Geneticaly modified Farming Of Mustard: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले बायोटेक नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी( जीआईसी) ने जेनेटिकली मॉडीफाइड सरसों की व्यवसायिक खेती को मंजूरी दे दी है. फिलहाल इसकी बुवाई इस साल रबी सीजन के दौरान शुरू होगी कि नहीं इसको लेकर अभी भी संशय है. इसपर सभी को अभी सरकार के फैसले का इंतजार है. बता दें कि इससे पहले 2002 में व्यवसायिक खेती के लिए केवल एक जीएम फसल बीटी कपास को मंजूरी दी गई थी.
जेनेटिकली मॉडीफाइड सरसों को डीएमएच-11 के नाम से भी जाना जाता है. इसे दिल्ली विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स (सीजीएमसीपी) द्वारा विकसित किया गया था, जिसका नेतृत्व पूर्व वाइस चांसलर दीपक पेंटल ने किया था. बायोटेक नियामक जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी के इस फैसले का विरोध कई हरित समूहों और अग्रणी संगठनों द्वारा होना शुरू हो गया है. इन संगठनों का कहना है कि जेनेटिकली मॉडीफाइड सरसों इंसान के स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है. बता दें कि 2015-16 में जेनेटिकली मॉडीफाइड सरसों की व्यवसायिक खेती अप्रूवल के नजदीक पहुंची थी. हालांकि, सिविल सोसायटी के विरोध के चलते इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था.
क्या है जीएम तकनीक
जेनेटिक इंजिनियरिंग के जरिए किसी भी जीव या पौधों के जीन को दूसरे पौधों में डाल कर एक नई फसल प्रजाति विकसित की जाती है. इन फसलों की जीन में बायॉटेक्नॉलजी और बायॉ इंजिनियरिंग के जरिए परिवर्तन किया जाता है. 1982 में तंबाकू के पौधे में इसका पहला प्रयोग किया गया था. 1996 से लेकर 2015 के दौरान पूरी दुनिया में जीएम फसलों की खेती में बढ़ोतरी देखी गई है.
जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी के फैसले पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट
खाद्य और व्यापार नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने हड़बड़ी और अंडर प्रेशर में ये डिसीजन ले लिया है. यह एक जंक वैरायटी है. इसका पर्यावरण और इंसानों पर भी बुरा असर पड़ेगा. मुझे नहीं पता है क्यों एक ऐसी वैरायटी वाली सरसों की खेती को मंजूरी दी गई, जो कम पैदावार वाली है. इसके अलावा न ही इसके तेल में कुछ ऐसा खास है, जिससे लोगों को फायदा होगा. मुझे समझ में नहीं आता कि भारत कम उपज देने वाली जीएम सरसों की किस्म की खेती करके खाद्य तेल के आयात में कटौती करने की योजना कैसे बना रहा है और कैसे तेल की उपज में इजाफा करेगा. इस तरह के फैसले पर जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी की जवाबदेही बनती है कि कैसे लो यील्डिंग वाली वैरायटी को मंजूरी दे दी गई है.
यह दावा किया जाता है जीएम सरसों की पैदावार 30 प्रतिशत अधिक है. इस दावे को हवा में उड़ाते हुए देविंदर शर्मा कहते हैं कि डीएमएच-11 से भी ज्यादा उपज देने वाली कम से कम 4 वैरायटीज भारत में मौजूद हैं. डीएमएच-1, डीएमएच-2, डीएमएच-3, डीएमएच-4 सरसों की वैरायटी की पैदावार जीएम सरसों से ज्यादा है. केंद्र सरकार के ही संगठन आईएसआर ने भी अपनी रिपोर्ट में भी इस बात पर हामी भरी है.
देविंदर शर्मा के मुताबिक सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स, यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली साउथ कैंपस के एक वैज्ञानिक द्वारा की गई एक प्रस्तुति में भी ये दिखाया गया है कि उच्च उत्पादकता वाली सरसों की चार किस्में पहले से मौजूद हैं. तीन किस्में एक ही डीएमएच श्रृंखला में हैं. डीएमएच -4, जो एक पारंपरिक किस्म है, जीएम सरसों की तुलना में 14.7 प्रतिशत अधिक उपज प्रदान करती है. पायनियर और एडवांटा द्वारा उत्पादित दो और किस्में भी जीएम सरसों से ज्यादा उपज देती हैं. 2015 में जीएम तकनीक से सरसों की खेतो को लेकर दो टेस्ट की बात की गई थी वह अभी तक नहीं की गई. ऐसे में इसकी मंजूरी पर सवाल उठता है.
क्या शहद की खेती पर पड़ेगा बुरा असर?
मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में काम कर रहे हैं कई संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. इन संगठनों का कहना है कि जेनेटिकली मॉडीफाइड सरसों इंसान के स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है. मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में काम करने वाली कनफेडरेशन ऑफ एपीकल्चर इंडस्ट्री (सीएआई) के मुताबिक जेनेटिकली मॉडीफाइड तरीके से सरसों की खेती की शुरुआत होने पर शहद की खेती पर बुरा असर पड़ेगा. इससे तकरीबन 10 लाख मधुमक्खी पालकों के जीवनयापन पर संकट आ जाएगा.
बता दें मधुमक्खियों के परागण में सरसों की खेती का अहम योगदान होता है. ज्यादातर जगहों पर चिकित्सकीय गुणों की वजह जीएम मुक्त सरसों के शहद की मांग है. ऐसे में अन्य देशों में होने वाला शहद निर्यात पूरी तरह ठप हो जायेगा. सीएआई के अध्यक्ष, देवव्रत शर्मा कहते हैं कि जीएम फसल आने के बाद किसानों को निर्यात के लिए गैर-जीएम फसल परीक्षण से गुजरना होगा जिसके परीक्षण काफी महंगे होंगे, शहद के व्यापार को काफी नुकसान पहुंचेगा.
साल 2017 में इसकी मंजूरी पर लगी थी रोक
बता दें कि साल 2017 में भी पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) ने इसी तरह की सिरफारिश की थी. इस कदम का विरोध करने के लिए स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं और किसान संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद इसे मंजूरी देने के निर्णय पर विराम लग गया था.