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सचिन तेंडुलकर का कॉलमः फिर एक सपने की शुरुआत

दक्षिण अफ्रीका इस विश्व कप की मजबूत टीम है, लेकिन करोड़ों उम्मीदें कमजोर फॉर्म वाली टीम इंडिया की रुख पलटने की चमत्कारी काबिलियत पर टिकी हैं.

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भारतीय क्रिकेट टीम ने 1983 में जब आइसीसी विश्व कप उठाया पूरा देश खुशी से झूमने लगा, तभी इस सपने की नींव पड़ी थी. उस समय मैं नौ साल का था और मीलों दूर बैठे हुए टेलीविजन पर अपनी टीम को जश्न मनाते देखकर मुझे गर्व महसूस हुआ था.

जब मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया, तभी से मैं विश्व कप को उठाने का सपना देखता और टूर्नामेंट शुरू होने के महीनों पहले से अपने को तैयार करने में जुट जाता. 1996 का विश्व कप इसलिए खास था, क्योंकि बतौर सह-मेजबान यह टूर्नामेंट हम अपने देश में खेल रहे थे. लेकिन उसके परीकथा की तरह खत्म होने की उम्मीदें श्रीलंका के खिलाफ सेमी-फाइनल में ही भरभराकर ध्वस्त हो गईं. उस शाम होटल लौटने का रास्ता बहुत लंबा लग रहा था और हम वह मैच बार-बार अपने दिमाग में खेल रहे थे. यह सोचकर पछता रहे थे कि हमने ईडन गार्डन की पिच को पहचानने में इतनी बड़ी भूल कैसे कर दी, जिसकी वजह से हम आखिरकार हार गए.

विश्व कप जीतने का अगला मौका 2003 में आया, जब टीम जुनून और जज्बे से भरी थी. हम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुकाबले के लिए फाइनल के बड़े मैच तक पहुंच गए. उस समय तक टीम से सभी खिलाडि़यों ने सिर्फ दूसरों को ही विश्व कप फाइनल में हिस्सा लेते हुए देखा था. हमारे लिए यह जबरदस्त मौका था. लेकिन एक बार फिर पहले बल्लेबाजी करने का हमारा फैसला विनाशकारी साबित हुआ और रिकी पोंटिंग ने अपनी सबसे अच्छी वन-डे पारी खेलते हुए हमें अपने बल्ले से चारों खाने चित्त कर दिया.

फिर 2007 की निराशा के बाद 2011 का विश्व कप भारत में खेला गया और इसका फाइनल मैच मुंबई में हुआ, जो हमेशा मेरे लिए खास रहेगा. हमारी तैयारी असल में टूर्नामेंट के बहुत पहले से ही शुरू हो गई थी. इस तैयारी में बहुत छोटी-छोटी चीजें भी शामिल थीं, जैसे हरेक के लिए 3 किलो वजन कम करने और इस तरह ज्यादा चुस्त-दुरुस्त टीम बनने का वादा. हरेक इस वादे पर खरा उतरा. मैंने अपना 3.8 किलो वजन कम किया और टीम के मेरे साथियों ने भी अपने-अपने लक्ष्य पूरे किए.

मैं मानता हूं कि कप उठाने का सपना मैंने जरूर देखा था, लेकिन मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि जीत के जश्न किस तरह के होंगे! यह ऐसी शानदार रात थी, जो इससे पहले भारत ने सिर्फ एक बार और देखी थी—क्या आदमी, क्या औरतें, सब कारों के ऊपर चढ़कर नाच रहे थे और कोई एतराज भी नहीं कर रहा था.

1983 के विश्व कप में भारत की जीत के बाद मुझे एक बच्चे की तरह अपना नाचना याद है. इस हफ्ते से भारतीय टीम अपना विश्व कप खिताब बचाने का अभियान शुरू करेगी. वे अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ मैदान में होंगे और इसे दबाव से भरा मैच कहना बात को कम करके कहना होगा! पाकिस्तान के खिलाफ विश्व कप की शुरुआत करना टीम के कई खिलाडि़यों के लिए नया तजुर्बा होगा.

अहम मुकाबले में अच्छे ढंग से बनाई गई योजनाओं में भी तब्दीली करनी पड़ सकती है. 2003 में वीरू (वीरेंद्र सहवाग) और मैंने बतौर ओपनर पारी की शुरुआत करने का फैसला किया था और यह भी तय किया था कि हम दोनों में से कोई एक आखिर तक खेलेगा. मैंने पहले स्ट्राइक ली ताकि वकार (यूनुस), वसीम (अकरम) और शोएब (अख्तर) की तिहरी चुनौती को नेस्तनाबूद कर सकूं. मजे की बात यह कि ऐसा हुआ नहीं और हम तेज गति से रन बनाते चले गए. दूसरी पारी में टीम की बॉडी लैंग्वेज बदल गई और हम ज्यादा आक्रामक हो गए.

भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गए सभी मुकाबलों की यह दिलचस्प खासियत रही है, तभी से जब 1992 के विश्व कप में मैंने उनका पहली बार सामना किया था. यह मैच हमेशा किरण मोरे और जावेद मियांदाद के उस मशहूर झगड़े के लिए याद किया जाएगा, जिसमें मियांदाद ने मोरे को डराने और चिल्लाकर गेंदबाजों को आगे की नसीहत देने से रोकने के लिए वह मशहूर मेंढक कूद लगाई थी! विश्व कप के आगाज के बाद से यह पहला मौका था, जब दोनों टीमें इस टूर्नामेंट में एक दूसरे के खिलाफ खेल रही थीं, और भारत ने आगे आने वाले कई और मुकाबलों का यह पहला मैच जीत लिया.

1996 के गेम में आमिर सोहैल के साथ वेंकी (वेंकट प्रसाद) की झड़प के बाद मैदान में तनाव चरम ऊंचाई पर पहुंच गए. यह मैच भी भारत के लिए मीठी याद था, जिसमें नवजोत सिद्धू ने 93 रनों की मजबूत पारी खेली और फिर अजय जडेजा ने 25 गेंदों पर 45 रन बनाकर भारत को 50 ओवरों में 287 पर पहुंचा दिया.

यह मैच सबसे ज्यादा वेंकी के हाथों सोहैल के आउट होने के लिए याद किया जाएगा, खासकर इसलिए कि सोहैल ने बाउंड्री की तरफ अपना बल्ला लहराते हुए वेंकी को काफी बुरी-भली बातें बोली थीं. इस घटना और फिर सोहैल का विकेट लेने के बाद पूरी टीम जबरदस्त हरकत में आ गई और हमने मैच को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया.

फिर 1999 के विश्व कप में इंग्लैंड में भी कुछ ऐसा ही हुआ. यहां हमने सुपर सिक्स मुकाबले में पाकिस्तान के खिलाफ मैच खेला. इसमें वेंकी ने एक बार फिर 5 विकेट लिए और हम 47 रनों से मैच जीत गए. 2011 की जीत भी बहुत खास थी, क्योंकि इस जीत में पूरी टीम ने मिलकर योगदान दिया और जहीर ने अपने एक शानदार स्पेल में बहुत अहम विकेट चटकाए. उमर गुल और वीरू के बीच हुई टक्कर भी जोरदार थी, जब हमने पहले बल्लेबाजी की और दूसरी पारी में हमारे सभी गेंदबाजों ने मिलकर शानदार योगदान देते हुए पाकिस्तान को आउट कर दिया.

मैं पहले से कह सकता हूं कि 15 फरवरी को बहुत कड़ा मुकाबला होगा, क्योंकि इस मुकाबले में कुछ न कुछ ऐसा जरूर है, जो दोनों टीमों को अपना बेहतरीन प्रदर्शन करने पर मजबूर कर देता है, खासकर अगर वार्म-अप मैच में पाकिस्तान के प्रदर्शन को संकेत मानें, तो ऐसा होना और भी तय है. भारतीय टीम इतना जबरदस्त दबाव होगा कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती; टूर्नामेंट का पहला मैच होगा और दोनों पड़ोसी देशों के बीच मैदान पर और मैदान से बाहर काफी पुराना इतिहास रहा है.

लेकिन भारत के ओपनर मैच के अलावा भी इस विश्व कप में कुछ और शानदार मुकाबले होंगे, जिन्हें देखना दिलचस्प होगा. इस विश्व कप में सबकी निगाहें सबसे ज्यादा अगर किसी पर होंगी, तो वह ए.बी. डी विलियर्स ही हैं. दक्षिण अफ्रीका वह टीम है, जो अपनी हाल की फॉर्म का इस बार पूरा फायदा उठाना चाहेगी. आलोचकों ने उन पर कुछ बेजा तोहमतें मढ़ी हैं. इस टूर्नामेंट में कामयाबी ने भारत को कई मौकों पर छकाया है, लेकिन दक्षिण अफ्रीका ने हमेशा सभी विश्व कपों में कमोबेश अद्भुत क्रिकेट खेला है, चाहे वह 1992 में केपलर वेसल की टीम हो या 2011 में ग्रैम स्मिथ की, और अब डी विलियर्स में नेतृत्व में खेलने वाली टीम हो.

मैं उम्मीद करता हूं कि न्यूजीलैंड, इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका दूसरी टीमों की बजाए फायदे में रहेंगी, क्योंकि वे अपने जाने-पहचाने विकेट पर खेल रहे होंगे. लेकिन तमाम टीमों में मैं समझता हूं कि दक्षिण अफ्रीका ही वह टीम है, जिस पर निगाह रखनी होगी (ऑस्ट्रेलिया के अलावा), क्योंकि वे बहुत अच्छा क्रिकेट खेल रहे हैं और उनके पास ऑल-राउंड काबिलियत वाले कुछ बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं. एशियाई देशों में भारत के पास भी ऐसे ही काबिल खिलाड़ी हैं. हालांकि बीते दो महीनों में उन्हें ऑस्ट्रेलियाई परिस्थितियों में काफी जूझना पड़ा, लेकिन फिर भी उन्हें पूरी तरह खारिज नहीं करना चाहिए.

मैं यह हकीकत जानता हूं कि बतौर कप्तान एम.एस. धोनी और उनके उत्साही खिलाडि़यों में चीजों का रुख मोड़ देने की और अपनी हार से तेजी से सबक सीखने की रहस्यमय काबिलियत है. बाकी एशियाई टीमों में, मुझे पूरा भरोसा है कि श्रीलंका बहुत अच्छा प्रदर्शन करेगी. मैं समझता हूं कि (कुमार) संगकारा और (तिलकरत्ने) दिलशान का होना किसी भी टीम को खतरनाक धार दे देता है. पिछले ही महीने वे न्यूजीलैंड के दौरे पर थे, यह बात भी उनके अभियान के लिए अहम होगी.

क्रिकेट प्रेमियों को भारत से ढेर सारी उम्मीदें हैं और वे उम्मीद करेंगे कि टीम विश्व कप में हर मैच जीते. मैं महज इतनी उम्मीद करूंगा कि टीम इस तजुर्बे का मजा ले, अपनी जान लड़ा दे और खेल पर ही अपना पूरा ध्यान लगाए; फिर जीत तो खुद-ब-खुद उनके पीछे चली आएगी.

विश्व कप का सपना कुछ ऐसी चीज है, जो एक क्रिकेटर की आंखों से तब तक ओझल नहीं होता है जब तक कि वह विजेता टीम का हिस्सा न बन जाए. लेकिन मैं उन्हें सिर्फ यही सलाह दूंगा कि खेल का भरपूर मजा उठाएं, और दिल खोलकर खेलें, माहौल की गर्मी को खुद पर हावी न होने दें और किन्हीं भी हालात में खेल का मजा किरकिरा न होने दें.     

मैं इतना कहूंगा कि टीम तजुर्बे का मजा ले, अपनी जान लड़ा दे और खेल पर पूरा ध्यान लगाए, फिर जीत तो खुद उनके पीछे चली आएगी.

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