उत्तर प्रदेश के बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने हाल ही में उठे UGC और अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के चलते अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. जानकारी के अनुसार, उन्होंने यह इस्तीफा जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को सौंपा है. किसी अधिकारी के इस्तीफा देने के बाद क्या होता है, उसे कैसे और कौन स्वीकार करता है, आइए समझते हैं.
आगे क्या है प्रक्रिया?
ब्यूरोक्रेसी में प्रशासनिक मामलों के एडमिनिस्ट्रेटिव हेड गवर्नर होते हैं, लेकिन अधिकारी के अपने पद से इस्तीफा देने की प्रक्रिया अलग होती है. जब कोई अधिकारी इस्तीफा देता है, जैसे सिटी मजिस्ट्रेट, तो वह आमतौर पर इसे जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को सौंपते हैं. कभी-कभी इस्तीफा सीधे शासन या नियुक्ति विभाग को भी भेजा जाता है.
कब और कितने दिन में स्वीकार होगा इस्तीफा?
डीएम से इस्तीफा शासन में नियुक्ति विभाग को भेजा जाता है. इसके बाद विभाग तय करेगा कि इस्तीफा स्वीकार किया जाए या नहीं. इस प्रक्रिया की कोई तय समय सीमा नहीं है. यह पूरी तरह से शासन के विवेक पर निर्भर करता है. निर्णय दो दिन, दस दिन, एक महीने या दो महीने में लिया जा सकता है.
क्या है पूरा मामला?
अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे का पहला कारण है विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियम, जिन्हें वे सामान्य श्रेणी के छात्रों के अधिकारों के खिलाफ मानते हैं. दूसरा कारण प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवादित घटनाक्रम हैं, जिसमें कथित रूप से उनके शिष्यों के साथ बदसलूकी और उनकी चोटी खींचे जाने की बातें सामने आईं.
क्या बोले अलंकार अग्निहोत्री?
अग्निहोत्री का कहना है कि ये घटनाएं सिर्फ प्रशासनिक या शैक्षणिक फैसले नहीं हैं, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की गरिमा और अधिकारों से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने इस्तीफा देते हुए बताया कि यह कदम उन्होंने ब्राह्मण समाज के सम्मान और हित की रक्षा के लिए उठाया है. इसके साथ ही उन्होंने सभी ब्राह्मण सांसदों और विधायकों से आग्रह किया कि वे भी अपने पदों से इस्तीफा दें और जनता के पक्ष में खड़े हों.
अलंकार अग्निहोत्री के क्या हैं आरोप?
सिटी मजिस्ट्रेट ने आरोप लगाया कि समाज के प्रतिनिधि इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं और मौन रहकर उच्च वर्ग के छात्रों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि ब्राह्मण नेताओं का यह रवैया ऐसा है जैसे वे किसी कॉर्पोरेट कंपनी के आदेश का इंतजार कर रहे हों. अग्निहोत्री ने चेताया कि यदि नेता जनता और समाज के साथ खड़े नहीं होंगे, तो भविष्य में उनकी चुनावी संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं.
उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि यह समय सामान्य वर्ग के छात्रों और समाज के लिए निर्णायक है. अब नेताओं को सत्ता के पक्ष में नहीं बल्कि जनता और समाज के साथ खड़ा होना चाहिए. उन्होंने सोशल मीडिया और पूरे देश में चल रहे प्रदर्शन को समाज में व्याप्त असंतोष और मानसिक तनाव का प्रमाण बताया.