हिंदुस्तान में देवता की तरह पूजे जाने वाले सचिन तेंदुलकर एक बार फिर चर्चा में है. अपने तरीके से. चर्चा में आने का ये उनका तरीका है. खामोशी से, सधे पांव सुर्खियां बटोर रहे हैं, जैसे 22 गज की पट्टी पर रन बटोरा करते थे. टेलीविजन हो या अखबार श्रीलंका के खिलाफ वनडे सीरीज खेल रही टीम इंडिया से ज्यादा चर्चा में संन्यास ले चुके सचिन तेंदुलकर हैं. आखिर हो भी क्यों ना, 'प्लेइंग इट माई वे' के जरिए ही तो कई अहम मौकों पर खामोश रहने वाले सचिन अपनी चुप्पी तोड़ रहे हैं.
सचिन की प्रति लोगों कि दीवानगी किसी से छुपी नहीं है. पूरा देश उन पर भरोसा करता था और शायद अब भी करता होगा. वो जीत की उम्मीद थे. विकेट के पीछे कैच आउट होने पर अंपायर के फैसले का इंतजार नहीं करते थे. बल्कि पवेलियन की ओर चल देते थे. इससे सचिन की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा झलकती थी. जाहिर है ऐसे में भारतीय किसी कंगारू से ज्यादा सचिन पर विश्वास पर करेंगे. लेकिन यही विश्वास कभी-कभी सवालों को भी जन्म देता है.
अपने पूरे क्रिकेट करियर के दौरान आलोचनाओं पर चुप्पी साधकर खेलने वाले सचिन तेंदुलकर ने अपनी जीवनी 'प्लेइंग इट माइ वे' में कई खुलासे किए हैं. अपनी कप्तानी में टीम की दुर्दशा से उपजी हताशा से निराश होकर संन्यास के बारे में सोचने से लेकर ग्रेग चैपल को रिंग मास्टर बताने तक. खबरों के मुताबिक सचिन ने अपनी जीवनी में लिखा है कि विश्वकप 2007 से पहले चैपल ने घर आकर टीम की कप्तानी संभालने के लिए मुझे राजी करने की कोशिश की.
सचिन ने खुद को बेहद करीने से हर विवाद से अलग रखा. ग्रेग चैपल के खिलाफ आरोपों का समर्थन सौरव गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण, जहीर खान और हरभजन सिंह ने भी किया है. हरभजन सिंह ने ग्रेग चैपल पर हमला बोलते हुए कहा कि कि ऑस्ट्रेलियाई कोच ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाता था. उनके कार्यकाल में भारतीय क्रिकेट आगे जाने के बजाय 6 साल पीछे चला गया. सवाल है कि ये सब जानते हुए सचिन आखिर चुप क्यों रहे. हरभजन सिंह सहित तमाम खिलाड़ियों को अगर महसूस होता है कि वो समय भारतीय क्रिकेट का सबसे बुरा वक्त था, तो उस वक्त क्रिकेट को बचाने के लिए उन्होंने मुंह क्यों नहीं खोला.
हालांकि चैपल ने सचिन के आरोपों को झूठा करार दिया है. अगर चैपल सही हैं तो क्या क्रिकेट का देवता झूठ बोल रहा है?. जैसे जैसे सचिन की किताब के बाजार में आने की घड़ी नजदीक आ रही है उनके संस्मरण और किस्सों की पुष्टि में कई सारे खिलाड़ी और बयान खुलकर सामने आ रहे हैं. क्या ये बयान सचिन की किताब को बेस्ट सेलर बनाने में मदद कर पाएंगे. क्या अपनी जीवनी को बेचकर सचिन एक नया रिकॉर्ड कायम कर पाएंगे. या फिर उस देश में जहां किताबों की आयु सबसे कम होती है, सचिन की कोशिश अपनी किताब को लंबे समय तक जिंदा रखने की है.
एक घाघ राजनीतिज्ञ की तरह चैपल की नीतियों को सहते हुए सचिन ने इस मसले को भविष्य में भुनाने के लिए पचा लिया. हालांकि यह पहली बार नहीं था जब सचिन ने चुप्पी ओढ़ ली हो. 2013 में आईपीएल में फिक्सिंग का मामला सरेआम था. चारों तरफ क्रिकेट में पारदर्शिता के लिए आवाजें उठ रही थी, लेकिन सचिन कुछ नहीं बोले. बीसीसीआई अध्यक्ष श्रीनिवासन और उनके दामाद आईपीएल के मुकाबलों पर सट्टेबाजी के दांव खेल रहे थे. मामला उजागर हुआ, लेकिन क्रिकेट का सबसे बड़ा ब्रैंड एंबेसडर चुप रहा. 6 नवंबर को सचिन तेंदुलकर की आधिकारिक बायोग्राफी लॉन्च हो रही है. यह दिन सचिन और उनके चाहने वालों के लिए एक अवसर है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किस्सों का रिस-रिस कर बाहर आना अवसर को भुनाने की रणनीति है?. बाजार ने सचिन के जरिए अपने तमाम उत्पाद बेचे हैं और अब सचिन किताब की शक्ल में अपनी जीवनी बेच रहे हैं.
भारतीय क्रिकेट ने सचिन को सब कुछ दिया, लेकिन खेल की बेहतरी से जुड़े मुद्दों पर चुप्पी साधे रहे. सचिन तब भी नहीं बोले जब भारत रत्न दिए जाने को लेकर विवाद हो रहा था. चुप रहे, जब तक उनके गले में मेडल नहीं झूलने लगा. सचिन कह सकते थे मेजर ध्यानचंद मुझसे पहले इस पुरस्कार के हकदार हैं उन्हें मिलना चाहिए. लेकिन चुप रहे.
कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के हाथों भारत रत्न का पुरस्कार पाने वाले सचिन तेंदुलकर तब भी कुछ नहीं बोले, जब सरकार बीसीसीआई को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की सोच रही थी. एक संस्था जो भारत का प्रतिनिधित्व करती है एक निजी संस्थान की तरह चल रही है. करोड़ों लोगों की भावनाओं को भुना रही है. लेकिन इस देश की जनता को उससे सवाल करने का हक नहीं है. सवाल उठता है सचिन किसके साथ हैं, देश की जनता के या उन चंद लोगों के साथ, जो क्रिकेट के मार्फत पैसा बटोर रहे हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचिन ने बीसीसीआई में पारदर्शिता और क्रिकेट में चल रहे हैं फिक्सिंग और भ्रष्टाचार के खेल के बारे में भी कुछ लिखा है. या जीवनी लिखते समय भी वह सेलेक्टिव हो गए हैं और सिर्फ उन मुद्दों को छुआ है जिससे उनकी कमाई और इमेज पर असर ना पड़े. साथ ही बीसीसीआई के आका नाराज ना हो.
सचिन ने कभी क्रिकेट की आर्थिक गतिविधियों में पारदर्शिता की वकालत नहीं की. यहां तक की अब तक किसी को भी नहीं मालूम है कि बीसीसीआई की कमाई कितनी है. ज्यादातर वाणिज्यिक एजेंसियां सिर्फ अनुमान लगाती हैं. सचिन किसके प्रति वफादार है. बीसीसीआई के प्रति या उन करोड़ों लोगों के प्रति जिनकी भावनाओं और गुरूर के प्रतीक भारत रत्न से उन्हें नवाजा गया है. बहरहाल उम्मीद है कि 6 नवंबर को जब किताब लोगों के हाथों में होगी. क्रिकेट के भ्रष्टाचार पर भी भगवान के बहीखाते में कुछ लिखा पढ़ने को मिलेगा.