कनाडा की मैकगिल यूनिवर्सिटी में हुई इस स्टडी के तहत लगभग डेढ़ हजार लोगों की ब्रेन स्कैनिंग हुई. इसमें मोटापे से जूझ रहे लोगों के साथ ही अल्जाइमर्स के मरीज और सेहतमंद लोग भी थे. इसमें साफ दिखा कि वजनी लोगों के ब्रेन का वही हिस्सा सिकुड़ा हुआ था, जो अल्जाइमर्स के पेशेंट्स में था.
ग्रे मैटर कहलाने वाले इस हिस्से में न्यूरॉन्स का जमावड़ा होता है. ये याद रखने, समझने और तर्क करने में मदद करता है. यानी इस हिस्से के सिकुड़ने का सीधा असर याददाश्त से लेकर समझने और फैसला लेने पर भी होता है. ऐसे में एक्सपर्ट इस बात को लेकर भी डर जता रहे हैं कि मोटापे से परेशान लोगों में अल्जाइमर्स जैसी बीमारी का खतरा बढ़ जाता है.
इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि मोटे लोगों में कार्डियोवस्कुलर बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है. दिल की बीमारी का सीधा असर न्यूरॉन्स पर पड़ता है और वे मरने लगते हैं. हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज के चलते भी ऐसा हो सकता है. हालांकि 31 जनवरी को जर्नल ऑफ अल्जाइमर्स डिसीज में प्रकाशित इस स्टडी में ब्रेन टिश्यू लॉस की निश्चित वजह पर बात नहीं की गई.

मोटापा ब्रेन के लिए क्यों खतरनाक है, ये समझने के लिए स्टडी के दूसरे हिस्से में थोड़ी और डीटेलिंग हुई. इसमें 341 अल्जाइमर्स मरीज, इतने ही मोटापे से जूझते लोग और 682 हेल्दी लोग लिए गए. ध्यान रखा गया कि मोटे लोगों का बॉडी-मास इंडेक्स 30 या उससे ज्यादा हो. इनकी ब्रेन स्कैनिंग में भी वही बात निकलकर आई कि ग्रे मैटर सिकुड़ रहा है.
मस्तिष्क और मोटापे का संबंध बड़ी उम्र में ही नहीं, छोटे बच्चों पर भी ये दिखता है. अमेरिकन जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी में सालभर पहले छपे एक अध्ययन में साफ कहा गया कि ओबीज बच्चों में भी ब्रेन फंक्शनिंग बाकी बच्चों से कम दिखती है. 6 से 10 साल तक के बच्चों पर हुई स्टडी में कई दूसरी बातें भी निकलकर आईं. जैसे वे अपने गुस्से या डर जैसी भावनाओं पर भी जल्दी काबू नहीं कर पाते.
जिस अल्जाइमर बीमारी से मोटापे में ब्रेन में बदलाव की बात हो रही है, उससे दुनिया में लगभग साढ़े पांच करोड़ से ज्यादा लोग पीड़ित हैं. फिलहाल इसका कोई ट्रीटमेंट भी नहीं है, इसे केवल मैनेज किया जा सकता है. न्यूरोडीजेनेरेशन के चलते होने वाली बीमारी में याददाश्त कमजोर होने लगती है और बीमारी की एडवांस स्टेज में मरीज रुटीन काम भी नहीं कर पाता है.