इसकी शुरुआत थोड़ी देर से जरूर हुई, लेकिन यह यादगार बन गया. दूसरे खेलों के विपरीत क्रिकेट में कोई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट नहीं था. और जब इसकी शुरुआत हुई तो पुरुष खिलाड़ियों को इससे बाहर रखा गया, क्योंकि क्रिकेट का पहला विश्व कप महिला खिलाड़ियों का था. पुरुषों के खेल में पैसों की कमी थी. वजह यह थी कि पैसों के मामले में मुख्य भूमिका निभाने वाले इंग्लैंड में प्रथम श्रेणी के मैचों में दर्शकों की संख्या तेजी से घट रही थी और कई काउंटी कर्ज में डूबे हुए थे. फिर, जिन टेस्ट मैचों में इंग्लैंड नहीं होता था, उनमें दर्शकों की संख्या घटती जा रही थी.
जाहिर है, दर्शकों में रुचि जगाने के लिए कुछ कदम उठाने की जरूरत थी. लेकिन कोई अंतरराष्ट्रीय टेस्ट चैंपियनशिप कराई जाती तो इसमें पैसों और इंतजामात की बड़ी समस्या आती. इसका बोझ उठाने के लिए कोई तैयार नहीं था. उस समय टेस्ट क्रिकेट ही एकमात्र स्थापित फॉर्मेट था. हां, इंग्लिश काउंटी टीमें जरूर 40 और 60 ओवर के मैच खेल रही थीं. लेकिन 1975 के विश्व कप से पहले सभी अंतरराष्ट्रीय टीमें सिर्फ 20 ओवर के मैच खेल चुकी थीं. इसलिए एकदिवसीय मैच ज्यादातर खिलाडि़यों के लिए एक नई चीज थी. इंग्लैंड से बाहर के दर्शकों के लिए भी यह बिल्कुल नया फॉर्मेट था.
वेस्ट इंडीज की टीम 1975 में नए सिरे से तैयार हो रही थी. रोहन कन्हाई साल भर पहले कप्तानी छोड़ चुके थे और मुझे कप्तानी का भार सौंपा गया था. उस समय मैं 30 साल का था और हमारी टीम युवा व अनुभवी खिलाड़ियों के मेल से संतुलित टीम की शक्ल अख्तियार कर रही थी. हालांकि हमारी तेज गेंदबाजों की आक्रामक चौकड़ी अभी भविष्य की बात थी. हमारे पास कुछ ऑल-राउंडर खिलाड़ी थे और विवियन रिचर्ड्स, गॉर्डेन ग्रीनिज व रॉय फ्रेडरिक्स जैसे कुछ बेहतरीन फील्डर थे. हमारे पक्ष में एक बात यह भी थी कि हमारे कुछ खिलाड़ियों में काउंटी क्रिकेट खेलने का अनुभव था, जैसे एसेक्स के लिए खेल चुके कीथ बोएस या वार्विकशायर के लिए खेल चुके डेरिक मूर. तब वेस्ट इंडीज और ऑस्ट्रेलिया को मुख्य दावेदार माना जा रहा था. फाइनल में हम दोनों का मुकाबला हुआ.
हम रोमांचित थे और जीतना चाहते थे. वह विश्लेषकों, रणनीतिकारों और मनोवैज्ञानिकों का जमाना नहीं था. हमें सारा मनोबल अपने अंदर से ही जुटाना होता था. 1974 में पांच टेस्ट मैचों के भारत दौरे के समय मैंने रणनीति और विश्लेषण की बुनियादी बातें सीखनी शुरू कर दी थीं. 
हम जानते थे कि 60 ओवरों के मैच में हमें किस तरह खेलना है. उन दिनों चूंकि फील्डिंग के नियम अलग थे, जिसमें पहले के 15 ओवरों में कोई भीतरी घेरा नहीं होता था, इसलिए हमें अच्छी तरह पता होता था कि कितने रनों का लक्ष्य सही रहेगा. फिर भी हम अपनी विरोधी टीमों को कम करके नहीं आंकते थे. ऑस्ट्रेलिया के चैपल बंधुओं, डेनिस लिली और जेफ थॉम्सन और पाकिस्तान के जहीर अब्बास व आसिफ इकबाल को इंग्लैंड में खेलने का खासा अनुभव था. पाकिस्तान की टीम अपने साथ 18 साल का एक लड़का जावेद मियांदाद को लेकर आई थी, जो काफी प्रतिभावान मालूम होता था.
हमारे ग्रुप में चौथी टीम श्रीलंका थी. वह शायद एकमात्र टीम थी, जो अभी स्थापित नहीं हुई थी. लेकिन वे उतने नौसिखिए भी नहीं थे, जितना पूर्वी अफ्रीका की टीम.
ज्यादातर मैच काफी कड़े मुकाबले वाले रहे. वेस्ट इंडीज के लिए सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब हमने बर्मिंघम में पाकिस्तान के खिलाफ सिर्फ दो गेंद बाकी रहते एक विकेट से जीत हासिल की. यह ऐसा मैच था, जिसने हमारे गेंदबाजों एंडी रॉबर्ट्स, कीथ बोएस, बर्नार्ड जूलियन और वैनबर्न होल्डर की कड़ी परीक्षा ली. महत्वपूर्ण बात है कि फाइनल से एक हफ्ता पहले हम ओवल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेल चुके थे और 14 ओवर शेष रहते हमने सात विकेट से जीत हासिल की थी. उस मैच में धारदार गेंदबाज लिली के खिलाफ अल्विन कालीचरन के जवाबी हमले का विशेष योगदान था.
फाइनल तो कई कारणों से यादगार रहा. यह मेरे लिए बहुत स्पेशल था, क्योंकि मैंने 85 गेंदों पर 102 रन बनाए थे. वह मैच इसलिए भी याद है कि रॉस एडवर्ड्स ने मिडविकेट पर मेरा कैच छोड़ दिया था. उस समय मैं 26 रन पर खेल रहा था. उसके बाद मैंने कोई गलती नहीं की. मैं रोहन के प्रति आभारी रहूंगा जो दूसरे छोर से मुझे सहारा देते रहे. हमारी पारी संतोषजनक रही, क्योंकि जब मैं रोहन के साथ खेलने आया तो उस वक्त मुसीबत में दिख रहे थे और 291 रनों का हमारा स्कोर उस समय पहाड़-सा लग रहा था.
ज्यादा बड़ी बात है कि उस जीत ने सिर्फ क्रिकेट के कारण संगठित 50 लाख की आबादी वाले छोटे-से देश को वर्ल्ड चैंपियन का खिताब थमा दिया. हम गौरव के लिए खेले और विजयी रहे. हमारे वेतन में बहुत ज्यादा इजाफा तो नहीं हुआ लेकिन उस तमगे ने हमारे क्रिकेट बोर्ड को दूसरे बोर्डों के खिलाफ मजबूत स्थिति में ला दिया.
(क्लाइव लॉयड 1975 और 1979 के विश्व कप में वेस्ट इंडीज के कप्तान थे)