scorecardresearch
 
ट्रेंडिंग

पहली बार इंसानों को होने वाली ऐतिहासिक बीमारी के शिकार हो रहे चिम्पैंजी, वैज्ञानिक परेशान

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 1/9

अब तक आपने सुना होगा कि जीव-जंतुओं से संपर्क में आने से इंसान बीमार हो रहा है. जीव विज्ञान के इतिहास में पहली बार ऐसा मामला सामने आया है जिसे देखकर वैज्ञानिक हैरान और परेशान हैं. पहली बार इंसानों में पाई जाने वाली एक ऐतिहासिक बीमारी से चिम्पैंजी शिकार हो रहे हैं. इस बीमारी का उल्लेख दुनिया की कई सभ्यताओं की धार्मिक और सांस्कृतिक किताबों में है. आइए जानते हैं कि आखिर ये कौन सी बीमारी है और कहां फैल रही है. (फोटोः ताई चिम्पैंजी प्रोजेक्ट)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 2/9

अफ्रीका के आइवरी कोस्ट पर स्थित गिनी-बिसाउ कैंटेनहेज नेशनल पार्क में ये बीमारी फैली है. यहां मौजूद चिम्पैंजी यानी की बनमानुष इंसानों में पाई जाने वाली इस ऐतिहासिक बीमारी से परेशान हो रहे हैं. क्योंकि इतिहास में अभी तक चिम्पैंजी में ये बीमारी नहीं होती थी. पर अब हो रही है. इस बीमारी का नाम है लेप्रोसी (Leprosy) यानी कुष्ठ या कोढ़. (फोटोः कैंटेनहेज चिम्पैंजी प्रोजेक्ट)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 3/9

चिम्पैंजियों पर कई दशकों से अध्ययन कर रहे रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट बर्लिन के जीव विज्ञानी फेबियन लींडर्ट्ज ने बताया कि उन्होंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा. आजतक के इतिहास में कभी ऐसा नहीं देखा गया कि जंगली चिम्पैंजियों में लेप्रोसी या कुष्ठ की बीमारी हो. यह बेहद चिंताजनक और हैरान करने वाला है. क्योंकि लेप्रोसी यानी कुष्ठ रोग आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिकों और डॉक्टरों के लिए रहस्य ही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 4/9

लेप्रोसी के बारे में दुनिया के किसी भी वैज्ञानिक को ज्यादा नहीं पता. यह बीमारी कहां से शुरू हुई. ये कैसे फैलती है. लेकिन इस बीमारी का जो शिकार होता है वह भयानक मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजरता है. 1980 से पहले ये बीमारी होना सामाजिक बहिष्कार तक करवा देती थी. लेकिन इसके बाद बनी एंटीबॉयोटिक्स के मिश्रण ने इस बीमारी को ठीक करना शुरू कर दिया. मरीजों की संख्या में कमी आने लगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 5/9

कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी की माइक्रोबायोलॉजिस्ट शार्लोट अवांजी ने कहा कि लेप्रोसी पर अध्ययन करना बेहद कठिन है. इसिलए इसपर कोई स्टडी नहीं करना चाहता. लेप्रोसी जिस बैक्टीरिया की वजह से होती है उसका नाम है माइकोबैक्टीरियम लेप्रे (Mycobacterium Leprae). हाल ही में इसका नया संस्करण सामने आया है. जिसे वैज्ञानिकों ने माइकोबैक्टीरियम लेप्रोमैटोसिस (M. Lepromatosis) नाम दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 6/9

शार्लोट ने बताया कि ये दोनों बैक्टीरिया प्रयोगशालाओं में विकसित नहीं किए जा सकते. ये पूरी तरह से प्राकृतिक हैं. इसलिए ये समझ नहीं आ रहा है कि आखिरकार ये जंगलों में रहने वाले चिम्पैंजियों में कैसे पहुंचे. इस बैक्टीरिया को फैलाने का एक ही माध्यम है कि इसे चूहों के पैरों में इंजेक्ट कर दिया जाए. ताकि वह जहां भी जाए ये बैक्टीरिया संक्रमण फैलाता रहे. इसके अलावा ये बैक्टीरिया लाल रंग की गिलहरियों के जरिए भी फैलता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 7/9

इन गिलहरियों में वो बैक्टीरियल जीनोटाइप 3I होता है जो इंसानों में भी पाया जाता है. इसीलिए मध्य यूरोप में यह बीमारी एक समय तेजी से फैली थी. लेकिन जंगलों में मौजूद चिम्पैंजियों में यह बीमारी होना अपने आप में हैरानी वाली बात है. जिस चिम्पैंजी को यह बीमारी हुई है, वह नर है. उसका नाम वुडस्टॉक है. वुडस्टॉक आइवरी कोस्ट के ताई नेशनल पार्क में रहता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 8/9

जब वुडस्टॉक के संक्रमण का अध्ययन किया गया तो पता चला कि इससे पहले एक और चिम्पैजी में माइकोबैक्टीरियम लेप्रोमैटोसिस (M. Lepromatosis) का संक्रमण था. उस चिम्पैंजी को साल 2009 में एक लेपर्ड ने मार डाला था. अब इन चिम्पैंजियों में एक दुर्लभ जीनोटाइप दिखाई दे रहा है जिसे 2F और 4N/O कहते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)

Leprosy in Chimpanzees scientist shocked
  • 9/9

फेबियन लींडर्ट्ज ने बताया कि ये नए और दुर्लभ जीनोटाइप इंसानों में नहीं पाए जाते. इसलिए ये कहना कि इंसानों के जरिए चिम्पैंजियों में यह बीमारी गई होगी. यह मुश्किल है. ऐसा लगता है कि लेप्रोसी का एक नया भंडार जंगलों में बनने लगा है. इंसानों को तो कई महीनों तक दवाओं और एंटीबायोटिक्स से ठीक किया जा सकता है, लेकिन चिम्पैंजियों के लिए ये काम बहुत मुश्किल है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-गेटी)