मोनोक्रोटोफॉस: जिसे 112 देशों ने किया बैन वो 'रेड लेबल' जहर भारत में कैसे हो रहा इस्तेमाल? जानिए इसका खूनी इतिहास!

मोनोक्रोटोफॉस खतरनाक कीटनाशक है, जिसे दुनिया के कई देशों ने प्रतिबंधित कर दिया है, लेकिन भारत में जब भी इस जानलेवा जहर को पूरी तरह बैन करने की बात उठी तो'समीक्षा' के नाम पर नया ड्राफ्ट लाकर कंपनियों को इससे कमाई करने के चोर-दरवाजे दे दिए गए.

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Side Effects of monocrotophos Pesticide (File Photo- ITG) Side Effects of monocrotophos Pesticide (File Photo- ITG)

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 17 जून 2026,
  • अपडेटेड 2:44 PM IST

यह कहानी सिर्फ एक कीटनाशक की नहीं है. यह दास्तान है एग्रो केमिकल कंपनियों की उस अंधी हवस की, जिसने चंद रुपयों के मुनाफे के लिए भारतीय खेतों को मसान बना दिया है. इसके समानांतर एक सच उन नीति निर्माताओं की सेटिंग और सुस्ती का भी है, जो एसी कमरों में बैठकर फाइलों के पन्ने पलटते रहे और उधर गांवों में किसान बीमार पड़ते रहे. बहरहाल, 'जहर के खिलाफ जंग' सीरीज में आज मोनोक्रोटोफॉस की बात करेंगे, जो एक खतरनाक इन्सेक्टिसाइड है. जब दुनिया के 112 देश इस 'रेड लेबल' केमिकल को अपने मुल्क की मिट्टी से खदेड़ चुके थे, तब हमारे देश के नीति निर्माता कंपनियों के साथ मिलकर 'कमेटी-कमेटी' का खेल खेल रहे थे. आइए, इसके जन्म से लेकर इसके खूनी इतिहास और सरकार की कथित मजबूरियों तक के इस पूरे खेल की परतें खोलते हैं.

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अपने देश मे जब-जब इस जानलेवा जहर पर पूरी तरह से बैन लगाने की बात उठी, तब-तब 'समीक्षा' के नाम पर नई कमेटियां गठित की गईं और नया ड्राफ्ट लाकर कंपनियों को चोर-दरवाजे से व्यापार जारी रखने की छूट दे दी गई. इसीलिए मोनोक्रोटोफॉस असल में 'बैन' होकर भी बिक रहा है. चालाकी देखिए कि सरकार ने केवल 'मोनोक्रोटोफॉस 36% SL' फॉर्मूलेशन के घरेलू इस्तेमाल पर ही रोक लगाई हुई है, जबकि इसके मूल कच्चे माल यानी 'टेक्निकल ग्रेड' और अन्य फॉर्मूलेशन,जैसे-पाउडर, दानेदार या कॉकटेल के प्रोडक्शन व एक्सपोर्ट को खुला छोड़ रखा है. इस नीतिगत ढुलमुलपन का सीधा फायदा उठाकर कंपनियां फैक्ट्रियों में इसका उत्पादन कर रही हैं और इसी मैन्युफैक्चरिंग की आड़ में यह घातक जहर चोर-दरवाजे से लीक होकर, अलग-अलग नामों और अलग कंसन्ट्रेशन में आज भी भारतीय बाजारों में बिक कर खेतों तक पहुंच रहा है.

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क्या है इतिहास?
मोनोक्रोटोफॉस का इतिहास सीधे तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध के काले दौर से जुड़ा है. युद्ध के दौरान वैज्ञानिकों ने इंसानों के तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को ठप करने वाली 'नर्व गैस' (जैसे सरीन और टैबुन) विकसित की थी. युद्ध खत्म हुआ, तो दुनिया की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इसी तकनीक का रुख कृषि की ओर मोड़ दिया. तर्क था क‍ि जो गैस इंसानों के नर्वस सिस्टम को रोक सकती है, वह फसलों को चट करने वाले कीड़ों का भी सफाया कर सकती है. इसी शोध की कोख से साल 1965 में स्विट्ज़रलैंड की कंपनी सिबा एजी (Ciba AG) और अमेरिका की शेल केमिकल कंपनी ने मिलकर मोनोक्रोटोफॉस को जन्म दिया. इसे बाजार में 'अजोड्रिन' और 'नुवाक्रॉन' जैसे फैंसी नामों से उतारा गया. यह एक स‍िस्टम‍िक कीटनाशक है, जिसे पौधे अवशोषित कर लेते हैं. फिर यह पौधों को खाने वाले कीड़ों को लकवाग्रस्त कर तुरंत मार देता है.

भारत और मोनोक्रोटोफॉस
जब भारत समेत दुनिया के कई देश 1970 और 80 के दशक में 'हरित क्रांति' के रथ पर सवार होकर अनाज उत्पादन बढ़ाने की होड़ में लगे थे, तब मोनोक्रोटोफॉस को एक जादुई वरदान मानकर विकासशील देशों के खेतों में झोंक दिया गया. भारत में तो भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (IICT), हैदराबाद ने इसका घरेलू उत्पादन करने के लिए एक स्वदेशी तकनीक भी विकसित कर डाली, जिसके बाद भारतीय कंपनियों ने इसे धड़ल्ले से बनाना शुरू किया.

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क‍ितना खतरनाक है? 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे Class Ib (अत्यधिक खतरनाक) की श्रेणी में रखा है. यह एक 'ऑर्गेनोफॉस्फेट' रसायन है, जिसका इंसानी शरीर पर हमला किसी क्रूर आतंकी जैसा होता है. चिकित्सा शोध बताते हैं कि इसका शिकार हुए लगभग 87 फीसदी मरीजों को वेंटिलेटर पर रखने की नौबत आ जाती है और इसकी मृत्यु दर 23.8 फीसदी है.

यह केम‍िकल क‍ितना खतरनाक है इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि इसे निगलने की जरूरत नहीं है. अगर तेज धूप में छिड़काव के दौरान इसकी कुछ बूंदें किसान की नंगी त्वचा पर गिर जाएं या सांस के जरिए अंदर चली जाएं, तो भी यह मौत का कारण बन सकता है. इसके अलावा, यह पक्षियों और मधुमक्खियों के लिए 'काल' है. एक बार छिड़काव होने पर यह मित्र कीटों का सफाया कर देता है.

जब देश दहल उठा
मोनोक्रोटोफॉस का इतिहास फाइलों में नहीं, बल्कि श्मशानों और अस्पतालों के आंकड़ों में दर्ज है. इसके कारण ऐसी बड़ी घटनाएं घटीं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं. कुछ बड़े हादसों का जिक्र कर लेते हैं.

मिड-डे मील हादसा: 16 जुलाई 2013 को बिहार के सारण (छपरा) जिले के गंडामन गांव का एक सरकारी स्कूल चीखों से गूंज उठा था. दोपहर का मुफ्त खाना खाते ही बच्चे जमीन पर गिरने लगे थे. इस हादसे में 23 मासूम बच्चों की मौत हो गई थी. फॉरेंसिक जांच में पता चला कि खाना पकाने के तेल को अनजाने में मोनोक्रोटोफॉस के खाली डिब्बे में रख दिया गया था. जहर इतना तीव्र था कि बच्चों को अस्पताल ले जाने का वक्त भी नहीं मिला.

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यवतमाल त्रासदी: साल 2017 की बात है. महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र का यवतमाल ज‍िला. यहां कपास की फसल पर 'गुलाबी सुंडी' का हमला हुआ था. किसानों ने बिना किसी सुरक्षा गियर (मास्क, चश्मा, दस्ताने) के खेतों में मोनोक्रोटोफॉस का अंधाधुंध छिड़काव किया. तेज धूप और हवा के कारण यह जहर सांस के रास्ते शरीर में गया. ज‍िससे 20 किसानों और खेत मजदूरों की तड़पकर मौत हो गई, जबकि सैकड़ों लोग अस्पताल पहुंचे. कई किसानों की आंखों की रोशनी चली गई.

अर्जेंटीना का पक्षी संहार: अर्जेंटीना का पक्षी संहार पर्यावरण के इतिहास की एक ऐसी दर्दनाक घटना है, जिसने खेती में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक कीटनाशकों के विनाशकारी प्रभाव को पूरी दुनिया के सामने उजागर किया. साल 1995-1996 के दौरान अर्जेंटीना के विशाल घास के मैदानों में सूरजमुखी और अल्फाल्फा की फसलों पर टिड्डियों का भारी हमला हुआ था. 

स्थानीय किसानों ने इन कीटों को मारने के लिए 'मोनोक्रोटोफॉस' नामक अत्यंत विषैले ऑर्गेनोफॉस्फेट कीटनाशक का अंधाधुंध हवाई और मैदानी छिड़काव कर दिया. इस छिड़काव का सबसे खौफनाक असर उत्तरी अमेरिका से उड़कर वहां आने वाले प्रवासी पक्षियों पर पड़ा. खेतों में कीटनाशक के सीधे संपर्क में आने और जहर से मर चुकी टिड्डियों को खाने (सैकेंडरी पॉइजनिंग) के कारण मात्र कुछ ही हफ्तों के भीतर अनुमानत 20,000 से अधिक बाज पक्षियों की तड़पकर मौत हो गई, जिससे पूरा इलाका मृत पक्षियों की लाशों से पट गया था.

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कागजी बनाम जमीनी हकीकत
भारत सरकार के नियमों के मुताबिक, भोजन में बचने वाले इसके घातक अवशेषों के कारण सब्जियों पर मोनोक्रोटोफॉस छिड़कना बहुत पहले से ही पूरी तरह गैर-कानूनी था. इसे केवल कपास, धान, मक्का, सरसों, गन्ना, मूंगफली, नारियल और चाय-कॉफी जैसी चुनिंदा फसलों के लिए ही स्वीकृत  किया गया था. लेकिन भारत के ग्रामीण बाजारों की हकीकत बिल्कुल जुदा थी.

चूंकि मोनोक्रोटोफॉस बाजार में मिलने वाले अन्य नए केम‍िकल से बहुत सस्ता था और कीड़ों को तुरंत मार गिराता था, इसलिए खाद-बीज के दुकानदारों ने इसे सब्जी उगाने वाले किसानों को थमा दिया. किसानों ने इसे धड़ल्ले से बैंगन, टमाटर, गोभी और शिमला मिर्च पर छिड़का, जिसके अवशेष शहरी उपभोक्ताओं की थाली तक पहुंचे.

सरकार का 'यू-टर्न'
साल 2020 में कृषि मंत्रालय ने मोनोक्रोटोफॉस सहित 27 खतरनाक कीटनाशकों को प्रतिबंधित करने का एक ड्राफ्ट ऑर्डर जारी किया, तो भारतीय एग्रोकेमिकल उद्योग में हड़कंप मच गया. कंपनियों ने सरकार के सामने दलील दी कि अचानक इस पर रोक लगाने से देश को भारी आर्थिक नुकसान होगा और नौकरियां चली जाएंगी. कंपनियों के भारी दबाव के बाद, नीति निर्माताओं ने इस फैसले की समीक्षा के लिए कृषि वैज्ञानिक डॉ. टीपी राजेंद्रन की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय तकनीकी कमेटी बना दी. इस कमेटी ने उद्योगों के तर्कों को स्वीकार करते हुए सरकार को रिपोर्ट सौंपी. नतीजा यह हुआ कि फरवरी 2023 में सरकार ने एक नया आदेश जारी कर अपने पुराने फैसले से यू-टर्न ले लिया और 27 में से 24 कीटनाशकों (जिसमें मोनोक्रोटोफॉस भी शामिल था) को प्रतिबंध की सूची से बाहर कर दिया.

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भारत की क्या 'मजबूरी' थी?
सरकार का तर्क था कि भारत का गरीब किसान महंगी, पेटेंटेड विदेशी दवाएं नहीं खरीद सकता. उसके मुकाबले कपास व धान के कुछ कीड़ों से निपटने के लिए मोनोक्रोटोफॉस सस्ता उपाय है. लेकिन सवाल यह है कि क्या किसान की जान इतनी सस्ती है कि सरकार कोई सुरक्षित और दूसरा सस्ता विकल्प नहीं ढूंढ सकी? भारत के कृषि वैज्ञानिक और सरकारी तंत्र दशकों में भी कोई ऐसा प्रभावी और सस्ता 'जैविक या सुरक्षित रासायनिक विकल्प' तैयार क्यों नहीं कर पाए जो इस जहर की जगह ले सके?

बहरहाल, पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने सरकार के यू-टर्न को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इसके बाद सरकार ने अक्टूबर 2024 में इसे बैन कर दिया. हालांकि, प्रतिबंधों के ढोल पीटने और जमीनी हकीकत के बीच का जो पाखंड भारतीय कृषि व्यवस्था में पसरा है, ‘मोनोक्रोटोफॉस’ उसकी सबसे मुकम्मल मिसाल है. सरकारी फाइलों में जिस खतरनाक केमिकल को इंसानों और पर्यावरण के लिए 'काल' मानकर बैन कर दिया गया, वो किसी न किसी रूप में आज भी ग्रामीण भारत में बिक रहा है. नीति निर्माताओं ने इसमें एक 'चोर दरवाजा' छोड़ दिया.

कमेटियों का 'खेल'
सरकारी गलियारों में विशेषज्ञ कमेटियों का गठन असल में किसी गंभीर मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने और एग्रोकेमिकल लॉबी को 'कम्फर्ट टाइम' देने का एक आजमाया हुआ प्रशासनिक नुस्खा सा लगता है. वर्मा से लेकर राजेंद्रन कमेटी तक का इतिहास गवाह है कि जब-जब इस जानलेवा जहर पर पूरी तरह बैन करने की बात उठी, तब-तब 'समीक्षा' के नाम पर नया ड्राफ्ट लाकर कंपनियों को चोर-दरवाजे दे दिए गए. यह जानते हुए भी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे इंसानी सेहत के लिए 'अत्यंत घातक' घोषित किया हुआ है.

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संसद में उठा सवाल
बहरहाल, कागजी प्रतिबंध के बावजूद जमीन पर मोनोक्रोटोफॉस का चोरी-छिपे और अवैध रूप से इस्तेमाल जारी है. इसी का पर‍िणाम है 20 मार्च 2026 को राज्यसभा में इस संबंध में एक सवाल उठाया गया. सरकार ने बताया कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए गए हैं किअक्टूबर 2024 के बाद इसका कोई नया निर्माण न हो और कंपनियां अपने पंजीकरण प्रमाणपत्र सरेंडर करें. कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत प्रतिबंधित कीटनाशकों का निर्माण या बिक्री एक दंडनीय अपराध है और इसकी जांच के लिए देश में 12,511 कीटनाशक निरीक्षक तैनात हैं.

सवाल पूछा गया क‍ि क्या सरकार का इरादा मोनोक्रोटोफॉस 36% SL के अलावा इसके अन्य फॉर्मूलेशन पर भी प्रतिबंध लगाने का है? यदि नहीं, तो इस बड़ी अनदेखी का क्या कारण है? इसके जवाब में सरकार ने बताया कि वह समय-समय पर उन कीटनाशकों की समीक्षा करती रहती है जो विदेशों में बैन हैं या इंसानों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं. यह समीक्षा विशेष विशेषज्ञ कमेट‍ियों और रज‍िस्ट्रेशन कमेटी के माध्यम से की जाती है और उन्हीं की सिफारिशों के आधार पर आगे प्रतिबंध का निर्णय लिया जाता है.

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