ी है. कोला बऊ वास्तव में नवपत्रिका पूजा का हिस्सा हैं, जिसमें नौ वनस्पतियों को एक साथ बांधकर देवी शक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है. दुर्गा पूजा के मंडप में इसे गणेशजी के निकट स्थापित किए जाने के कारण लोकमान्यता में इसे उनकी पत्नी कहा जाने लगा. इसीलिए बंगाल का यह उदाहरण दिखाता है कि धार्मिक प्रतीकों के अर्थ शास्त्रीय और लोक परंपरा में अलग-अलग भी हो सकते हैं.
तांत्रिक परंपरा में शक्ति के साथ गणपति
गणेशजी का सबसे रहस्यमय स्वरूप तांत्रिक परंपराओं में मिलता है. यहां वे केवल मोदक लिए हुए मंगलकर्ता बालसुलभ देवता नहीं हैं. शाक्त और तांत्रिक प्रभाव वाली गणपति उपासना में उनके अनेक शक्ति-संयुक्त रूप विकसित हुए. इनमें उच्छिष्ट गणपति, महागणपति, ऊर्ध्व गणपति, पिंगल गणपति और लक्ष्मी गणपति जैसे स्वरूपों का जिक्र मिलता है.
इनमें कुछ प्रतिमाओं में गणपति अपनी शक्ति को गोद में लिए या आलिंगन करते दिखाई देते हैं. इन स्वरूपों को सामान्य गृहस्थ विवाह की तस्वीर के तौर पर नहीं देखना चाहिए. तंत्र में इनके मायने अधिक जटिल हैं. तांत्रिक दर्शन में 'शक्ति' देवता की सक्रिय ऊर्जा और सृजनात्मक सामर्थ्य का प्रतीक होती है.
करीब 10वीं शताब्दी तक गणपति को सर्वोच्च आराध्य मानने वाला गाणपत्य संप्रदाय भी प्रभावशाली हो चुका था. इस परंपरा में गणपति को केवल शिव-पार्वती के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि परम सत्ता के रूप में देखा गया. अलग-अलग गाणपत्य धाराओं में उनके मंत्र, स्वरूप और पूजा-पद्धतियां भी अलग हुईं. गणपति की यही विविधता भारतीय धार्मिक परंपरा की खासियत भी बताती है. दक्षिण भारत के श्रद्धालु उन्हें ब्रह्मचारी मानकर पूजते हैं. उत्तर भारतीय लोग उन्हें रिद्धि-सिद्धि का स्वामी मानते हुए एक गृहस्थ और पति के रूप में उनकी कल्पना करते हैं. शुभ-लाभ को उनका बेटा मानते हैं. बंगाल की दुर्गापूजा में वह शक्ति के परिवार का हिस्सा और देव पंचायत में शामिल एक देवता बन जाते हैं.
ऐसे में इन मान्यताओं को परस्पर विरोधी समझने के बजाय अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के विकास के रूप में देखना ही सही है. गणपति का मूल भाव अलगाव या विलगाव में नहीं है, बल्कि अलग-अलग स्वरूपों के बावजूद एकता में है. जहां वह बुद्धि-विवेक देने वाले और विघ्नों को दूर करने वाली शक्ति के देवता हैं. इसीलिए उनका स्मरण किसी भी शुभ कार्य से पहले किया जाता है.
विकास पोरवाल