उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में इलाज की आस लेकर पहुंचे एक युवक की जिंदगी अस्पताल की कथित लापरवाही की भेंट चढ़ गई. सड़क हादसे में मामूली घायल नीरज मिश्रा गलत सर्जरी और लापरवाह इलाज के चलते न सिर्फ अपना पैर गंवा बैठे, बल्कि चलने-फिरने की क्षमता भी खो दी. आज वह दर्द, कर्ज और इंसाफ की लड़ाई के बीच जीने को मजबूर हैं. तीन साल पहले इलाज के दौरान हुई कथित मेडिकल नेग्लिजेंस के कारण 35 वर्षीय नीरज मिश्रा का एक पैर सड़ गया . हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें 9 से 10 बार ऑपरेशन कराना पड़ा और अंततः वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए .
3 साल पहले बैटरी रिक्शा पलटने से हुए थे घायल
यह मामला लखनऊ के खरगापुर, कौशलपुरी निवासी नीरज मिश्रा का है . नीरज तीन साल पहले बैटरी रिक्शा पलटने की दुर्घटना में घायल हो गए थे. इलाज के लिए वह एक हॉस्पिटल पहुंचे, लेकिन यहां हुई कथित गलत सर्जरी ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी . ऑपरेशन के बाद उनके पैर में सड़न शुरू हो गई, जो समय के साथ बढ़ती चली गई .
नीरज मिश्रा के मुताबिक, उनका एक्सीडेंट साल 2022 में हुआ था . दुर्घटना के बाद उन्हें इलाज के लिए हॉस्पिटल ले जाया गया. नीरज का आरोप है कि अस्पताल में सुविधा न होने के बावजूद उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी गई . उल्टा यह कहा गया कि ऑपरेशन के बाद वह पूरी तरह ठीक हो जाएंगे . इसके बाद उनसे पैसे जमा करवा लिए गए . नीरज का दावा है कि उन्हें दूसरे अस्पताल में दिखाया गया लेकिन पैसा उसी हॉस्पिटल में ही जमा कराया गया .
टांके ठीक से नहीं लगे और...
नीरज ने आगे बताया कि रातों-रात उन्हें दूसरे अस्पताल से वापस उसी हॉस्पिटल ट्रांसफर कर दिया गया और दोबारा पैसे जमा करवाए गए. जल्दबाजी में टांके ठीक से नहीं लग पाए और सुबह टांके लगे पैर पर ड्रेसिंग बदल दी गई . करीब 14 दिन बाद उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया .
चलने लायक भी नहीं बचा युवक, 10 ऑपरेशन हुए
डिस्चार्ज के बाद नीरज की हालत लगातार बिगड़ती चली गई . उनका कहना है कि वह चलने लायक भी नहीं बचे थे . इसके बाद उन्होंने दूसरे अस्पताल और सिविल अस्पताल में इलाज के लिए संपर्क किया, लेकिन वहां से भी उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला . आखिरकार थक-हारकर नीरज एक प्राइवेट हॉस्पिटल पहुंचे, जहां उनका 10 बार ऑपरेशन किया गया .
21 लाख का कर्ज और सब्जी की दुकान
नीरज मिश्रा बताते हैं कि लगातार इलाज और ऑपरेशनों के चलते उनके ऊपर करीब 21 लाख रुपये का कर्ज हो गया. वह सब्जी की दुकान लगाकर परिवार चलाते हैं . सरकार की ओर से उन्हें 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई, जबकि मोहल्ले के लोगों ने भी मदद की . बावजूद इसके अब भी करीब 10 लाख रुपये का कर्ज बाकी है, जिसे वसूलने के लिए लोग रोज उनके घर पहुंच रहे हैं .
नीरज का कहना है कि उन्होंने हॉस्पिटल के खिलाफ न्याय की गुहार लगाते हुए उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को 13 बार आवेदन दिया . इसके अलावा सीएमओ, एजी मंडल, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक को शिकायत भेजी गई . उनका आरोप है कि लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई और अस्पताल को सिर्फ कागजों में बंद दिखाया गया.
अस्पताल संचालक ने खारिज किए आरोप
नीरज मिश्रा का यह भी दावा है कि जब उन्होंने कानूनी कार्रवाई शुरू की तो हॉस्पिटल की ओर से कई बार समझौते के लिए पैसों की पेशकश की गई और उन्हें धमकाया भी गया . वहीं इस पूरे मामले पर अस्पताल संचालक ने आरोपों को सिरे से खारिज किया है . हॉस्पिटल के संस्थापक के मुताबिक, नीरज के परिवार के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे और वे बार-बार ऑपरेशन की गुहार लगा रहे थे . उनका कहना है कि उन्होंने साफ तौर पर बताया था कि उनके अस्पताल में ऑपरेशन की सुविधा नहीं है . नीरज को ऑर्थोपेडिक सर्जन ने देखा था .
जब नीरज के आरोपों पर अस्पताल से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि पहले नीरज से पूछा जाए कि ऑपरेशन कब कराया गया और पैसा कब अस्पताल में जमा किया गया . अस्पताल संचालक का यह भी कहना है कि नीरज की शिकायत के आधार पर जिस यूनिट में इलाज चल रहा था, उस हॉस्पिटल को बंद किया गया था . संचालक ने बताया कि उनका दूसरा अस्पताल ‘जच्चा-बच्चा अस्पताल’ भी नीरज की शिकायत पर बंद किया गया था, लेकिन सीएमओ लखनऊ की जांच में उसे निर्दोष पाए जाने के बाद फिर से खोल दिया गया . दोनों ही अस्पताल उनके द्वारा संचालित किए जाते हैं .