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साइंस न्यूज़

इन 17 तरीकों से पूरी तरह खत्म होगा Covid-19, ब्रिटिश मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट

Complete Eradication Of COVID-19
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पिछले करीब दो साल से हमें कोरोना वायरस के साथ जीने की आदत पड़ गई है. लेकिन एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि धरती से कोविड-19 को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है. हाल ही में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बात को पुख्ता तौर पर रखा गया है कि कैसे कोरोना वायरस संक्रमण को दुनिया से खत्म कर दें. इस स्टडी में 17 फैक्टर्स गिनाए गए हैं, जिनकी बदौलत वायरस को संक्रमण फैलाने से रोका जा सकता है. (फोटोः गेटी)

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ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में यह भी बताया गया है कि कोविड-19 को रोकने के जो तरीके बताए जा रहे हैं, वो कितने प्रैक्टिकल हैं. इन 17 फैक्टर्स में तकनीकी विकास, सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन और लंबे समय तक इम्यूनिटी बनाए रखना सबसे प्रमुख फैक्टर्स हैं. इनके अलावा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक फैक्टर्स को भी शामिल किया गया है. जिसमें सरकार प्रभावी प्रबंधन और लोगों द्वारा संक्रमण को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयासों को समझना और उन्हें क्रॉसचेक करना.  (फोटोः गेटी)

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इन सारे फैक्टर्स की तीन-बिंदु प्रणाली पर स्कोरिंग की गई है. यह प्रणाली इसलिए विकसित की गई थी कि यह पता चल सके कि कोविड-19 का खात्मा संभव है या नहीं. यहां पर खात्मे का मतलब है कि दुनियाभर में कोरोनावायरस के जीरो केस. अभी तक ऐसी उपलब्धि सिर्फ स्मॉलपॉक्स (Smallpox) और पोलियो वायरस (Polio Virus) के तीनों वैरिएंट्स के साथ ही संभव हो पाया है.  (फोटोः गेटी)

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शोधकर्ताओं ने पाया कि स्मॉलपॉक्स और पोलियो की तुलना में कोविड-19 का सफाया करना बेहद मुश्किल है. स्कोर के हिसाब से ये स्मॉलपॉक्स का स्कोर 2.7, कोविड-19 का 1.6 और पोलियो का 1.5 है. शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हमारी ये गणना एक प्राथमिक विश्लेषण है. जिसमें कई कारकों (Factors) को ध्यान में रखा गया है. यह संभव है कि कोविड-19 को दुनिया से मिटाया जा सके, लेकिन उसके लिए बेहद कठिन प्रयास करने होंगे. वो भी कई सालों तक.  (फोटोः गेटी)

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शोधकर्ताओं ने कहा कि कोविड-19 को मिटाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक निवेश और सुरक्षा व बचाव को लेकर सामाजिक समझ का बढ़ना. अगर ये तीनों मिलकर काम करते हैं तो कोविड-19 को रोका जा सकता है. एक स्तर तक खत्म भी किया जा सकता है, लेकिन यह आसान नहीं होगा. क्योंकि इस समय लॉन्ग कोविड (Long Covid) की समस्या भी बरकरार है. यानी कोविड संक्रमण से ठीक होने के बावजूद लोगों में लंबे समय तक इससे संबंधित लक्षण टिक रहे हैं.  (फोटोः गेटी)

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शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि स्मॉलपॉक्स और पोलियो की तुलना में कोविड-19 की वैक्सीनेशन को लेकर लोगों के मन में दुविधा है. जो कि ज्यादा खतरनाक है. वैक्सीन लगवाने की हिचक की वजह से वैरिएंट्स का खतरा बढ़ जा रहा है. लगातार नए वैरिएंट संक्रमण को बरकरार रख रहे हैं. इसकी वजह से लोगों की इम्यूनिटी कमजोर हो रही है. अगर इसी तरह के हालात रहे तो वैश्विक टीका कार्यक्रम को आघात पहुंच सकता है.  (फोटोः गेटी)

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रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे बड़ी चुनौती है वैक्सीनेशन और हेल्थ सिस्टम को अत्याधुनिक और प्रभावी बनाने के लिए लगने वाली राशि की. क्योंकि नई वैक्सीन पर करोड़ों रुपयों का खर्च आता है. यहां पर राष्ट्रीय वैक्सीनेशन प्रोग्राम के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहायता जरूरी है. ताकि अलग-अलग देशों की सरकारों की तरफ से चलाए जा रहे साइंस विरोधी व्यवहार को रोका जा सके. क्योंकि वैक्सीन का विकास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करना ज्यादा बेहतर है. इससे पूरी इंसानियत को फायदा होगा.  (फोटोः गेटी)

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इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड-19 के खात्मे के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन या फिर कई देशों द्वारा मिलकर बनाए गए स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर आगे आना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक वैक्सीन किसी एक देश में मिलेगी, वहीं दूसरे को खरीदकर या मांगकर लगानी होगी. इससे बेहतर है कि जो देश सक्षम हैं, वो अपने यहां वैक्सीन तैयार करके दूसरे देशों की मदद भी करें.  (फोटोः गेटी)