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COP26: भारत के अड़े रहने से भड़के पश्चिमी देश तो चीनी मीडिया ने किया बचाव

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन से जुड़े सम्मेलन में भारत और चीन की एकजुटता के चलते कई पश्चिमी देश नाराज हुए. भारत और चीन ने जलवायु सम्मेलन के दौरान प्रस्ताव में एक बड़ा बदलाव कराने में कामयाबी हासिल की. हालांकि पश्चिमी देशों से लेकर मीडिया तक ने भारत और चीन के इस कदम की आलोचना की है. अब इस मसले पर चीन की प्रतिक्रिया सामने आई है.

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शी जिनपिंग के साथ पीएम मोदी फोटो क्रेडिट: रॉयटर्स शी जिनपिंग के साथ पीएम मोदी फोटो क्रेडिट: रॉयटर्स
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ग्लासगो में भारत और चीन ने दिखाई थी एकजुटता
  • 'पश्चिमी देशों को पूरा करना चाहिए अपना वादा'

स्कॉटलैंड के ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन से जुड़े सम्मेलन सीओपी 26 में भारत और चीन की एकजुटता के चलते कई पश्चिमी देश नाराज हुए. दरअसल इस सम्मेलन में पेश मसौदे में सभी देशों को कोयले के इस्तेमाल के लिए फेज आउट (कोयले के इस्तेमाल को पूरी तरह से बंद करना) पर सहमति देनी थी लेकिन आखिरी पलों में भारत ने इसे जरूरत के हिसाब से फेज डाउन (धीरे-धीरे कम करना) करा लिया. चीन ने भी इस मामले में भारत का समर्थन किया. भारत के इस कदम की ईयू, स्विट्जरलैंड, मेक्सिको, फिजी और मालदीव्स समेत कई देशों ने कड़ी निंदा की. हालांकि, चीनी मीडिया ने भारत के रुख को सही बताते हुए पश्चिमी देशों को फटकार लगाई है.

चीन की सरकार के मुखपत्र कहलाने वाले अखबार ग्लोबल टाइम्स ने इस मुद्दे पर एक संपादकीय लेख छापा है. ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख के शीर्षक में लिखा है कि पश्चिमी देशों को कोयले के इस्तेमाल को लेकर भारत और चीन को फटकार लगाना बिल्कुल अनुचित है. विकसित देशों को ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तरफ आगे बढ़ने में विकासशील देशों की आर्थिक मदद करनी चाहिए.

'विकसित देश समझें, विकासशील देशों के हालात'

जियामेन यूनिवर्सिटी में चाइना सेंटर फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स रिसर्च के निदेशक लिन बोकियांग ने ग्लोबल टाइम्स के साथ बातचीत में कहा कि विकसित देशों को विकासशील देशों के हालात को समझने की कोशिश करनी चाहिए जो जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े शिकार हैं. दुनिया के सबसे बड़े विकासशील देशों चीन और भारत का फोकस अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बेहतर बनाने पर है. इसके अलावा इन्हें जलवायु परिवर्तन के खतरनाक परिणामों का भी सामना करना पड़ रहा है, ऐसे में दोनों ही देशों के लिए कोयले को फेस आउट करना असंभव सा है. 

गौरतलब है कि चीन ने 2020 के अंत में अपने कोयले के उपयोग में 56.8 प्रतिशत की कटौती की थी. वहीं, भारत की बात करें तो यहां बिजली उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक है. सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी के एशिया रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रतिष्ठित फेलो और एक अनुभवी राजनयिक किशोर महबूबानी ने ग्लोबल टाइम्स के साथ बातचीत में कहा कि विकासशील देशों के पास भी अपने लोगों के जीवन में सुधार करने का अवसर होना चाहिए.

'पश्चिमी देश विकासशील देशों को किया गया वादा पूरा क्यों नहीं करते?'

उन्होंने आगे कहा कि विकसित देशों ने जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है. ऐसे में इन देशों को ये बात समझनी जरूरी है कि विकासशील देशों को भी आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए. विकसित देश दशकों से अपने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए कोयले पर निर्भर हैं और ये देश चाहते हैं कि विकासशील देश जो पिछले कुछ सालों में आर्थिक मोर्चे पर तेजी से आगे बढ़े हैं, वे कोयले को पूरी तरह से खत्म कर दें? मुझे लगता है कि विकसित देशों की ये मांग काफी अनुचित है. पश्चिमी देश, विकासशील देशों को क्लाइमेट चेंज से लड़ने के लिए सालाना 100 अरब डॉलर देने के अपने वादे को पूरा करके इस दिशा में एक बड़ा कदम उठा सकते थे. दुख की बात है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया. 

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने भी सोमवार की ब्रीफिंग में कोयले की खपत पर अंकुश लगाने के लिए चीन की नीतियों को सही ठहराया था. उन्होंने कहा कि कोयले को चरणबद्ध तरीके से कम करना एक निरंतर प्रक्रिया है और विकासशील देशों की पर्याप्त ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए.  झाओ ने कहा, 'हम पहले विकसित देशों को कोयले का उपयोग बंद करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं. ये नहीं भूलना चाहिए कि इन विकसित देशों ने विकासशील देशों को ऊर्जा के क्षेत्र में पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करने की बात भी कही थी.'


 

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