अगर आपको लग रहा है कि नया स्मार्टफोन या लैपटॉप पहले से महंगा हो गया है, तो यह सिर्फ कंपनियों की मार्केटिंग चाल नहीं है. इसके पीछे एक बड़ी वजह है और वो है .. AI और उसकी बढ़ती भूख.
वो भूख जो अब चुपचाप दुनिया की मेमोरी यानी RAM और स्टोरेज को निगल रही है. ना सिर्फ रैम, बल्कि पानी और बिजली की भी खपत इतनी हो रही है जिसका कोई हिसाब नहीं है. हालिया रिपोर्ट्स की मानें तो AI दुनिया भर के तमाम बोतलबंद पानी से ज्यादा यूज कर रहा है. इसके बारे में आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.
बीते कुछ महीनों में टेक इंडस्ट्री के अंदर एक बड़ा बदलाव दिखने लगा है. कंपनियां नए फोन लॉन्च कर रही हैं, लेकिन कीमतें ऊपर जा रही हैं. कहीं RAM कम मिल रही है, कहीं हाई वेरिएंट अचानक महंगा हो गया है. कई लोगों को लग रहा है कि ये बस महंगाई का असर है, लेकिन असली कहानी इससे कहीं गहरी है.
सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां भी अपने स्मार्टफोन्स की कीमत रिवाइज कर रही हैं और अब फोन महंगे हो गए हैं.
सप्लाई चेन की प्रोब्लम
दरअसल, AI के तेज़ विस्तार ने पूरी दुनिया की मेमोरी सप्लाई चेन को हिला कर रख दिया है. IDC की रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल रैम की डिमांड और बढ़ेंगी और मोबाइल कंपनियों को ये महंगा मिलेगा. इसका हवाला दे कर आपको महंगे स्मार्टफोन्स मिल सकते हैं.
आज जिस AI की चर्चा हर जगह है. चैटबॉट, इमेज जनरेशन, वीडियो टूल, डेटा एनालिसिस, उसे चलाने के लिए बेहद मजबूत सर्वर चाहिए. और इन सर्वर्स की सबसे अहम चीज़ होती है हाई-एंड मेमोरी, खासतौर पर RAM की एडवांस किस्में. यही मेमोरी अब टेक कंपनियों के लिए सोने जैसी कीमती हो चुकी है.
यही वजह है कि बड़ी मेमोरी बनाने वाली कंपनियां अब आम यूजर्स के लिए RAM बनाने के बजाय, अपनी फैक्ट्रियों की ज़्यादातर क्षमता AI डेटा सेंटर्स को देने लगी हैं. क्योंकि वहां पैसा ज़्यादा है, ऑर्डर लंबे समय के हैं और मुनाफा भी कहीं ज्यादा. इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है.
स्मार्टफोन और लैपटॉप बनाने वाली कंपनियों को अब पहले जितनी आसानी से मेमोरी नहीं मिल पा रही. जो मिल भी रही है, वो महंगी है. नतीजा यह है कि या तो कंपनियां कीमत बढ़ा रही हैं, या फिर कम RAM वाले मॉडल उतार रही हैं, या फिर पुराने स्टॉक को ज़्यादा समय तक खींच रही हैं.
यही वजह है कि हाल के महीनों में कई मिड-रेंज फोन महंगे दिखने लगे हैं, और कुछ लैपटॉप ब्रांड अब ऐसे मॉडल बेच रहे हैं जिनमें RAM बाद में अलग से लगानी पड़ती है. यूज़र को लगता है कि ये कंपनियों की चाल है, लेकिन असल में पीछे से सप्लाई ही दबाव में है.
सप्लाई चेन का हवाला दे कर अब कई लोकल वेंडर्स रैम और दूसरे मेमोरीज को स्टॉक करना शुरू कर चुके हैं, ताकि महंगे दाम पर बेच सकें.
क्रिप्टो बूम के समय भी ऐसा हुआ था..
अगर आपको याद हो तो जब क्रिप्टोकरेंसी का बूम आया था और भारत में भी क्रिप्टोकरेंसी की माइनिंग तेजी से हो रही थी, तब ऐसा ही ग्राफिक्स कार्ड का क्राइसिस आया था. दिल्ली के नेहरू प्लेस जैसे पॉपुलर इलेक्ट्रॉनिक मार्केट की एक दुकान पर भी ग्राफिक्स कार्ड एवेलेबल नहीं था. वजह ये थी कि लोगों ने Bitcoin माइनिंग रिग्स बना लिए थे और लगातार ग्राफिक्स कार्ड खरीद रहे थे. क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग के लिए हाई एंड ग्राफिक्स कार्ड वाले कंप्यूटर्स चाहिए होते हैं.
एक और दिलचस्प बात यह है कि यह संकट पहले वाले चिप शॉर्टेज जैसा नहीं है. तब फैक्ट्रियां बंद थीं, लॉजिस्टिक्स टूटा था. इस बार फैक्ट्रियां चल रही हैं, लेकिन प्रायॉरिटी बदल गई है. अब सवाल यह नहीं कि चिप बन रही है या नहीं, बल्कि यह है कि वो चिप किसके लिए बन रही है.
AI के लिए बनने वाली मेमोरी ज्यादा एडवांस होती है, ज्यादा मुनाफा देती है और लंबे कॉन्ट्रैक्ट पर बिकती है. इसलिए कंपनियां स्वाभाविक तौर पर उसी तरफ झुक रही हैं. इसका मतलब यह हुआ कि आम ग्राहक के लिए RAM और स्टोरेज धीरे-धीरे महंगी चीज बनती जा रही है.
कीमतें कम होने की उम्मीद नहीं..
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह असर सिर्फ 2026 तक सीमित नहीं रहेगा. आने वाले सालों में जैसे-जैसे AI मॉडल और बड़े होंगे, उनकी मेमोरी की जरूरत भी बढ़ेगी. इसका सीधा असर स्मार्टफोन, लैपटॉप, गेमिंग पीसी और यहां तक कि टैबलेट की कीमतों पर पड़ेगा. कुछ अनुमान बताते हैं कि आने वाले समय में एंट्री और मिड-सेगमेंट डिवाइसेज़ में कीमत बढ़ना लगभग तय है.
फर्जी AI फीचर्स मिलेंगे..
इस पूरे खेल में एक और परत है, जिसे आम तौर पर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. जब मेमोरी महंगी होती है, तो कंपनियां सॉफ्टवेयर के ज़रिये ज्यादा AI फीचर्स बेचने लगती हैं, ताकि बढ़ी हुई लागत को जस्टिफाई किया जा सके. यानी यूज़र को लगता है कि उसे ज्यादा स्मार्ट फोन मिल रहा है, लेकिन असल में वो ज्यादा महंगी मेमोरी और AI इन्फ्रास्ट्रक्चर की कीमत चुका रहा होता है.
एक तरह से देखा जाए तो AI अब सिर्फ फीचर नहीं रहा, बल्कि पूरी टेक इंडस्ट्री की सप्लाई चेन को दिशा देने लगा है. पहले तय होता था कि फोन कैसा होगा, फिर उसके हिसाब से चिप बनती थी. अब पहले AI की जरूरत तय होती है, और बाकी इंडस्ट्री उसी के आसपास एडजस्ट कर रही है.
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर मेमोरी सप्लाई और AI डिमांड के बीच संतुलन नहीं बना, तो आने वाले समय में सस्ता स्मार्टफोन एक मुश्किल सपना बन सकता है. खासकर उन बाजारों में जहां लोग कीमत को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं.
यानी अगली बार जब आप देखें कि फोन या लैपटॉप अचानक महंगा हो गया है, तो सिर्फ ब्रांड को दोष मत दीजिए. उसके पीछे एक इनविजिबल ताकत काम कर रही है और वो है AI की बढ़ती भूख, जो मेमोरी के हर टुकड़े पर दावा कर रही है.