भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ रिकॉर्ड्स के लिए नहीं, बल्कि एक पूरी सोच बदल देने के लिए याद किए जाते हैं. ऐसा ही एक नाम है- कपिल देव. वह खिलाड़ी, जिसने मैदान पर उतरते ही यह भरोसा जगा दिया कि हालात चाहे जैसे हों, भारत मुकाबला जीत सकता है. तेज रन-अप, उछलती गेंद, बेखौफ शॉट्स और चेहरे पर वही जानी-पहचानी मुस्कान...कपिल देव भारतीय क्रिकेट की पहचान बन गए.
विदेशी दौरों पर जीत जब अपवाद मानी जाती थी और भारत में तेज गेंदबाजी को लेकर संशय रहता था, तब कपिल देव ने न सिर्फ इस धारणा को तोड़ा, बल्कि अपनी ऑलराउंड क्षमता से टीम को नया आत्मविश्वास दिया. वह सिर्फ विकेट लेने वाले गेंदबाज या मुश्किल समय में रन बनाने वाले बल्लेबाज नहीं थे, बल्कि ड्रेसिंग रूम के भीतर जज्बा भरने वाले कप्तान थे, आज जब भारतीय क्रिकेट खुद को दुनिया की सबसे मजबूत टीमों में गिनता है, तो उसकी बुनियाद में कपिल देव की वही सोच दिखती है- डरने की नहीं, लड़ने की सोच.
इसी खिलाड़ी का जन्म 6 जनवरी 1959 को चंडीगढ़ में हुआ. आज कपिल देव 67 साल के हो चुके हैं, लेकिन उनका कद समय के साथ और ऊंचा ही होता गया है. आंकड़े उनकी महानता को महज साबित नहीं करते, बल्कि बयान करते हैं. टेस्ट क्रिकेट में 4000 से अधिक रन और 400 विकेट लेने वाले वह आज भी दुनिया के इकलौते खिलाड़ी हैं. 5000 से ज्यादा रन, 8 शतक और 434 विकेट, जो अपने समय में विश्व रिकॉर्ड था- कपिल देव को क्रिकेट इतिहास की विशिष्ट श्रेणी में खड़ा करता है.
कपिल का असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा. इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में 40 से अधिक के एवरेज से रन बनाए, तो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी गेंद ने 25 की औसत से बल्लेबाजो को परेशान किया. वह हर हालात, हर विकेट और हर विरोधी के खिलाफ टीम इंडिया के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी साबित हुए.
उनके करियर के पन्ने यादगार लम्हों से भरे हैं-
1980, चेन्नई (तत्कालनी मद्रास) में पाकिस्तान के खिलाफ 84 रनों की आक्रामक पारी और 11 विकेट ने भारत को सीरीज जिताई. 1981–82 की इंग्लैंड सीरीज में बॉथम, गावर, गूच और विलिस जैसे दिग्गजों के सामने 318 रन और 22 विकेट लेकर कपिल ने यह जता दिया कि अकेला खिलाड़ी भी पूरी सीरीज का रुख पलट सकता है.
और फिर आया 1983 वर्ल्ड कप- भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा मोड़. कपिल देव की कप्तानी में भारत ने उस समय की अपराजेय मानी जाने वाली वेस्टइंडीज को हराकर इतिहास रच दिया. वह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि भारतीय क्रिकेट को मिला आत्मविश्वास था- यह भरोसा कि भारत भी विश्व विजेता बन सकता है.
1991–92 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 25 विकेट, और फिर पोर्ट एलिजाबेथ में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एक पारी में बनाए गए 129 रन, जब बाकी भारतीय टीम सिर्फ 86 रन ही जोड़ सकी- ये प्रदर्शन कपिल देव के जुझारूपन की पहचान हैं.
कपिल देव की सबसे बड़ी ताकत उनकी निरंतरता थी. अगर 1984–85 में इंग्लैंड के खिलाफ एक टेस्ट से उन्हें अनुशासनात्मक कारणों से बाहर न किया गया होता, तो उनका टेस्ट करियर 132 लगातार मैचों का होता. यह तथ्य बताता है कि वह सिर्फ महान नहीं, बल्कि लंबे समय तक भरोसेमंद भी रहे.
67 साल की उम्र में कपिल देव किसी एक दौर के खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की सोच हैं, वह आज भी भारतीय क्रिकेट के उस जुझारू चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने हार मानने की बजाय लड़ना चुना. यही वजह है कि कपिल देव का नाम आते ही भारतीय क्रिकेट की सबसे साहसी कहानी अपने-आप उतर आती है.