सरकार के लोकपाल बिल पर टीम अन्ना ने बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी है. केजरीवाल ने मांग की कि सारे बिल को वापस लेकर इसे फिर से ड्राफ्ट किया जाए. उन्होंने कहा, 'सुना है कि चिदंबरम, सिब्बल और कई बड़े-बड़े वकीलों ने इस बिल को ड्राफ्ट किया है. अगर ऐसा है तो या तो इन्हें कानून नहीं आता है या फिर ये लोग इतने शातिर हैं कि इस कानून के जरिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना चाहते हैं.
टीम के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल ने सरकारी बिल को जनता के लिए खतरनाक बताया है. केजरीवाल ने कहा, 'बिल के अंदर केवल 10 प्रतिशत नेता, 5 प्रतिशत सरकारी कर्मचारी होंगे जबकि सभी स्कूल, अस्पताल, चर्च और मस्जिद इस बिल के दायरे में आ जाएंगे. एक भी राजनीतिक पार्टी इस बिल के दायरे में नहीं होगी. इसका मतलब है कि सरकार की नजर में नेता और कर्मचारी ईमानदार हैं जबकि देश की जनता भ्रष्ट है.'
सीबीआई को बिल के दायरे से बाहर रखने पर नाराजगी जताते हुए केजरीवाल ने कहा कि सीबीआई से प्रारंभिक जांच का अधिकार छीन कर उसे छिन्न-भिन्न किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि बिल के अनुसार सारे मामले घूमफिर कर जांच के लिए सीबीआई के पास जाएंगे और सीबीआई का कंट्रोल सरकार के पास होगा. ऐसे में सही जांच कैसे हो सकती है.
उन्होंने कहा कि लोकपाल सरकार की कठपुतली और पोस्टऑफिस जैसा होगा. केजरीवाल ने बताया कि इस बिल के अनुसार भ्रष्ट अफसरों को सरकार मुफ्त में वकील देगी. ऐसा पहले कभी भी किसी कानून के अंतर्गत नहीं हुआ. शिकायतकर्ता के खिलाफ भ्रष्ट अफसर तुरंत मुकदमा चला सकेगा जबकि भ्रष्ट अफसर के खिलाफ 2 साल तक जांच होगी उसके बाद ही केस चलेगा. इस तरह सरकार ने सुनिश्चित कर दिया है कि लोकपाल भ्रष्टाचार का अड्डा होगा.
उन्होंने कहा कि लोकपाल बनाना और हटाना सरकार के हाथ में होगा. ऐसे में स्वतंत्र जांच कैसे हो सकती है. बिल के अनुसार भ्रष्ट अफसर को निकालने का हक मंत्री को होगा. ऐसे में सवाल उठता है कि जो मंत्री भ्रष्ट अफसर के खिलाफ जांच का आदेश नहीं देते वो क्या ऐसे अफसरों को हटाएंगे?