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सेना-कट्टरपंथियों से पार पाना नहीं होगा इमरान के लिए आसान, ये चुनौतियां कर रहीं इंतजार

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की जीत के बाद इमरान खान का पीएम बनना तय हो गया है. वे करीब 22 साल के राजनीतिक संघर्ष के बाद इस पद पर पहुंच रहे हैं, लेकिन आगे भी उनकी राह में चुनौतियां कम नहीं हैं.

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता इमरान खान

करीब 22 साल तक संघर्ष करने के बाद आखिरकार पूर्व क्रिकेटर और अब पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) पार्टी के नेता इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं, लेकिन 'नए पाकिस्तान' बनाने की राह में उनके सामने चुनौतियां कम नहीं हैं.

1. सेना-आईएसआई-आतंकियों की तिकड़ी

ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तान पर वास्तव में सेना-आईएसआई और आतंकियों की तिकड़ी राज करती है. खासकर पाकिस्तान की भारत नीति पर सेना-आईएसआई की काफी दखल रहती है. पाकिस्तान के 71 साल के इतिहास में ज्यादातर समय तक सत्ता पर सेना का ही कब्जा रहा है. सेना बहुत मजबूत है और देश में कई बार तख्तापलट की घटनाएं हो चुकी हैं. आलोचक यहां तक कह रहे हैं कि इमरान खान 'सेना-आईएसआई की सर्कस के ही कलाकार' हैं, यानी उन्हें सेना-आईएसआई ने ही खड़ा किया है.

दूसरी तरफ, खुफिया एजेंसी आईएसआई भी काफी मजबूत है और उसकी भी पाकिस्तान की राजनीति में काफी दखल रहती है. ऐसा माना जाता है कि कई आतंकी संगठनों को आईएसआई प्रश्रय देती है और उन्हें ट्रेनिंग आदि मुहैया कर कश्मीर में हमले के लिए भेजती है.

पाकिस्तान दुनिया में आतंक का निर्यात तो करता ही है, खुद उसके लिए भी आतंकी भस्मासुर साबित हो रहे हैं. पाकिस्तान में हर हफ्ते, दस दिन में कहीं न कहीं बम धमाके की घटनाएं देखी जाती हैं, जिनमें अब तक सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं. चुनाव के दौरान भी बम विस्फोट की घटनाएं हुईं.

इमरान खान ने आजतक-इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि वे 90 दिन में आतंक का फन कुचल देंगे. उनके लिए आतंकियों का खात्मा एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि तमाम आतंकी संगठन आईएसआई की सरपरस्ती में पनप रहे हैं.

इमरान खान को सरकार बनाने के लिए कुछ कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों का सहारा लेना होगा और यह राजनीतिक दल भविष्य में उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. पाकिस्तान की राजनीति में धार्मिक कट्टरपंथी बड़ी संख्या में हैं और अभिजात वर्ग हावी रहा है.

2. अर्थव्यवस्था की खराब हालत

पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की हालत खराब है. जीडीपी में ग्रोथ दर काफी धीमी पड़ गई. रुपया ऐतिहासिक गिरावट के दौर में है. देश आईएमएफ और चीन के कर्ज में डूबा हुआ है. अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि पाकिस्तान में अब कुछ ही हफ्तों के लिए विदेशी मुद्रा बची है. ऐसी दशा में इमरान पाकिस्तान को चुनौतियों से बाहर कैसे निकाल पाते हैं. यह देखना होगा.

3. युवाओं का सपना

इमरान खान को आप पाकिस्तान का नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल दोनों मान सकते हैं. उन्होंने जबर्दस्त वायदे किए हैं और युवाओं में काफी सपने जगाए हैं. उन्होंने 'नया पाकिस्तान बनाने का सपना दिखाया और पाकिस्तान के युवा वोटर्स ने उन्हें जबर्दस्त समर्थन दिया.' युवाओें के इन सपनों को पूरा करना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी. बेरोजगारी से युवाओं में काफी हताशा है और अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं होने से रोजगार बढ़ने की संभावना भी बहुत सीमित है. युवाओं का एक तबका कट्टरपंथियों के प्रभाव में है और चरमपंथी संगठनों में सक्रिय है. यही नहीं हाफिज जैसे तमाम आतंकी आका पैसे के बल पर युवाओं को अपना लड़ाका बनाने के लिए लुभाते रहे हैं. युवाओं को इस दलदल से बाहर निकालना इमरान के लिए एक बड़ी चुनौती होगी.

4. भारत के प्रति रवैया

एक आधुनिक सोच वाले और विदेश में पढ़े क्रिकेटर के पीएम बनने से भारत में भी लोगों को काफी उम्मीद है कि वह फिर से दोनों देशों में अमन कायम करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे. लेकिन व्याहारिकता की धरातल पर देखा जाए तो उनकी यह राह आसान नहीं है. पाकिस्तान में ऐसा माना जाता है कि भारत के प्रति नीति बनाने में सेना-आईएसआई की पूरी दखल रहती है और जब कोई प्रधानमंत्री यह सोच लेता है कि वह स्वतंत्र है और भारत के प्रति शांति-अमन की दिशा में आगे बढ़ता है तो उसके पर कतर दिए जाते हैं. इसलिए यह देखना होगा कि इमरान इससे कैसे निबटते हैं.

5. अनुभवहीनता

इमरान खान क्रिकेट के एक बेहतरीन कप्तान रहे हैं, लेकिन प्रशासन या सरकार चलाने का उनका अनुभव शून्य है. वे पहली बार सरकार में आ रहे हैं और सीधे प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. उनके ज्यादातर मंत्री भी अनुभवहीन होंगे. यह कुछ-कुछ दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल जैसा मामला होगा. यह अनुभवहीनता उनके लिए आगे कई मुश्किलें पैदा कर सकती है.

6. चीन-अमेरिका की चुनौतियां

अमेरिका और चीन का बदल रहा रवैया भी इमरान के लिए एक मुश्किल माहौल दे सकता है. अपने भाषण में तो बड़ी बात करते हुए इमरान ने अमेरिका से बराबरी का व्यवहार करने की अपेक्षा की है, लेकिन पाकिस्तान जिस तरह से अमेरिकी सहायता पर निर्भर रहा है, उससे यह दिवास्वप्न ही लगता है. यह रिश्ता एकतरफा है. उन्होंने पाकिस्तान के ट्राइबल इलाकों में अमेरिकी ड्रोन हमलों की सख्त आलोचना की है. अमेरिका ने इसी साल पाकिस्तान की आर्थ‍िक सहायता रोक दी थी. दूसरी तरफ, चीन के भारत से रिश्ते सामान्य हो रहे हैं. चीन सीपीईसी के रूप में पाकिस्तान में अगर भारी निवेश कर रहा है तो वह पाकिस्तान पर अपना दबदबा भी कायम रखना चाहेगा.

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