scorecardresearch
 

न दुनिया का साथ-न हक में हालात, फिर कैसे तालिबान से मुकाबला करने उतर गए 'पंजशीर के शेर'

तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है, वो दुनिया को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है, अपनी दागदार छवि को बदलने के प्रयास कर रहा है, फिर भी अहमद मसूद झुकने को राजी नहीं हैं, वो इसे जंग का आगाज मान रहे हैं. लेकिन इस जंग में वो ताकतवर तालिबान के सामने कैसे टिक पाएंगे, ये भी बड़ा सवाल है. 

अहमद मसूद और तालिबान लड़ाके अहमद मसूद और तालिबान लड़ाके
स्टोरी हाइलाइट्स
  • पंजशीर पर कब्जा करने पहुंच गया है तालिबान
  • तालिबान से लड़ने को तैयार हैं पंजशीर के लड़ाके

'मैं अहमद शाह मसूद का बेटा हूं, सरेंडर शब्द मेरी डिक्शनरी में नहीं है...' ये हौसला है अहमद मसूद का, जो अपने पिता अहमद शाह मसूद की तरह अफगानिस्तान में रहते हुए तालिबान से लोहा ले रहे हैं. तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है, वो दुनिया को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहा है, अपनी दागदार छवि को बदलने के प्रयास कर रहा है, फिर भी अहमद मसूद झुकने को राजी नहीं हैं, वो इसे जंग का आगाज मान रहे हैं. लेकिन इस जंग में वो ताकतवर तालिबान के सामने कैसे टिक पाएंगे, ये भी बड़ा सवाल है. 

इस सवाल की हकीकत अहमद मसूद भी जानते हैं. वो तालिबान के आगे सिर न झुकाने और पंजशीर में उसे एंट्री न देने का दंभ तो भर रहे हैं, साथ ही ये भी स्वीकार कर रहे हैं कि तालिबान से लड़ने के लिए उनके पास जो ताकत फिलहाल है वो काफ़ी नहीं है, इसलिए उन्‍होंने दुनिया के दूसरे देशों से मदद की अपील की है. 

20 साल पहले जैसे मदद की, वही कीजिए

मसूद ने फ्रांस, यूरोप, अमेरिका और अरब दुनिया के उन लोगों से भी मदद की अपील की है जिन्हें लेकर मसूद ने कहा कि 20 साल पहले सोवियत संघ और फिर तालिबान के खिलाफ लड़ाई में हमारी मदद की गई थी. मसूद ने कहा है कि क्या आप पहले की तरह एक बार फिर हमारी सहायता करेंगे? कुछ के विश्वासघात के बावजूद हमें अभी भी आप पर भरोसा है.

अहमद मसूद के नेतृत्व वाले नॉर्दर्न अलायंस को दुनिया की मदद की दरकार है, लेकिन अभी तक उसे कोई ऐसा मददगार मिल नहीं पाया है. बल्कि झटके ही लग रहे हैं. 20 साल से जो अमेरिकी फौज अफगानिस्तान में डेरा डाले हुई थी उसकी अब रवानगी हो गई है. सत्ता में जो लोग थे, वो देश छोड़कर चले गए हैं और हामिद करजई समेत जो पुराने सत्ताधारी हैं, वो भी तालिबान के पाले में आ गए हैं. 

इतना ही नहीं, अभी मसूद मदद की गुहार लगा ही रहे हैं और तालिबान के हथियारबंद लड़ाके पंजशीर के मुहाने पर पहुंच गए हैं. तालिबान ने अहमद मसूद को सरेंडर की चेतावनी दी है, नहीं तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहा है. 

अब अहमद मसूद के सामने बड़ी चुनौती है. वो उम्मीद कर रहे हैं कि 1996 में तालिबान राज के खिलाफ जिस तरह उनके पिता अहमद शाह मसूद ने नॉर्दर्न अलायंस खड़ा किया था और उसे भारत, ईरान व रूस जैसे ताकतवर मुल्कों का समर्थन मिला था, अब भी कुछ वैसा ही हो जाए. ताकि वो अपने पिता की तरह ही तालिबान को हरा सकें और काबुल से कब्जा छुड़ा सकें. 

नॉर्दर्न अलायंस 2.0 की उम्मीद पर संकट

नॉर्दर्न अलायंस 2.0 की जो संभावना अहमद मसूद तलाश रहे हैं उसके संकेत नजर नहीं आ रहे हैं. ईरान पहले से ही अमेरिका के खिलाफ लड़ने के लिए तालिबान को हथियार की मदद देता आया है. और अब जबकि तालिबान का राज कायम हो रहा है, तो जाहिर है ईरान उसके प्रति दो दशक पहला रवैया नहीं अपनाएगा. दूसरी तरफ चीन-ईरान के संबंध भी अहमद मसूद की उम्मीद में बाधक ही बनेंगे.

भारत भी अफगानिस्तान को लेकर वेट एंड वॉच की स्थिति में नजर आ रहा है. फिलहाल, भारत रेस्क्यू मिशन में जुटा है. तालिबान को मान्यता देने के सवाल पर भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि भारत अफगान के हालात पर नजर बनाए हुए हैं. जयशंकर ने कहा है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान के हालात हमारे नजरिये को तय करेंगे. जाहिर है, इन परिस्थितियों के बीच नॉर्दर्न अलायंस को भारत का समर्थन हासिल होने की उम्मीद भी कम ही है. 

रूस ने तो अपने इरादे साफ जाहिर कर दिए हैं. अफगानिस्तान में रूस के एंबेसडर ये कह चुके हैं कि तालिबान का कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने यहां तक कहा है कि काबुल में तालिबान के कंट्रोल के बाद सुरक्षा के हालात काफी बेहतर हैं, जैसे पहले भी नहीं थे. यानी रूस को तालिबान मंजूर है, तो फिर नॉर्दर्न अलांयस से उसकी दूरी को सत्यता ही माना जा सकता है. 

उम्मीद और हौसले के सहारे पंजशीर के शेर

अहमद मसूद ने एक इंटरव्यू में बताया है कि उनके मुजाहिदीन लड़ाके एक बार फिर से तालिबान से लड़ने के लिए तैयार हैं. मसूद ने दावा किया है कि हमारे पास बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद है. मेरी अपील पर कई लोग साथ जुड़े हैं. सेना के कई जवान भी मेरे साथ हैं जो हथियार डालने से नाराज हैं. 

ये बात सच है कि पंजशीर में तालिबान के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए 10 हजार से ज्यादा फौजी इकट्ठा हो चुके हैं. इनमें अफगानिस्तान के वॉर लॉर्ड कहे जाने वाले जनरल अब्दुल रशीद दोस्तम की फौजें भी शामिल हैं. 

इसके अलावा महमूद को अता मोहम्मद नूर का भी समर्थन है, जो जांबाज लड़ाके हैं और काबुल फॉल के वक्त सुरक्षित निकल गए थे. साथ ही ये भी बताया जा रहा है कि ताजिकिस्तान में 6000 से ज्यादा अफगान सैनिक-वायुसैनिक और फाइटर जेट काबुल फॉल के समय ले जाए गए थे, जिनका इस्तेमाल अमरुल्ला सालेह तालिबान के खिलाफ करा सकते हैं. 

अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने भी तालिबान के आगे न झुकने का ऐलान कर दिया है. वो कह रहे हैं कि हम अफगानों को साबित करना होगा कि अफगानिस्‍तान, वियतनाम नहीं है, अमेरिका और नाटो से अलग हमने अभी हौसला नहीं खोया है. 

हौसला जरूर है लेकिन अहमद मसूद खुद मान चुके हैं कि उनके पास जो ताकत है वो तालिबान से लड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है. जबकि दूसरी तरफ तालिबान के पास सत्ता और समर्थन के साथ हथियारों का जखीरा भी है. लिहाजा, तालिबान के खिलाफ क्या इन लड़ाकों को मदद मिल पाएगा या ये लड़ाके कब तक और कैसे अपने दम जंग लड़ पाएंगे, इस पर सबकी नजर है. 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें
ऐप में खोलें×