आखिरी समय तक उन्हें इंतजार था कि 1985 में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) को दी गई अनमोल धरोहरें वह एक बार फिर देख सकेंगे, लेकिन पिछले आठ साल में तमाम प्रयासों के बावजूद महान हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह की यह तमन्ना पूरी नहीं हो सकी. तीन बार के ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता बलबीर सीनियर का 96 वर्ष की उम्र में मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में सोमवार को निधन हो गया.
पीटीआई ने पांच साल पहले बलबीर सीनियर के हवाले से यह खबर दी थी कि उन्होंने 1985 में SAI को ओलंपिक ब्लेजर, दुर्लभ तस्वीरें और पदक दिए थे. उन्होंने तत्कालीन SAI सचिव को ये धरोहरें दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में प्रस्तावित राष्ट्रीय खेल संग्रहालय के लिए दी थी, लेकिन वह संग्रहालय कभी बना ही नहीं.
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बलबीर सीनियर खुद इस मामले में कई खेलमंत्रियों और अधिकारियों से मिले और उनका नाती कबीर पिछले आठ साल से सैकड़ों ईमेल लिख चुका है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. पिछले छह दशक से अधिक समय से बलबीर सीनियर करीबी सहयोगी रहे खेल इतिहासकार सुदेश गुप्ता ने पीटीआई को बताया, ‘उम्र और स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद बलबीर सीनियर खुद अपनी खोई धरोहरें पाने के लिए भाग दौड़ करने से पीछे नहीं हटे. दिल्ली से लेकर पटियाला तक हम हर जगह गए लेकिन कुछ नहीं हुआ.’
उन्होंने कहा, ‘पिछले आठ साल में वह खुद कई खेल मंत्रियों और सभी खेल सचिवों से मिले और सभी ने सिर्फ आश्वासन दिया. पूर्व खेलमंत्री सर्वानंद सोनोवाल 2014 में जब चंडीगढ़ उनके घर उनसे मिलने आए थे, तब भी हमने यह मसला उठाया था. उनके साथ आए SAI अधिकारियों ने मामले की पूरी जांच का आश्वासन दिया था.’
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इन धरोहरों में ओलंपिक पदक नहीं थे, लेकिन मेलबर्न ओलंपिक 1956 में कप्तान का ब्लेजर, टोक्यो एशियाड (1958) का रजत और करीब सौ दुर्लभ तस्वीरें थी. बलबीर सीनियर को लंदन ओलंपिक 2012 में जब आधुनिक ओलंपिक के महानतम 16 खिलाड़ियों में चुना गया तब वहां ओलंपिक म्यूजियम में नुमाइश के लिए उनकी इन धरोहरों की जरूरत थी. तब पूछने पर SAI ने अनभिज्ञता जताई, लेकिन जांच का वादा किया.
बाद में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के वकीलों के समूह ने दिल्ली और राष्ट्रीय खेल संस्थान पटियाला के SAI कार्यालयों में आरटीआई अभियान चलाया. इनसे पुष्टि हो गई कि बलबीर सीनियर ने ये धरोहरें SAI को दी थी. कबीर ने बताया था कि इस मामले में पहली आरटीआई नौ दिसंबर 2014 को दाखिल की गई थी जिसका जवाब पांच जनवरी 2015 को मिला जिसमें कहा गया था कि ऐसे किसी राष्ट्रीय खेल संग्रहालय की स्थापना का प्रस्ताव ही नहीं था और ना ही कोई सामान बलबीर सीनियर से मिला था.
फिर 19 दिसंबर 2014 को दाखिल दूसरी आरटीआई का जवाब दो जनवरी 2015 को मिला जिसमें सामान मिलने की पुष्टि की गई थी. बाद की तमाम आरटीआई के जवाब भी विरोधाभासी रहे. बलबीर सीनियर की बेटी सुशबीर और हॉकीप्रेमियों ने भी लगातार यह मसला सोशल मीडिया पर भी उठाया, लेकिन उनकी खोई धरोहरें नहीं मिल सकीं.