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दस रुपये लेकर चैंपियन बनने निकली थी दीपिका

लंदन ओलंपिक में पदक की प्रबल दावेदार मानी जा रही तीरंदाज दीपिका कुमारी ने चैंपियन बनने की राह पर आगे बढ़ने की शुरुआत अपने रिक्शाचालक पिता से दस रुपये लेकर की थी.

दीपिका कुमारी दीपिका कुमारी

लंदन ओलंपिक में पदक की प्रबल दावेदार मानी जा रही तीरंदाज दीपिका कुमारी ने चैंपियन बनने की राह पर आगे बढ़ने की शुरुआत अपने रिक्शाचालक पिता से दस रुपये लेकर की थी.

दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने वाली दीपिका के पिता जमशेदपुर में रिक्शा चालक थे तथा उनके पास अपनी बिटिया का तीरंदाज बनने का सपना पूरा करने के लिये न तो पैसा था और ना ही समय.

वह आखिर में अपनी बिटिया की जिद के आगे झुक गये और आज दीपिका भारतीय तीरंदाजी की चमकती सितारा है.

ओलंपिक में भाग लेने वाले 24 खिलाड़ियों के संघर्ष की कहानियों पर ईएसपीएन स्टारस्पोर्ट्स ने वृत्तचित्र तैयार किया है.

‘लिविंग द ड्रीम’ नाम के इस वृत्तचित्र में दीपिका, महिला मुक्केबाज एम सी मैरीकाम, निशानेबाज रोंजन सिंह सोढी और मुक्केबाज विजेंदर सिंह जैसे खिलाड़ियों की कहानी भी शामिल है. यह सीरीज तीन जून से शुरू होगी.

इन खिलाड़ियों में दीपिका की कहानी दिल को छूने वाली है. दीपिका किसी जिला स्तरीय टूर्नामेंट में भाग लेना चाहती थी लेकिन उनके पिता ने साफ मना कर दिया. दीपिका ने हार नहीं मानी और पिता को उनकी बात माननी पड़ी.

दीपिका के पिता शिवनारायण के अनुसार, ‘मैंने कहा ठीक है. मैंने उसे दस रुपये दिये और वह लोहारडंगा में खेलों में भाग लेने चली गयी जहां उसने जीत दर्ज की.’

देश की नंबर एक महिला तीरंदाज का यह पहला टूर्नामेंट था जहां से उनके स्टार बनने की शुरुआत हुई. इसके बाद भी हालांकि उन्हें अपने पिता को मनाने के लिये काफी मिन्नतें करनी पड़ी थी. आज उनके पिता भी मानते हैं कि उनकी बेटी सही थी.

उन्होंने कहा, ‘उसके काफी मनाने के बाद मैं उसे वहां ले गया. वह क्वालीफाई नहीं कर पायी जिससे काफी निराश हुई. मैंने उससे कहा कि वह चिंता न करे मैं उसके लिये धनुष खरीद दूंगा हालांकि मुझे पता नहीं था कि उसकी कीमत दो लाख रुपये से अधिक होती है.’

आखिर में दीपिका के लिये धनुष भी खरीद लिया गया और वह तीरंदाजी स्कूल में दाखिल हो गयी. इसके बाद दीपिका ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में महिला रिकर्व के व्यक्तिगत वर्ग और टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीते थे. इस वृत्तचित्र में इसी तरह से अन्य खिलाड़ियों की कहानी भी बयां की गयी है.

एम सी मैरीकाम मणिपुर में कई विपरीत परिस्थितियों से जूझने के बावजूद पांच बार विश्व चैंपियन बनी और इसमें उनके पति ओनलर की भूमिका अहम रही.

मैरीकाम के लिये वह सबसे मुश्किल घड़ी थी जब वह 2011 में अमेरिका में किसी प्रतियोगिता में भाग ले रही थी और उन्हें पता चला कि उनके बेटे के दिल में छोटा का सुराख है और उसका तुरंत ऑपरेशन करवाना होगा लेकिन पति के कहने पर वह प्रतियोगिता में बनी रही.

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