पिछले दो महीने से चल रहे डोकलाम विवाद पर शुरुआती तेवरों के बाद चीन अब नरम पड़ गया है और वो अपनी सेना को पीछे हटाने के लिए राजी है. यह पहली बार नहीं है जब चीन को भारत के सामने झुकना पड़ा है. 30 साल पहले भी भारत- चीन के बीच इस तरह का विवाद हुआ था तब भी चीन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे. जानें- क्या हुआ था 30 साल पहले.
गौरतलब है कि भारत-चीन की सीमाएं हजारों किमी में फैली हुई हैं और सैकड़ों
बार दोनों देशों की फौजें जाने-अनजाने उनका उल्लंघन करती रहती हैं. लेकिन,
1962 के अलावा भी दोनों सेनाओं में मुठभेड़ की नौबत कई बार आई है.
ऐसे ही 1987 में अरुणाचल प्रदेश के सुमदोरोंग चू इलाके में मुठभेड़ की स्थिति बनी थी. ये आख़िरी मौका था, जब बड़ी तादाद में करीब 200 भारतीय सैनिकों को वहां तैनात किया गया था. चीन की तरफ़ से भी टुकड़ियां आई थीं और आमना-सामना हुआ था.
सुमदोरोंग चू विवाद की शुरुआत साल 1980 में हुई थी, जब इंदिरा गांधी
सत्ता में वापस आई थी. साल 1982-83 में इंदिरा गांधी ने तत्कालीन जनरल
के.वी कृष्णा राव का प्लान अप्रूव किया, जिसमें भारत-चीन बॉर्डर (एलएसी)
में ज्यादा से ज्यादा तैनाती की बात थी. दरअसल इंदिरा गांधी चीन से युद्ध
की स्थिति में अरुणाचल प्रदेश के तवांग को हर हाल में बचाना चाहती थीं.
1984 की गर्मियों में भारत ने सुमदोरोंग चू ने भारत ने स्पेशल सिक्योरिटी ब्योरो की देखरेख में प्रेक्षण चौकी (ऑब्जर्वेशन पोस्ट) स्थापित कर दी. गर्मियों में इस चौकी पर जवान तैनात रहते थे और सर्दियों में ये चौकी खाली रहती थी. अगले दो साल तक ऐसा ही चला लेकिन, जून 1986 में इंडिया की पेट्रोलिंग पार्टी ने देखा कि 40 चीनी सैनिक इस इलाके में स्थाई चौकियां बना रहे हैं. यही नहीं अगस्त तक चीन ने अपना हैलिपैड भी बना दिया था.
जल्द ही भारत ने अपने 200 सैनिक इस इलाके में तैनात कर दिया. सितंबर तक भारत ने चीन के सामने प्रस्ताव रखा कि वह सर्दियों तक अपनी फौज इस इलाके से हटा दे तो भारत इस जगह पर कब्जा नहीं करेगा. हालांकि चीन ने इस प्रस्ताव को मानने से मना कर दिया था.
ऐसे में भारतीय सेना ने ऑपरेशन फाल्कन तैयार किया, जिसका मकसद था सेना को उसकी शांतिकालीन पोजीशन से बहुत तेजी से सरहद पर पहुंचाना.तवांग से आगे कोई सड़क नहीं थी, इसलिए जनरल सुंदरजी ने जेमीथांग नाम की जगह पर एक ब्रिगेड को एयरलैंड कराने के लिए इंडियन एयरफोर्स को रूस से मिले हैवी लिफ्ट MI-26 हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल करने का फैसला किया.यह जगह भारत चीन सीमा के दक्षिण में है, लेकिन तवांग से सड़क मार्ग से 90 किलोमीटर दूर है.
भारतीय सेना ने हाथुंगला पहाड़ी पर पोजीशन संभाल ली, जहां से सुमदोरांग चू के साथ ही तीन अन्य पहाड़ी इलाकों पर नजर रखी जा सकती थी. इसके साथ ही मिलिट्री ने लद्दाख के डेमचॉक और उत्तरी सिक्किम में T-72 टैंक उतारे. बाद में 15 नवंबर को हुई फ्लैग मीटिंग में हालात थोड़ा शांत हुए, लेकिन भारत ने इस मौके का इस्तेमाल अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य में बदलने के लिए किया, जो उस समय तक केंद्र शासित प्रदेश था.
साल 1987 के शुरुआती महीनों में, दोनों देशों की सेना सीमा के दोनों तरफ आमने-सामने थीं. हाथुंगला एरिया में तो दोनों के सैनिक वाकई आंख से आंख मिलाते हुए आमने-सामने थे. सुंदरजी ने अब हिमालय क्षेत्र में भारत की साख मजबूत करने के लिए शतरंज की बिसात (चेकबोर्ड एक्सरसाइज) बिछा दी.उन्होंने सरकारी अफसरों को 1970 से अधर में लटकी परियोजनाओं में से एक सड़क बिछाने की योजना को तेजी से पूरा करने के लिए दबाव बनाया.
यह संकट मई 1987 तक बना रहा, जब तत्कालीन विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी
प्योंगयोंग जाते हुए बीजिंग में रुके. चीनी विदेश मंत्री से उनकी वार्ता के
बाद अग्रिम मोर्चों पर गर्मागर्मी शांत होना शुरू हुई. भारत के इस मुद्दे
पर कड़ाई से निपटने की इस घटना ने राजीव गांधी की दिसंबर 1988 में बीजिंग
यात्रा के दरवाजे खोले . यही नहीं चीनी सुंदरजी से इतने प्रभावित थे कि
उन्होंने उनको चीन का दौरा करने का न्योता दिया.