बाघों के संरक्षण की दिशा में कदम उठाते हुए उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि देश भर में बाघ अभयारण्यों के भीतरी इलाकों में कोई पर्यटन संबंधी गतिविधि नहीं होगी.
न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार और न्यायमूर्ति इब्राहिम कलीफुल्ला की पीठ ने राज्यों को अपने अपने बाघ अभयारण्यों में बफर जोन अधिसूचित न करने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करने और जुर्माना लगाने की भी चेतावनी दी है.
पीठ ने अपने आदेश में कहा है, ‘हम यह साफ करते हैं कि इस अदालत से जब तक अंतिम आदेश जारी नहीं कर दिया जाता, तब तक बाघ अभयारण्य के भीतरी इलाकों का पर्यटन के लिए उपयोग नहीं किया जाएगा.’
उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि उसके द्वारा पूर्व में चार अप्रैल और दस जुलाई को आदेश दिए जाने के बाद भी कई राज्यों ने अपने अपने अभयारण्यों में बफर जोन अधिसूचित नहीं किए हैं.
न्यायालय ने कहा कि अगर राज्यों ने तीन सप्ताह के अंदर उसके आदेश का पालन नहीं किया तो प्रत्येक पर 50,000 रूपये का जुर्माना किया जाएगा. यह राशि संबद्ध राज्य के मुख्य वन सचिव से वसूली जा सकेगी. अपने आदेशों का पालन न करने के लिए न्यायालय ने आंध्रप्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र और झारखंड राज्यों पर दस-दस हजार रूपये का जुर्माना भी किया है.
बहरहाल, अरूणाचल प्रदेश और झारखंड के वकीलों ने तर्क दिया कि वह बफर जोन अधिसूचित करने के लिए तैयार हैं और इस संबंध में हलफनामे दाखिल करेंगे. पीठ बाघों के संरक्षण के लिए प्रयासरत अजय दुबे की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी.
याचिका में मांग की गई थी कि बाघ अभयारण्यों में अंदरूनी या बाघों की महत्वपूर्ण रिहायशों में वाणिज्यिक पर्यटन गतिविधियां बंद की जाएं.
दस जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने राज्यों को और दो सप्ताह का समय अंतिम विकल्प के तौर पर दिया ताकि वह अपने यहां बाघ अभयारण्यों में बफर जोन अधिसूचित कर लें.
ऐसा करने से बाघों की रिहायश के आसपास की राजस्व भूमि पर वाणिज्यिक गतिविधियां नियमित हो जाएंगी और अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे इन प्राणियों को बचाने में मदद मिलेगी.