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संजय सिन्हा की कहानी-मुखौटा

आज की कहानी में संजय सिन्हा बता रहे हैं कि लोकतंत्र के पांच साल में सिर्फ आखिरी साल जनता का होता है. बाकी के चार साल पूंजीपतियों के होते हैं. लोकतंत्र सही मायने में पूंजीवाद का मुखौटा है. सरकार चार साल बजट बनाती है, लेकिन जनता से कुछ नहीं पूछती है. वो उद्योगपतियों से मिलती है. उनसे बात करके नीतियां निर्धारित करती है.

In today's story, Sanjay Sinha is telling that in the last five years of democracy, the people are the last one. Democracy is truly the mask of capitalism.Government meets industrialists and makes policies.

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