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विश्व

भारत की उपेक्षा करने के सवाल पर क्या बोले दिल्ली आए रूसी विदेश मंत्री

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हाल के दिनों रूस और भारत के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. कहा जा रहा है कि रूस और भारत अब एक दूसरे के लिए बहुत उपयोगी नहीं रह गए हैं. लेकिन दोनों देशों के रिश्तों का अतीत बहुत स्वर्णिम रहा है. चीन के कारण भारत को अमेरिका की तरफ देखना पड़ रहा है और ऐसे में रूस के साथ रिश्ते असहज हो जाते हैं.

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रूस के विदेश मंत्री लावरोव से सवाल पूछा गया, "रूस ने अफगानिस्तान में भारत के हितों और शांति प्रक्रिया में उसके प्रयासों को पहचाना है लेकिन फिर भी मॉस्को में हुई बैठक में भारत को शामिल नहीं किया गया. कई लोगों ने ये भी कयास लगाए कि रूस ने पाकिस्तान की वजह से भारत की उपेक्षा की. रूस अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया और हालात सामान्य करने की कोशिशों में भारत को किस भूमिका में देखता है?"

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इस सवाल के जवाब में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा, अफगानिस्तान में भारत की भूमिका अहम है और अफगान शांति समझौते के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में नि:संदेह उसे शामिल होना चाहिए. रूस के विदेश मंत्री ने कहा कि अफगानिस्तान मुद्दे पर बनाए गए ट्रायोका समूह और उसके विस्तारित रूप (पाकिस्तान, तालिबान, अमेरिका, रूस, चीन और ईरान) का हिस्सा नहीं है. 18 मार्च को इसी फ्रेमवर्क के तहत मॉस्कों में अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया को लेकर बैठक आयोजित की गई थी. लेकिन इसके साथ ही, भारत रूस के उस मैकेनिजम का हिस्सा है जिसमें अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों, क्षेत्र के अहम देश और अमेरिका को शामिल किया गया है. इस तरह की व्यवस्था से अफगानिस्तान में शांति बहाल करने के रोडमैप में क्षेत्रीय रूप से व्यापक समर्थन जुटाने में मदद मिलेगी. जैसे-जैसे अफगान शांति वार्ता आगे बढ़ रही है, हम इसी मैकेनिजम पर काम जारी रखने की योजना बना रहे हैं.

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रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लॉवरोव से पूछा गया कि चीन की अपनी हालिया यात्रा के दौरान, क्या आपको भारत-चीन संबंधों के बारे में चीनी नेतृत्व के साथ अपनी बातचीत में कोई नई जानकारी मिल पाई? फिलहाल रूस, भारत और चीन के साथ अपने संबंधों को कैसे देखता है, विशेष रूप से लद्दाख में सीमा गतिरोध से संबंधित तनाव को कम करने में मास्को के प्रयासों के मद्देनजर? इस सवाल के जवाब में लॉवरोव ने कहा, दोनों देशों को स्वतंत्र रूप से इसका समाधान करना चाहिए. इसमें किसी बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है. (फाइल फोटो) (फोटो-AP)

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रूसी विदेश मंत्री ने भारत-चीन के तनाव को लेकर सवाल किए जाने पर कहा कि हम हर स्थिति पर नजर रखे हुए हैं. हम लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हालात सामान्य होने की प्रक्रिया पर नजर रख रहे हैं. हम 25 फरवरी, 2021 को भारत और चीन के विदेश मंत्रियों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद हुए समझौतों का स्वागत करते हैं. (फोटो-PTI)

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रूस के विदेश मंत्री ने भारत-चीन के रिश्ते पर कहा कि हम दोनों पक्षों की सकारात्मक नजरिये की सराहना करते हैं. हम एक फ्रेमवर्क के तहत मल्टीलेट्रल संवाद को लेकर नई दिल्ली और बीजिंग के स्वतंत्र रूप से बातचीत करने के हिमायती हैं. इसमें किसी बाहरी का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. मेरा मानना है कि दोनों देश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के जिम्मेदार सदस्य हैं. ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश मौजूदा मतभेदों को दरकिनार कर राजनीतिक और कूटनीतिक समाधान कर लेंगे. (फाइल फोटो-AFP)

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लद्दाख में भारत-चीन के तनाव के दौरान रूस से भारत को वो समर्थन नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी. भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी चीन से तनाव के बीच रूस के दौरे पर गए लेकिन इससे कोई खास मदद नहीं मिली.पिछले साल नवंबर में रूस ने इशारों ही इशारों में कहा था कि अमेरिका अपने भू-राजनीतिक मकसद के लिए लद्दाख तनाव का गलत इस्‍तेमाल कर सकता है. रूसी विदेश मंत्री ने यहां तक कहा था कि भारत पश्चिमी देशों के चीन विरोध मानसिकता का मोहरा बन रहा है. ये बयान भारत के लिए किसी झटके से कम नहीं था. दूसरी तरफ, अमेरिका ने चीन की चुनौती का जिक्र करते हुए भारत का खुलकर साथ दिया.  (फाइल फोटो-Getty Images)

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बहरहाल, कोरोना संकट के बाद भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय एजेंडा क्या होगा? इस सवाल पर लॉवरोव ने कहा कि भारत इस साल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका (BRICS) की अध्यक्षता करने वाला है. हम अपने भारतीय मित्रों की हर सफलता की कामना करते हैं और इस संबंध में हर मुमकिन मदद करने को तैयार हैं. भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की गतिविधियों में अपने गैर-स्थायी सदस्य के रूप में भी शामिल हुआ है. हम सभी मंचों पर भारत से घनिष्ठ संपर्क जारी रखना चाहते हैं.  (फोटो-PTI)

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हिंदुस्तान टाइम्स के साथ एक इंटरव्यू में लॉवरोव ने कहा, हमें उम्मीद है कि कोरोना महामारी की स्थिति में हम 2021 में द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन आयोजित कर पाएंगे. व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग पर अंतर-सरकारी आयोग के अगले सत्रों की तारीखों का फैसला अभी किया जाना बाकी है. (फोटो-PTI)

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लॉवरोव ने कहा कि महामारी के नकारात्मक प्रभावों से हमें बाहर निकलना होगा. वैश्विक और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए महामारी के नकारात्मक परिणामों को दूर करने की आवश्यकता को देखते हुए हमारी निश्चित प्राथमिकताओं में व्यापार, ऊर्जा, कृषि, परिवहन, वित्त और बैंकिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में रूसी-भारतीय व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाना शामिल है.(फोटो-PTI)

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रूस के विदेश मंत्री ने कहा कि मुझे विश्वास है कि नई दिल्ली की यात्रा के दौरान डॉ. सुब्रमण्यम जयशंकर के साथ हुई वार्ता हमें और विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी को और मजबूत करने को बढ़ावा देगी. (फोटो-PTI)
 

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अफगानिस्तान में शांति वार्ता चल रही है. इस शांति वार्ता में रूस और अमेरिका दोनों की भूमिका है. अमेरिका भारत को पूरी प्रक्रिया में शामिल कर रहा है लेकिन रूस इससे बचता दिख रहा है. रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव सोमवार को भारत के दौरे पर आए हैं और उन्हें भी भारतीय पत्रकारों के इसी सवाल का सामना करना पड़ा. आखिर रूस अफगानिस्तान मामले में भारत की उपेक्षा क्यों कर रहा है जबकि भारत ने अफगानिस्तान को पटरी पर लाने के लिए कई बड़े काम किए हैं.  (मॉस्को में अफगानिस्तान और तालिबान के नेता, फोटो-AP)

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एस-400 डील पर भी लॉवरोन ने रूस का पक्ष रखा. नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा है कि अगर अमेरिका इस डील को लेकर प्रतिबंध या दबाव बनाता है तो उसे भी उचित प्रतिक्रिया मिल सकती है. रूस ने एस-400 डील को लेकर अमेरिकी दबाव पर भारत से बातचीत नहीं की है लेकिन अगर वाशिंगटन की तरफ से किसी भी देश पर दबाव बनाया जाएगा तो उसे भी उचित प्रतिक्रिया मिलेगी. (फाइल फोटो)

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चीन-रूस का रिश्ता और भारत

भारत में रूस के उप मिशन प्रमुख रोमन बाबुश्किन ने नवंबर 2020 में कहा था कि साफ है कि वैश्विक उथल-पुथल और अनिश्चितता के बीच भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ता है तो इसका असर हमारे साझा घर यूरेशिया क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा. इस गतिरोध का जिसे हम देख रहे हैं, उसका दुरुपयोग अन्य ताकतों की ओर से अपने भू-राजनीतिक मकसद को साधने के लिए किया जा सकता है. हालांकि चीन का रूस से वैचारिक मतभेद रहा है. चीन रूस को भारत के ज्यादा करीब समझता है. चीन और भारत के बीच टकराव होता है तो रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर भी असर होता, यह बात रूस समझता है. रूस की दिमाग में ये बात है कि जिस दिन भारत कमजोर पड़ा, उस दिन से चीन से सबसे ज्यादा परेशानी उन्हीं को होगी. (फाइल फोटो)