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लंदन में कश्मीरी बच्चों ने दिखाई अपने पूर्वजों के पलायन की दर्दनाक हकीकत

नाटक के जरिए कश्मीरी बच्चों ने अपने पूर्वजों की 1990 में जम्मू-कश्मीर से हुए दर्दनाक पलायन की कहानी को दर्शाया. जिन लोगों को कश्मीर से पलायन करना पड़ा था, वो आज भी कश्मीर वापसी का इंतजार कर रहे हैं.

लंदन में कश्मीरी हिंदुओं ने मनाया बलिदान दिवस लंदन में कश्मीरी हिंदुओं ने मनाया बलिदान दिवस

  • कश्मीरी पंडितों के नेता टीका लाल टपलू की याद में मनाया बलिदान दिवस
  • नाटक में कश्मीरी पंडितों की पलायन की कहानी का किया गया मंचन

जम्मू-कश्मीर से पलायन और अत्याचार की दर्दनाक कहानी आज भी कश्मीरी हिंदुओं के जहन में ताजी है. ये कश्मीरी हिंदू अब भी अपनी वापसी का इंतजार कर रहे हैं. इसी कड़ी में कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार की कहानी का लंदन में शनिवार को नाट्य रूपांतरण किया गया, जिसको देखकर सभी का दिल पसीज गया और आंख में आंसू आ गए.

'वी रिमेंबर' नामक नाटक में जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार के इतिहास को दर्शाने की कोशिश की गई. लंदन के जोरोएस्ट्रियन सेंटर में 14 सितंबर को यह कार्यक्रम बलिदान दिवस के रूप में मनाया गया. बलिदान दिवस कश्मीरी पंडितों के नेता टीका लाल टपलू की याद में मनाया जाता है. साल 1989 में इसी दिन टीका लाल टपलू की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी.

कश्मीरी पंडित्स कल्चरल सोसाइटी की संस्थापक सदस्य और प्ले-राइटर लक्ष्मी कौल ने बताया कि ब्रिटेन में उनकी सोसाइटी इस कार्यक्रम को पिछले कई वर्षों से आयोजित कर रही है. इसके लिए हम अपनी दर्दनाक दास्तां बताते और उसको याद करते हैं.

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शनिवार को इस नाट्य रूपांतरण को बच्चों ने प्रस्तुत किया. इसके जरिए उन्होंने अपने पूर्वजों की 1990 में जम्मू-कश्मीर से हुए दर्दनाक पलायन की कहानी को दर्शाया. जिन लोगों को कश्मीर से पलायन करना पड़ा था, वो आज भी कश्मीर वापसी का इंतजार कर रहे हैं. हालांकि, अभी तक इनकी कश्मीर में वापसी नहीं हो पाई है.

नाट्य रूपांतरण में प्रस्तुति देने वाली भूवी कौल ने कहा, 'मैंने हमेशा अपने माता-पिता से सुना था कि वो दोनों कश्मीर से आए थे. हालांकि जब मैं हर साल अपने दादा-दादी के पास जाती थी, तो मुझको कभी यह समझ में नहीं आता था कि जब मैं जम्मू जा सकती हूं, तो वहां से 200 मील दूर अपने माता-पिता के जन्मस्थल क्यों नहीं जा सकती? जब मेरी मां ने मुझको कश्मीरी हिंदुओं पर हुए अत्याचार और उनके पलायन की कहानी सुनाई, तब मुझको समझ में आया कि उनके परिवार के साथ क्या हुआ था?'

इस नाटक का निर्देशन आरुषि ने किया. वो इस तरह की कहानियों पर पिछले 10 साल से काम कर रही हैं. आपको बता दें कि हाल ही में मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया है, जिसके बाद से कश्मीरी पंडितों की अपनी जन्मभूमि की वापसी की उम्मीद बढ़ी है.

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