बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) लखनऊ में एक बार फिर कुलपति चयन प्रक्रिया को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर गोविंद पांडे ने फेसबुक पर एक तीखा पोस्ट लिखकर पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
प्रो. पांडे के सहयोगी उनके इस कदम को 'व्हिसलब्लोअर' की कार्रवाई मान रहे हैं. उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी के करण अक्सर अयोग्य लोग कुछ चुनिंदा लोगों की मर्जी पर प्रतिष्ठित पदों पर पहुंच जाते हैं, जबकि योग्य उम्मीदवारों को मौका ही नहीं मिलता.
प्रोफेसर गोविंद पांडे ने अपने पोस्ट में विश्वविद्यालय प्रशासन के दोहरे मानदंडों पर करारा हमला बोला. उन्होंने लिखा, 'जो कुलपति एक चपरासी की नियुक्ति के लिए भी परीक्षा और इंटरव्यू आयोजित करने पर अड़े रहते हैं, वो खुद का चयन महज एक तीन सदस्यीय समिति के विवेक पर छोड़ देते हैं.'
'पर्दे के पीछे से नियुक्ति'
उन्होंने ने आगे बताया कि सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए API (Academic Performance Indicator) स्कोर को वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाता है तो दूसरी ओर कुलपति पर्दे के पीछे से चुपचाप नियुक्तियां कर देते हैं.'
चयन प्रक्रिया की विसंगतियों पर सवाल उठाते हुए प्रो. पांडे ने पूछा कि क्या भारत में केवल कुछ चुनिंदा प्रोफेसरों के पास ही विशेष योग्यता है, जिससे वह बार-बार कुलपति बन जाते हैं या फिर बाकी प्रोफेसरों का API स्कोर इतना खराब है कि वो अंतिम तीन उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्ट में भी जगह नहीं बना पाते?
उन्होंने भगवान गणेश का उदाहरण देते हुए एक सटीक सादृश्य पेश किया कि गणेश ने शिव और पार्वती की परिक्रमा करके एक गहरा संदेश दिया था, लेकिन इस कलयुग में शिक्षकों ने इस कृत्य का गलत अर्थ 'चाटुकारिता' के रूप में निकाल लिया है और इसे अपना लिया है. सत्ता में बैठे लोग केवल बूटचाटों (bootlickers) को पसंद करते हैं, भले ही उनकी वास्तविक उपलब्धि शून्य हो.'
भर्ती प्रक्रिया में हो सुधार
कुलपति की नियुक्ति को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए प्रो. पांडे ने कुछ बदलावों की वकालत की है. उन्होंने सुझाव दिया कि वीसी पद के उम्मीदवारों को लाइव लेक्चर देना चाहिए और छात्रों व शिक्षकों को वोटिंग के जरिए ये तय करने का अधिकार मिलना चाहिए कि किसे नियुक्त किया जाए.
उन्होंने कहा कि VC पद के आवेदकों को अपना विजन पेश करना चाहिए कि वो यूनिवर्सिटी के लिए क्या करना चाहते हैं और ये पूरी प्रक्रिया एक खुली चुनाव प्रणाली की तरह आयोजित की जानी चाहिए.
प्रोफेसर पांडे ने आगाह करते हुए कहा कि कुछ चुनिंदा लोगों को शिक्षा पर मालिकाना हक जताने की अनुमति देना अंततः इसे पूरी तरह बर्बाद कर देगा. उन्होंने बेहद चिंता जताते हुए कहा कि जो लोग बमुश्किल एक सुसंगत वाक्य तक नहीं बोल सकते, उन्हें बार-बार कुलपति के रूप में नियुक्त किया जा रहा है. उनके सहयोगियों का मानना है कि इस खुली आलोचना से विश्वविद्यालय प्रशासन और चयन समितियों की कार्यप्रणाली में सुधार को लेकर एक नई बहस शुरू होगी.