आपातकाल के दौरान संजय की गतिविधियों की वजह से भले ही इंदिरा गांधी सरकार की बहुत आलोचना हुई लेकिन संजय गांधी की संगठन खड़ा करने की क्षमता और उनकी रणनीति ने ही तीन सालों बाद इंदिरा को फिर से जीत दिलाई. 1980 में कांग्रेस के विजयी 353 प्रत्याशियों में से 150 संजय की पसंद थे.
संजय ने 1980 में ना केवल अमेठी बड़े अंतराल से जीती बल्कि उनके ज्यादातर
वफादार यूथ कांग्रेसी भी चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. संजय की तेज-तर्रार युवा
बिग्रेड चाहती थी कि संसद संजय की शर्तों पर ही चले. इंदिरा इस नई पीढ़ी
को हैरानी भरी नजरों से देख रही थीं. संजय का अंदाज जल्द ही पूरी सरकार में
नजर आने लगा था. स्वतंत्र सोच वाले अफसरों को हटाया जाने लगा, वैकल्पिक पोस्टिंग के लिए महीनों तक इंतजार करवाया
गया और जिन राजनेताओं पर वफादार नहीं होने का शक होता, उन्हें किनारे कर
दिया जाता.
संजय के विपरीत राजीव गांधी के राजनीतिक जीवन का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं था. कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी के पद पर उनके नाम कई असफलताएं दर्ज हुईं. आंध्र प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों का चयन किया था और इंदिरा गांधी दोनों ही राज्यों में बुरी तरह हार गईं. राजीव को भारतीय राजनीति के सांचे के अनुरूप नहीं माना जाता था.