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डे-नाइट टेस्ट में पिंक बॉल क्या गुल खिलाएगी?

वर्ष 1877 में टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत के बाद से इसके नियमों में कई बदलाव किए गए हैं. टेस्ट क्रिकेट बदलाव के एक और मुहाने पर है. 27 नवंबर 2015 को यह डे-नाइट क्रिकेट में प्रवेश कर रहा है.

डे-नाइट टेस्ट के लिए तैयार पिंक बॉल डे-नाइट टेस्ट के लिए तैयार पिंक बॉल

वर्ष 1877 में टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत के बाद से इसके नियमों में कई बदलाव किए गए हैं. टेस्ट क्रिकेट बदलाव के एक और मुहाने पर है. 27 नवंबर 2015 को यह डे-नाइट क्रिकेट में प्रवेश कर रहा है. इसके साथ ही इसमें पिंक बॉल के प्रयोग की परंपरा भी शुरू होगी. पहली बार एक ही पिच पर लगातार पांच दिनों तक डे नाइट क्रिकेट खेली जाएगी.

इसमें जहां एक ओर पिच के व्यवहार पर नजर रहेगी वहीं दूसरी पिंक बॉल सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि इसका प्रयोग भी पहली बार ही किया जा रहा है और इसके व्यवहार को लेकर पूरे क्रिकेट जगत में उत्सुकता बनी हुई है.

वनडे में सफेद तो फिर टेस्ट में क्यों नहीं?
वनडे क्रिकेट में एक सफेद गेंद का प्रयोग 25 ओवरों के लिए ही किया जाता है. इसमें दोनों ही छोर से नई गेंदें प्रयोग में लाई जाती हैं. इसकी पीछे वजह है, सफेद गेंद का रंग जल्दी नहीं खराब हो और दूधिया रौशनी में इसे आसानी से देखा जा सके. वहीं टेस्ट क्रिकेट में लगातार 80 ओवर्स का मैच होने के बाद ही गेंद बदलने का नियम है. वनडे की एक पारी के बाद ही सफेद गेंद का रंग भूरा पड़ने लगता है वहीं 80 ओवर्स तक तो इसका रंग गहरा भूरा हो जाएगा. भूरी पिच होती है. यानी बल्लेबाजों ही नहीं बल्कि फील्डर्स को भी इससे खासी परेशानी होगी. इसके साथ ही टेस्ट भले ही डे नाइट हो रहा है क्रिकेटर्स की पोशाक का रंग सफेद ही रहेगा. यानी सफेद गेंद से इस टेस्ट के खेले जाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता.

कैसे पिंक बॉल का हुआ चयन?
लाल रंग की गेंद के साथ भी सफेद रंग की तरह ही बड़ी समस्या है. परंपरागत टेस्ट क्रिकेट लाल गेंद से दिन की रौशनी में खेली जाती है. लेकिन जब यही गेंद दूधिया रौशनी में देखी जाए तो भूरा दिखती है. जो पिच का रंग भी है. इसी वजह से डे नाइट क्रिकेट के लिए इसे पहले ही खारिज कर दिया गया था.

टेस्ट क्रिकेट देखने के लिए लगातार दर्शकों की संख्या में गिरावट ने इस प्रयोग के लिए एक्सपर्ट्स को प्रेरित किया. इसके लिए सबसे पहले जरूरी था गेंद का चयन. एमसीसी के एक्सपर्ट चाहते थे कि गुण और व्यवहार में दोनों गेंदों (लाल और उस गेंद जिसे डे नाइट टेस्ट के लिए चुना जाए) में अधिकतम समानता हो. यानी दूधिया रौशनी में इंसानी आंखों को देखने में कोई परेशानी नहीं हो. गहन अध्ययन के बाद इम्पीरियल कॉलेज ऑफ लंदन के एक्सपर्ट ने अन्य सभी रंगों पर पिंक को वरीयता दी. एक्सपर्ट ने पिंक में भी 15 विभिन्न शेड पर प्रयोग किया. अंततः जिस पिंक रंग की गेंद का उपयोग इस ऐतिहासिक टेस्ट में किया जाना है उसे पसंद किया गया.

पिंक कैसे अलग है टेस्ट की लाल गेंद से?
पिंक, लाल और सफेद तीनों ही गेंदों में अधिकतम समानता है. इन गेंदों की उछाल, कड़ापन और चमड़े में कोई अंतर नहीं है. हां, पिंक में रंगों के अलावा एक खास अंतर है.

दरअसल फिनिशिंग के दौरान पिंक बॉल पर रंग की एक और परत चढ़ाई जाती है. इसकी वजह से बॉल का रंग कुछ अधिक अंतराल तक चमकीला बना रहा है और लंबे समय तक खेलने की अवस्था में बना रहता है. एक्सपर्ट के लिए बॉल को कलर देना बहुत कठिन काम नहीं था. बैट और बॉल के बीच किस प्रकार संतुलन बना रहेगा? यह उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. उनके लिए यह जानना जरूरी था कि जब बॉल मैच में प्रयोग किया जाएगा इसका व्यवहार कैसा रहेगा? इसकी उछाल कैसी रहेगी? प्रयोग के बाद बॉल की सूरत जब बिगड़ेगी तो यह कैसे बर्ताव करेगी? पिंक बॉल को अंतिम रूप देने में इस सभी पहलुओं पर गौर किया गया.

टेस्ट के दौरान नहीं होगा लंच ब्रेक
इस टेस्ट की एक और खासियत यह होगी कि इसमें 40 मिनट का लंच ब्रेक नहीं होगा. हां इसकी जगह डिनर ब्रेक जरूर मिलेगा. टी ब्रेक को यही नाम दिया गया है. लेकिन यह ब्रेक पहले और दूसरे सेशन के बीच में मिलेगा.

एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि जिस तरह कैरी पैकर 1970 में सफेद गेंद और रंगीन पोशाक के साथ दूधिया रौशनी में वनडे मैचों के खेलने की परंपरा शुरू की और वनडे क्रिकेट बदल गया. उसी प्रकार टेस्ट में भी ये डे नाइट का प्रयोग इसे अधिक रोमांचक बना देगा. अन्य सभी परंपराओं को बरकरार रखते हुए टेस्ट क्रिकेट के नियमों को इस बार पिंक रंग दिया गया है. उम्मीद है कि इस दौरान अधिक से अधिक दर्शक मैदान में दिखेंगे. तो चलिए इंतजार करते हैं तीसरे सेशन के खेल का जब फ्लड लाइट्स ऑन किए जाएंगे और देखते हैं कि यह पिंक बॉल क्या क्या गुल खिलाती है.

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