राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारत आज विश्व में सद्भावना और सामाजिक समरसता का एक वैश्विक केंद्र बनकर उभरा है. उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की सभ्यतागत सोच लेन-देन आधारित संबंधों पर नहीं, बल्कि एकत्व और आपसी अपनत्व की भावना पर आधारित है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गोरक्ष प्रांत द्वारा रविवार को आयोजित ‘सामाजिक सद्भाव’ बैठक को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि समाज की पहचान स्वार्थ से नहीं, बल्कि परस्पर जुड़ाव से होती है.
यह कार्यक्रम संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर बाबा गंभीरनाथ ऑडिटोरियम, तारामंडल में आयोजित किया गया. मोहन भागवत ने कहा कि कई देशों में रिश्तों को लेन-देन की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि भारत में मानवीय संबंध अपनत्व और सहभागिता पर आधारित होते हैं. उन्होंने दोहराया कि भारत की विविधता-भाषा, पहनावा और परंपराओं में भिन्नता-विभाजन का कारण नहीं बनती, क्योंकि संस्कृति की एकता सभी को जोड़ती है.
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उन्होंने कहा, 'हम भारत को माता मानते हैं. सभी में एक ही दिव्य चेतना का वास है. यही भावना अलग-अलग पहचान के बावजूद हमें एक रखती है.' आरएसएस प्रमुख भागवत ने यह भी कहा कि समाज को बनाए रखने में केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता की अहम भूमिका होती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने इसे उत्सव से अधिक आत्ममंथन का अवसर बताया. उन्होंने सामाजिक एकता को मजबूत करने के लिए साल में दो से तीन बार ब्लॉक स्तर पर बैठकें करने का आह्वान किया.
मोहन भागवत ने जातिगत सीमाओं से ऊपर उठकर व्यापक हिंदू समाज के लिए कार्य करने की अपील की. उन्होंने कहा कि समाज को स्वयं आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभानी होगी, संघ सहयोग करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने हमेशा संकट के समय अन्य देशों की निस्वार्थ मदद की है. कार्यक्रम में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा किए और अंत में सामूहिक भोजन का आयोजन भी हुआ.