भारतीय क्रिकेट में विराट कोहली सिर्फ एक नाम नहीं, एक मुकाम हैं. 84 अंतरराष्ट्रीय शतक किसी भी दौर को विवश करते हैं कि सिर झुकाकर स्वीकार करें- यह असाधारण है. फिर भी एक पुराना सवाल आज भी उनके करियर के साथ चलता है...आखिर 100 शतकों की मंजिल कब पूरी होगी?
इस सवाल का जवाब सिर्फ भावनाओं में नहीं, आंकड़ों में छिपा है.. और वहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है.
12 बार शतक के दरवाजे पर ठहरे कदम
96, 97 (टेस्ट), 91, 91, 92, 93, 94, 95, 96*, 99 (ODI), 90*, 94*(T20I)
अब तक अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में विराट कोहली 12 बार 90-99 के बीच पहुंचे- 9 बार आउट, तीन बार नॉट-आउट.
आंकड़ों का एक वैकल्पिक बोर्ड यही कहता है कि अगर ये 12 पारियां तीन अंकों में तब्दील होतीं, तो आज उनकी सेंचुरी संख्या 84 नहीं, 96 होती.
यानी सचिन तेंदुलकर के 100 अंतरराष्ट्रीय शतकों के रिकॉर्ड से सिर्फ चार शतक दूर.
फासला बस 72 रनों का
इन 12 पारियों में कोहली के बल्ले से कुल 1128 रन निकले. अगर प्रत्येक पारी 100 पर पूरी होती, तो कुल रन 1200 होते. यानी फासला पूरे करियर का नहीं- सिर्फ 72 रनों का है.
इन 72 रनों को अगर विभाजित किया जाए तो यह प्रति पारी 6 रन बैठते हैं...यानी एक मिस-हिट बाउंड्री, एक चूका हुआ मौका, एक कठिन रनिंग कॉल या एक ओवर जो खत्म हो गया.
चलिए इसे और आसानी से समझिए -
क्या है मामला?
विराट कोहली ने 12 अंतरराष्ट्रीय पारियों में 90 से 99 के बीच स्कोर किया. इन 12 पारियों में उनके कुल रन बने- 1128
अगर सभी शतक बन जाते तो?
अगर इन 12 पारियों में कोहली का स्कोर हर बार 100 होता, तो कुल रन होते-
12 × 100 = 1200
अब फर्क कितना रहा?
वास्तविक रन: 1128
संभावित रन: 1200
इन दोनों के बीच अंतर =
1200 - 1128 = 72 रन
मतलब सिर्फ 72 रनों की वजह से
उनकी 12 पारियां शतकों में नहीं बदल सकीं.
कितना छोटा फर्क है?
अगर इन 72 रनों को 12 पारियों में बांट दें तो -
72 ÷ 12 = 6 रन प्रति पारी
यानी हर पारी में औसतन 6 रन कम पड़े.
ये 6 रन क्या हैं?
एक मिस-हिट जो बाउंड्री बन जाती,
एक एक्स्ट्रा रन जो निकल सकता था,
एक ओवर जो खत्म हो गया,
या पार्टनर का आउट हो जाना,
या मैच का लक्ष्य पूरा हो जाना.
यानी यह कोई बड़े करियर गैप की कहानी नहीं, बस एक-एक पारी में कुछ कदमों की कमी की कहानी है.
नॉट-आउट वाली 90s का अपना सच
कोहली की तीन नॉट-आउट 90s इस कहानी में अलग जगह रखती हैं. ऐसे मामलों में बल्लेबाज के पास खुद सेंचुरी पूरा करने का मौका नहीं रहता- कभी मैच खत्म होता है, कभी ओवर, कभी पार्टनर.
यह भी विराट के करियर की एक खास पहचान है- टीम की जीत को व्यक्तिगत आंकड़े पर प्राथमिकता देना.
क्यों चर्चा में रहता है यह अधूरा मोड़
624 अंतरराष्ट्रीय पारियों में सिर्फ 12 बार 90s आना बहुत बड़ी संख्या नहीं है- औसतन हर 50वीं पारी के बाद एक बार. फिर भी हर 93, 95 या 99 चर्चा में आता है, जबकि एक 73 या 82 रिकॉर्ड में चुपचाप दर्ज हो जाता है. 90 का संयोग और दबाव का मिला-जुला इलाका है- जहां हर गेंद दर्शकों की धड़कन बढ़ाती है.
....फिर भी कहानी अधूरी नहीं
कोहली के करियर की असली परिभाषा उन अधूरे 72 रनों में नहीं, बल्कि लगातार दरवाजे तक पहुंचने की क्षमता में है. दुनिया के सबसे सुसंगत रन-मेकरों में शुमार होने का यही सबसे बड़ा प्रमाण है. और यही वजह है कि 100 शतकों की चर्चा अब भी जीवित है- नाटकीय दूरी नहीं, एक मामूली फासले की वजह से.
आगे का दृश्य
आज कोहली अपने करियर के परिपक्व चरण में हैं, और हर पारी के साथ यह रोमांच बना रहता है कि इतिहास कब मुड़ेगा. सचिन तेंदुलकर का रिकॉर्ड (100 इंटरनेशनल शतक) भले ही अब भी शिखर पर हो, लेकिन कोहली की दौड़ यह दिखाती है कि महानता सिर्फ आंकड़ों में नहीं, लगातार पीछा करते सपनों में भी लिखी जाती है.