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Lavender Farming: लैवेंडर की खेती से कमाएं बढ़िया मुनाफा, एक बार फसल लगाने के बाद 8-10 साल तक छुटकारा!

Tips For Lavender Farming: लैवेंडर के पौधे के विकास के लिए रेतीली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है. कम उर्वरता वाली मिट्टी अभी भी उपयुक्त है. दरअसल, बहुत नम मिट्टी बीमारियों का कारण बनती हैं और पौधे को मार देती हैं.

Lavender Farming( File image) Lavender Farming( File image)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • एक बार फसल लगाने के बाद 8-10 साल तक छुटकारा
  • इस पौधे के विकास के लिए रेतीली दोमट मिट्टी की जरूरत

पिछले कुछ सालों में किसानों नें पारंपरिक खेती से इतर नई फसलों की ओर रूख किया है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये रही है कि पारंपरिक खेती से किसानों को उम्मीद के मुताबिक मुनाफा नहीं मिल रहा. ऐसे में किसानों को लिए अपनी आजीविका के साधन जुटाना मुश्किल होता जा रहा है. इन्हीं सब स्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार की संस्था CSIR एरोमा मिशन के तहत लैवेंडर की खेती (Lavender Farming) को बढ़ावा दे रही है.

एक बार फसल लगाने के बाद 8-10 साल तक छुटकारा

लैवेंडर की खेती (Lavender Farming) करने की तकनीक बिल्कुल लेमनग्रास की ही तरह ही है. इस पौधे को मध्यम गर्म वातावरण में उगाया जा सकता है. इसे एक से दो मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. साथ ही इसे बारह मासी पौधे की भी संज्ञा दी जाती है. हर पांच से छह महीने पर इसकी कटाई की जाती है. एक बार इसे लगाने के बाद किसान 8 से 10 साल तक दोबारा इसे लगाने से छुटकारा पा सकते है. साथ ही इससे निकलने वाले तेल से भारी मुनाफा कमा सकते हैं.

किस तरह की मिट्टी की आवश्यकता है?

इस पौधे के विकास के लिए रेतीली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है. कम उर्वरता वाली मिट्टी अभी भी उपयुक्त है. मिट्टी का पीएच 5.8 और 8.3 के बीच होना चाहिए. दरअसल, बहुत नम मिट्टी बीमारियों का कारण बनती हैं और पौधे को मार देती हैं.

आसानी से उपलब्ध है बाजार

लेमनग्रास की ही तरह लैवेंडर से भी तेल निकालने का होता है, ऐसे में इसका बाजार आसानी से उपलब्ध है. वैसे तो सबसे ज्यादा प्रमुख इससे तेल निकालना होता है. लेकिन सुंगधित और अच्छा दिखने की वजह से इसके पौधों को साज सज्जा में भी उपयोग किया जाता है. साथ ही ये दवाओं, सौंदर्य प्रसाधनों, खाद्य पदार्थों, साबुन, सेंट आदि में सुंगध की स्थिति बेहतर करने के लिए भी इसके तेलों का उपयोग किया जाता है.

पहाड़ी क्षेत्रों पर दिया जा रहा है जोर

पहाड़ी क्षेत्रों की जमीनें ज्यादा उत्पादक नहीं होती है. वहां, के किसान अक्सर खेती में हो रहे नुकसान से परेशान रहते हैं. ऐसे में ये पौधा वहां के किसानों के लिए वरदान साबित हो सकता है. इस पौधे को किसी खास तरह की तापमान की जरूरत नहीं होती है और इसका तेल बाजार में तकरीबन 10 हजार रुपये प्रति किलों तक बिक जाता है. ऐसे में ये पहाड़ी क्षेत्रों के किसानों के लिए इसकी खेती करना मुनाफा का सौदा हो सकता है. सरकार भी एरोमा मिशन के तहत कश्मीर सहित अन्य पहाड़ी क्षेत्रों पर इस परियोजना पर काम कर रही है. अधिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करें.

लैवेंडर की खेती से जुड़ी जानकारी के लिए यहां क्लिक करें. वहीं, खेती से जुड़ी अन्य जानकारियों के लिए किसान भाई वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद(CSIR) की वेबसाइट (csir.res.in) पर भी विजिट कर सकते हैं.

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