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Punjab Cotton Farming: पंजाब के किसानों के सिर पर खड़ी हुई नई मुसीबत, कपास की खेती में गुलाबी सुंडी ने मचाया कोहराम

Punjab Cotton News: मालवा कपास की खेती के लिए जाना जाता है. इस साल कपास के किसानों को 9000 रुपये प्रति क्विंटल तक की कीमत मिलने लगी थी. लेकिन किसान इससे पहले अपनी फसल की खुशियां मनाते, उनकी फसल पर गुलाबी खतरा मंडराने लगा.

बर्बाद हो रही कपास की खेती बर्बाद हो रही कपास की खेती
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कभी 9 हजार रुपये क्विंटल तक मिलने लगी थी कीमत
  • आज फसल का एक हिस्सा हो रहा गुलाबी सुंडी से बर्बाद

Punjab Cotton Farming: पंजाब अपने किसानों की समृद्धि और खुशहाली के लिए ही जाना जाता है. हरित क्रांति में पंजाब अग्रसर था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में किसान यहां बड़ी समस्याओं से जूझते रहे हैं. अनाज का कटोरा कहे जाने वाले पंजाब के किसान अब कर्ज तले भी दबने लगे हैं. पिछले एक साल से पंजाब के दूसरे जिलों की तरह मालवा के किसान भी कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में डटे रहे तो अब उनके सिर पर नई आफत आ खड़ी हुई है. अब तक किसी कानूनों के खिलाफ लड़ाई थी तो अब खेत में खड़ी उनकी फसल को बचाने की जंग जारी है. 

मालवा कपास की खेती के लिए जाना जाता है. इस साल कपास के किसानों को 9000 रुपये प्रति क्विंटल तक की कीमत मिलने लगी थी. लेकिन किसान इससे पहले अपनी फसल की खुशियां मनाते, उनकी फसल पर गुलाबी खतरा मंडराने लगा. इस साल गुलाबी सुंडी यानी पिंक बॉल वार्म ने जिंदगी में कोहराम मचा रखा है. किसानों की चिंता गुलाबी सुंडी और उन जहरीले कीड़ों से है जो कपास की पूरी फसल चट कर जाते हैं और किसान की पूरी मेहनत पर पानी फेर देते हैं. संगरूर के पास किसानों ने कपास की बर्बादी को बयां किया और बताया कि कैसे एक हिस्सा फसल का बर्बाद हो गया.

किसान दलजीत सिंह बताते हैं की प्रति एकड़ कई बार पांच क्विंटल तक कपास हो जाती है और उन्हें प्रति क्विंटल इस बार अच्छा रेट मिला है जो कि पिछले साल के मुकाबले ज्यादा है. दलजीत सिंह को कई साल प्रति क्विंटल 7000 रुपये मिले हैं, लेकिन अब वह कह रहे हैं कि गुलाबी सुंडी के प्रकोप से कई किसान बर्बाद हो गए हैं. वहीं, दलजीत के बेटे कहते हैं कि इन कीड़े-मकोड़ों से बचने के लिए बाजार में सरकार की ओर से दवा तक मुहैया नहीं है, इसलिए वह निजी दुकानदारों के भरोसे हैं जो कई बार उन्हें नकली दवाइयां भी थमा देते हैं. 

सतलुज की ठंड और नमी से सींचे जाने वाले बठिंडा में किसान पहले कृषि कानूनों के खिलाफ लड़े, तो अब पंजाब सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं> दो साल से उनकी कपास की फसल पर ग्रहण लगा हुआ है. भटिंडा जिले में तलवंडी साबो की ओर चलते हुए सड़क के दोनों तरफ कपास के खेत नजर आएंगे लेकिन जिन फसलों को लहराना था अब उन्हें देखकर किसानों का कलेजा जलता है. गुलाबी सुंडी ने किसानों की खुशियों पर पानी फेर दिया है. जसवीर कौर अपने खेतों में बचा हुआ कपास निकालना चाहती हैं, ताकि चार पैसे हाथ में आ जाएं. चार पौधों पर हाथ जाता है तो एक में से कपास के दो टुकड़े निकलते हैं, क्योंकि बाकी की फसल कीड़ों का शिकार होकर काली पड़ गई है. ‌‌जसवीर कौर कहती हैं कि इस फसल के दाम नहीं मिलेंगे. बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है. 

कपास की खेती
कपास की खेती

पंजाब में कितने हेक्टेयर में होती है कपास की खेती?

औसतन पंजाब में ढाई लाख हेक्टेयर जमीन पर कपास की खेती की जाती है, जिसमें सबसे ज्यादा खेती भटिंडा में होती है, जहां 90000 से लेकर 100000 हेक्टेयर के बीच में कपास की खेती होती है. धान गेहूं के अलावा कपास किसानों की कमाई का एक बड़ा जरिया है क्योंकि इसका समर्थन मूल्य पंजाब में बेहतर मिलता है. लेकिन पिछले 2 साल से कपास के किसान बेहाल हैं. हालत यह है कि कई किसानों ने अपनी खड़ी फसल पर हल चला दिया. राज्य की सरकार को भी इस आपदा के बारे में जानकारी है इसीलिए मुख्यमंत्री चन्नी ने खुद बठिंडा के इलाकों का दौरा किया था और किसानों के लिए मुआवजे का ऐलान भी किया था. मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद चन्नी सितंबर महीने में खुद भटिंडा के दौरे पर आए और गुलाबगढ़ गांव में किसानों से मुलाकात की. उन्होंने किसानों को गले लगाया था और आश्वासन दिया था कि उनके नुकसान की भरपाई की जाएगी. मुख्यमंत्री चन्नी भटिंडा के गुलाबगढ़ गांव में जिन बलविंदर सिंह से गले मिले थे, आजतक संवाददाता ने उनके परिवार से बात की. 

बलविंदर के बेटे कहते हैं की फसल खराब होने के बाद मुख्यमंत्री साहब आए तो थे और मुआवजे का वादा भी किया था लेकिन अब किसी को अपना वादा याद नहीं है. बलविंदर के बेटे का कहना है कि उन्हें 2 महीने बाद भी नुकसान हुई फसल का मुआवजा नहीं मिला. जो कर्ज लिया था उसे भी चुका नहीं पाए हैं और ऊपर से गेहूं की बुवाई का समय आ गया है जिसके लिए फिर कर्ज लेना पड़ेगा. बलिंदर के बेटे कहते हैं कि अब चुनाव आ रहा है तो जब दरवाजे पर नेता आएंगे तब हम सवाल पूछेंगे कि आखिर मुआवजे के वादे का क्या हुआ? 

कपास को पहुंच रहा नुकसान
कपास को पहुंच रहा नुकसान

दो किस्में की उगाई जाती है कपास

पंजाब में कपास की दो किस्में उगाई जाती है जिसमें एक देसी हुई है और दूसरा बीटी कॉटन. किसानों का कहना है कि बीटी कॉटन को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. भटिंडा की मलकीत कौर ने कई एकड़ खेत में कपास की फसल उगाई और अब उनके चेहरे पर मायूसी है क्योंकि फसल गुलाबी सुंडी का शिकार हो गई है. मलकीत कौर कहती हैं कि नुकसान ज्यादा हुआ है और मुआवजा अभी तक नहीं मिला ऐसे में मजदूरों को मजदूरी देने के लिए भी पैसे नहीं हैं.

तो क्या भटिंडा के किसानों की नाराजगी चुनावों में दिखाई देगी?

युवा किसान प्रश्न सिंह कहते हैं कि जब हमारी कोई शुद्ध नहीं लेगा तो चुनाव में हम भी उनसे पूछेंगे की वोट क्यों दें? सिर्फ मुख्यमंत्री से ही नहीं, बल्कि भटिंडा सीट से आम आदमी पार्टी की विधायक बलजिंदर कौर के खिलाफ भी तगड़ी नाराजगी है. प्रश्न सिंह कहते हैं कि बलजिंदर कौर के चुनाव में हमने अपनी गाड़ियों में डीजल पेट्रोल चलाए और उनके लिए चुनाव प्रचार किया लेकिन जब हम मुश्किल में आए हैं तब एक बार भी पलट कर उन्होंने हमारी ओर नहीं देखा. 

मलकीत कौर के बेटे और दूसरे किसानों में भी नाराजगी इस बात को लेकर के है कि ना तो स्थानीय नेता उनकी मदद के लिए आते हैं ना पंजाब सरकार ने उनकी सुनवाई की. जबकि उनकी महीने की गाड़ी पसीने की कमाई खड़ी फसल कीड़ों की चपेट में आ चुकी है. ज्यादा मुनाफे के लिए बीटी कॉटन कपास की बुवाई की दवा का छिड़काव भी किया खाद पानी दे दिया लेकिन जब फसल काटने की बारी आई तो हाथ में काली रुई मिली जब किसी काम की नहीं है. बेबे मनकीरत कौर के बेटे कहते हैं कि कई किसानों ने तंग आकर अपनी खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चला दिए क्योंकि और कोई जरिया ही नहीं था नुकसान ज्यादा हो गया. स्थानीय विधायक रुपिंदर कौर के खिलाफ नाराजगी दिखाई देती है. 

हाल ही में रुपिंदर कौर ने आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देकर कांग्रेस का दामन थाम लिया है. 2017 में आम आदमी पार्टी पंजाब के जिन सीटों पर जीत हासिल कर के मुख्य विपक्ष बनी थी उसमें एक भटिंडा किसी भी शामिल है. किसान कहते हैं कि वह जागरूक हैं और जिन नेताओं को आज किसानों से मिलने की फुर्सत नहीं है प्रचार के दौरान वह न सिर्फ सवाल पूछेंगे बल्कि अपना अधिकार मांगेंगे. कपास के किसानों का मुद्दा भी चुनाव में जरूर गूंजेगा. 

 

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